MSME
भारत का सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम क्षेत्र
एमएसएमई) ने हमेशा भारतीय अर्थव्यवस्था में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। वर्तमान देश में सक्रिय लगभग 6.3 करोड़ एमएसएमई न केवल देश की जातियों में एक बड़ा योगदान देते हैं बल्कि ये एक बड़ी आबादी के लिए रोज़गार के उपलब्ध अवसर अवसर हैं। वैज्ञानिक है कि इस क्षेत्र में लगभग 110 मिलियन रोज़गार की उपलब्धता के साथ बाज़ार श्रमिकों की स्थिरता में भी महत्वपूर्ण भूमिका है। ऐसी सरकार द्वारा वर्तमान में आत्मनिर्भर भारत अभियान पर विशेष जोर देने के साथ ही भारत की अर्थव्यवस्था और आर्थिक रणनीति की दृष्टि से एमएसएमई की भूमिका और अधिक महत्वपूर्ण हो गई है।
वर्ष 2019 में एमएसएमई क्षेत्र के महत्व पर नजर डालें तो भारत सरकार का अनुमान है कि अगले पांच वर्षों में यह क्षेत्र भारत की किशोरावस्था और लगभग 50 मिलियन नए रोजगारों के सृजन के लिए जिम्मेदार होगा।
हालाँकि COVID-19 महामारी के कारण मांग पक्ष की तरफ और ' वस्तु एवं सेवा कर ' (GST) जैसे सुधारों के आपूर्ति पक्ष में मंदी के संकेत देखने को मिले थे, इसके साथ ही विमुद्रीकरण के कारण भी एमएसएमई क्षेत्र पर व्यापक नकारात्मक प्रभाव पड़ा।
एमएसएमई क्षेत्र की प्रमुख चुनौतियाँ:
जर्मनी और चीन के बीच एमएसएमई की भागीदारी क्रमशः 55% और 60% है।
1. वित्तीय चुनौतियाँ: भारत में एमएसएमई क्षेत्र में ऋण आपूर्ति की कमी एक बड़ी चुनौती बनी हुई है।
2.इस क्षेत्र में उपलब्ध वैश्विक ऋण 16 ट्रिलियन रुपये ही है, जिसके कारण इस क्षेत्र में कुल लागू ऋण का अंतर (36 ट्रिलियन रुपये) के सापेक्ष अभी भी लगभग 20 ट्रिलियन रुपये का अंतर बना हुआ है।
3.इसके साथ ही ऋण वसूली की कमी के कारण भारत में एमएसएमई को अधिकतर ' गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों ' (एनबीएफसी) या सूक्ष्म वित्त संस्थानों (एमएफआई) पर छूट मिलती है।
4.सितंबर 2018 से एनबीएफसी क्षेत्र में तरलता की कमी ने एमएसएमई की वित्तीय चुनौती को और अधिक बढ़ा दिया है।
5.एमएसएमई के बीच क्रेडिट गैप का एक प्रमुख कारण इस क्षेत्र में क्रेडिट गैप की कमी है।
6.देश में सक्रिय कुल एमएसएमई में से लगभग 86% का पंजीकरण नहीं हुआ है।
7.वर्तमान में भी देश के कुल 6.3 करोड़ एमएसएमई में से केवल 1.1 करोड़ ही 'वास्तु एवं सेवा कर' (जीएसटी) व्यवस्था के साथ पंजीकृत हैं।
8.इसके साथ ही 1.1 करोड़ एमएसएमई में संकटग्रस्त लक्ष्य रखने वालों की संख्या और भी कम है।ऐसे में भारत के एमएसएमई क्षेत्र का कर्ज पूरा नहीं हो पाया है।
9.तकनीकी बाधाएँ:
भारत का एमएसएमई क्षेत्र बड़े पैमाने पर पुरानी और अप्रचलित तकनीक पर आधारित है, जिससे इसकी उत्पादन क्षमता बाधित होती है।
10कृत्रिम डेटा एनालिटिक्स, रोबोटिक्स और अन्य संबंधित अवशेष (बड़े पैमाने पर औद्योगिक क्रांति 4.0 के रूप में जाना जाता है) का संबद्ध क्षेत्र के उद्यमों की तुलना में एमएसएमई के लिए अधिक बड़ी चुनौती पेश की जाती है।
11.वैधानिक बाधाएँ: एमएसएमई के संचालन के लिए बहुत सी सरकारी अनुमतियाँ और सेवाओं की आवश्यकता होती है, जिसके लिए लीडरशिप को विभिन्न सरकारी संभावनाओं के आकर्षण दिखाई देते हैं।
12.प्रतिबंधित दिवालियापन के कारण वर्तमान में भी निर्माण ढांचा प्राप्त करना, अनुबंधों को लागू करना, करों का भुगतान, व्यापार शुरू करना और सीमाओं के पार व्यापार करना आदि एमएसएमई की प्रगति में एक बड़ा बाधा बनी हुई है।
13.विनियामक जोखिम और नाइटगेट रिवाइवल ने पूर्व में भी किशोरी के दोस्तों को प्रभावित किया है।
14उत्पाद की चुनौतियाँ: वर्तमान में देश में सक्रिय एमएसएमई में अधिकांश फर्म सूक्ष्म उद्यम (माइक्रो एंटरप्राइजेज) श्रेणी की हैं।की हैं।
15.देश के एमएसएमई क्षेत्र में मुख्य रूप से छोटे और स्थानीय पैमाने के उद्यमों से बना एक सूक्ष्म उद्यम क्षेत्र है, ऐसे में उनके व्यापार या उत्पादन को हासिल करना (विशेषकर वर्तमान वित्तीय चुनौती के बीच) एक बड़ी चुनौती है।
इन समस्याओं के कारण भारत के विनिर्माण क्षेत्र में बड़ी कंपनी की तुलना में छोटी कंपनी का उत्पादन बहुत ही कम चल रहा है।
उपाय:
1.बॉन्ड मार्केट का विकास करना: हाल के वर्षों में भारतीय बॉन्ड बाजार में हुई प्रगति के बीच एसएमई बॉन्ड (एसएमई बॉन्ड) को बढ़ावा देने से एएमएसएमई के ऋण बाजारों की भागीदारी को बढ़ावा मिल सकता है।
2.एक तरफ जहां एसएमई बॉन्ड को बढ़ावा देने से लेकर एमएसएमई को अन्य वित्तीय बिचौलियों की तुलना में कम ब्याज दर का लाभ मिल रहा है, वहीं ये बॉन्ड बाजार में काम करने वाले वैज्ञानिक और शैक्षिक संस्थान के लिए एक उच्च रिटर्न के साधन के रूप में काम करेंगे।
3.स्वतंत्र संस्थागत व्यवस्था: डेटा उद्योग के बढ़ते महत्व को देखते हुए यह बहुत जरूरी हो गया है कि सरकार एक स्वतंत्र संस्था की स्थापना करे जो एमएसएमई को परामर्श दे और उन्हें इस नई डिजिटल व्यवस्था में आगे बढ़ने में सक्षम बनाए। बनाए।
4.श्रम कानून में सुधार: वर्तमान में देश में लागू श्रम कानून एमएसएमई के विकास के लिए बहुत अनुकूल नहीं हैं।
5.श्रमिक उद्यमों में बदलाव बहुत जरूरी है, लेकिन एमएसएमई के विकास के लिए इसके प्रारूप की दृष्टि से इन प्रारूपों को विकसित करना-देखना ढाँचा प्रदान करना और अधिकारों के संदर्भ में पर्याप्त सुरक्षा प्रदान करना के बीच सही संतुलन स्थापित करना होगा।
6.अल्पसंख्यक सुधार: हाल के वर्षों में सरकार द्वारा व्यापार सुगमता पर विशेष ज़ोर दिया गया है, लेकिन इस दौरान छोटे समुदायों के लिए अल्पसंख्यक, अल्पसंख्यक और आवश्यक समानताएं बनी हुई हैं।
यदि हम सही शब्दों में कहते हैं कि एमएसएमई के देश के आर्थिक क्षेत्र में महत्वपूर्ण हस्तक्षेप हो, तो इसके लिए एमएसएमई को मौजूदा बेरोजगारी से मुक्त एक ऐसा मानकीकृत ढाँचा प्रदान किया जाना चाहिए जो बहुत ही आवश्यक है कि जो इसके बजाय अपना काम करें।
निष्कर्ष:
एमएसएमई एक लचीली राष्ट्रीय उद्योग के लिए स्टार्टअप का कार्य करते हैं। देश के आर्थिक भविष्य के लिए एमएसएमई के विकास को प्राथमिकता देना बहुत महत्वपूर्ण है। सरकार द्वारा पिछले कुछ वर्षों में इस दिशा में कई महत्वपूर्ण कदम उठाए गए हैं। भारत को ऐसे ही और उपायों (रेवेन वर्तमान परिस्थितियों में) को अपनाने की आवश्यकता है। अगले दशक में भारत एक उभरती हुई शक्ति से आगे बढ़ती हुई एक स्थापित आर्थिक महाशक्ति के रूप में उभरी और इस यात्रा में एमएसएमई की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण होगा।
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