उपभोग फलन का महत्व
IMPORTANCE OF CONSUMPTION FUNCTION)
कीन्स द्वारा वर्णित उपभोग क्रिया का महत्व मनोवैज्ञानिक उपभोग नियम के विश्लेषण द्वारा स्पष्ट किया जा सकता है। उपभोग क्रिया का आर्थिक विश्लेषण में एक अपूर्व स्थान है। प्रो. हैन्सन ने इसे आर्थिक विश्लेषण का अनुपम यन्त्र कहा है और हैरिस ने उपभोग क्रिया को अद्वितीय खोज का दर्जा दिया है। निम्नलिखित विवरण से यह स्पष्ट हो जायेगा कि उपभोग क्रिया की धारणा ने आधुनिक आर्थिक विश्लेषण के क्षेत्र में कितना महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त कर लिया है :
(1) उपभोग क्रिया विनियोग के विशेष महत्व को व्यक्त करती है हम जानते हैं कि उपभोग एवं विनियोग रोजगार सिद्धान्त के दो महत्वपूर्ण अंग हैं। चूँकि उपभोग क्रिया अल्पकाल में स्थिर रहती है इसलिए यदि रोजगार में वृद्धि करनी है तो विनियोग पर ही विशेष ध्यान देना होगा। सरल शब्दों में, चूंकि उपभोग आय में हुई वृद्धि के अनुपात में नहीं बदलता, इसलिए विनियोग द्वारा उपभोग के अन्तर को पूरा किया जाता है ताकि रोजगार और उत्पादन में वृद्धि हो। इस प्रकार से विनियोग एक अल्पकालीन महत्वपूर्ण निर्धारक होता है।
(2) यह 'से' (Say) के बाजार नियम को असत्य सिद्ध करने में सहायक है- 'से' का कहना था कि पूर्ति स्वयं अपनी माँग को उत्पन्न कर लेती है जिससे अर्थव्यवस्था में अति-उत्पादन एवं बेरोजगारी की सम्भावना नहीं रहती है। कीन्स की उपभोग क्रिया 'से' के इस नियम का खण्डन करती है। प्रो. कीन्स के अनुसार, सीमान्त उपभोग प्रवृत्ति इकाई से कम होने के कारण सभी अर्जित आय स्वतः व्यय नहीं होती। परिणामस्वरूप बेरोजगारी एवं अति-उत्पादन की दशा का निर्माण होता है।
(3) यह धनी समाज में पूँजी प्रवृत्ति की व्याख्या कर सकने में सहायक है यह पूँजी की सीमांत उत्पादकता के गिरने की प्रवृत्ति की व्याख्या करने में सहायक होता है। जब उपभोग में वृद्धि, आय में वृद्धि की तुलना में धीमी गति से होती है तो कुल माँग में कमी होती है जिसके कारण बाजार में वस्तुओं का आधिक्य हो जाता है। फलतः उत्पादक उत्पादन घटने लगते हैं जिसके कारण भविष्य में पूँजीगत वस्तुओं की माँग कम हो जाती है और पूँजी की सीमान्त उत्पादकता घटने लगती है।
(4) व्यापारिक चक्रों के आर्थिक विश्लेषण की व्याख्या में सहायक कीन्स द्वारा प्रतिपादित उपभोग प्रवृत्ति सिद्धान्त ही व्यापार चक्र के उच्च एवं निम्न मोड़ बिन्दुओं की उचित व्याख्या करने में सफल हुआ है। कीन्स के विश्लेषण के अनुसार सीमान्त उपभोग प्रवृत्ति का इकाई से कम होना ही उच्च मोड़ (अथवा तेजी से मन्दी की ओर) का कारण बनता है। तेजी की वृद्धि के साथ-ही-साथ आय में भी वृद्धि होने लगती है। परन्तु व्यक्ति अपनी बढ़ी आय में से समस्त आय को उपभोग पर व्यय नहीं कर पाता, अथवा अधिक बचत करने लगता है। बचत की यह प्रवृत्ति ही बढ़ी हुई तेजी के आधार को खोखला कर देती है और अन्त में मन्दी का कारण बन जाती है।
(5) आय जनन (Income Generation) की धीमी गति की व्याख्या- सीमांत उपभोग प्रवृत्ति इकाई से कम होने के कारण लोग समस्त आय वृद्धि को उपभोग पर व्यय नहीं करते जिसके परिणामस्वरूप नव-निर्मित आय धारा की गति धीमी हो जाती है।
(6) न्यून रोजगार सन्तुलन की व्याख्या कीन्स के अनुसार प्रभावपूर्ण माँग के स्तर पर अर्थव्यवस्था में सन्तुलन स्थापित होता है। परन्तु यह जरूरी नहीं है कि यह सन्तुलन पूर्ण रोजगार सन्तुलन ही हो क्योंकि उपभोक्ता आय में हुई सम्पूर्ण वृद्धि को उपभोग पर व्यय नहीं करते।
(7) सामान्य अति-उत्पादन अथवा सामान्य बेरोजगारी की सम्भावना इस नियम के अनुसार कुल आय के बढ़ने पर उपभोग व्यय इतना नहीं बढ़ता जितनी आय में वृद्धि होती है। इसका अर्थ यह है कि कुछ वस्तुएँ ऐसी होती हैं जिनका कोई क्रेता नहीं होता। सीमान्त उपभोग प्रवृत्ति का इकाई से कम होना भी स्पष्ट करता है कि जितना उत्पादन होता है वह सब का सब खरीद नहीं लिया जाता, फलतः अति-उत्पादन और उसके परिणामस्वरूप सामान्य बेरोजगारी की सम्भावना रहती है।
(8) दीर्घकालीन गतिहीनता कीन्स का उपभोग सिद्धान्त दीर्घकालीन स्थिर मन्दी को स्पष्ट करता है, उपभोग प्रवृत्ति के स्थिर होने के कारण विनियोग के अवसर सीमित होते हैं और बचत बढ़ती जाती है, फलतः एक विकसित अर्थव्यवस्था में एक ऐसा समय आ जाता है जब वह अर्थव्यवस्था अपनी अति बचतों को विनियोग करने मे असमर्थ हो जाती है। इस अवस्था को ही दीर्घकालीन गतिहीनता या मन्दी कहते हैं।
(9) विनियोग प्रोत्साहन हम जानते हैं कि अर्द्धविकसित देशों में सीमान्त उपभोग प्रवृत्ति अधिक होतो है, इसलिए इन देशों में विनियोग के अवसर भी अधिक होते हैं और इस कारण विनियोग को प्रोत्साहन मिलता है।
(10) सरकारी हस्तक्षेप की आवश्यकता-चूँकि सम्पूर्ण आय अपने आप में व्यय नहीं हो जाती अतः आय तथा व्यय के बीच एक अन्तर-सा पड़ जाता है। यह अन्तर अपने आप बाजारी दशाओं द्वारा भरा जायेगा, अतः ऐसी परिस्थिति में प्रबन्ध या हस्तक्षेप की नीति बेकार हो जाती है, और इस तरह राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था में सुधार करने के लिए अथवा व्यय को आय के बराबर करने के लिए सरकार को हस्तक्षेप करना ही पड़ेगा।
(11) आर्थिक नीति के निर्माण में सहायक कीन्स का यह सिद्धान्त पूर्ण रोजगार और आर्थिक स्थिरता के लिए आर्थिक नियम बनाने में काफी सहायक होता है। बेरोजगारी की स्थिति में सरकार को प्रभावपूर्ण माँग में वृद्धि करने के लिए ऐसी नीति अपनानी चाहिए जिससे धनी वर्गों से आय निर्धन वर्गों की ओर अन्तरित हो सके। कारण यह है कि निर्धनों की सीमान्त उपभोग प्रवृत्ति धनवानों की अपेक्षा अधिक होती है फलतः जब आय पुनर्वितरित होकर उनके पास आयेगी तो उपभोग प्रवृत्ति बढ़ेगी जिसके कारण प्रभावपूर्ण माँग और आय में भी वृद्धि होगी।
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