मुद्रा की पूर्ति

मुद्रा की पूर्ति

[SUPPLY OF MONEY]

मुद्रा की पूर्ति का अर्थ मुद्राकी उस मात्रा से है जिसे एक देश की जनता वस्तुओं एवं सेवाओं को खरीदने के लिए अपने पास रखती है।  

यहाँ 'जनता' का अर्थ केवल व्यक्तियों से नहीं है बल्कि इसमें व्यावसायिक फर्मों (Firms) को भी सृजित शामिल किया जाता है। इसका कारण यह है कि व्यक्तियों के समान फर्मे भी अपने उत्पादन को जारी रखने  के लिए विभिन्न प्रकार के संसाधनों (Resources) को खरीदने के लिए तथा उनके मूल्यों का भुगतान करने के लिए अपने पास मुद्रा के रूप में नकदी रखती हैं। किन्तु इसमें केन्द्रीय सरकार, केन्द्रीय बैंक तथा व्यापारिक बैंकों को शामिल नहीं किया जाता है क्योंकि यह तो स्वतः मुद्रा सृजित करने वाली एजेन्सियाँ है। इसी प्रकार, व्यापारिक बैंकों को वह नकद मुद्रा जो उन्हें अपने पास तथा केन्द्रीय बैंक के पास रखनी अनिवार्य है तथा केन्द्रीय बैंक की न देने योग्य (Non-disposable) मुद्रा को भी मुद्रा की पूर्ति में शामिल किया जाता है क्योंकि यह भी वास्तव में चलन में नहीं होती है। अतः मुद्रा की पूर्ति का अर्थ है-मुद्रा को कुल मात्रा जो एक निश्चित समय-बिन्दु पर वस्तुओं सेवाओं के लेन-देन के लिए वास्तव में चलन में होती है। 

मुद्रा की पूर्ति के अंग-मुद्रा की कुल पूर्ति को दो भागों में बाँटा जा सकता है:
(अ) करेन्सी (Currency)-इसमें धातु मुद्राएँ, स्वर्ण, चाँदी एवं अन्य धातुओं के सिक्के (Mettalic Coins) तथा कागजी नोट (Paper Money) जो केन्द्रीय बैंक या केन्द्रीय सरकार द्वारा निकाले जाते हैं,  सम्मिलित होते हैं। ये मुद्राएँ वास्तव में, देश में वस्तुओं एवं सेवाओं के लेन-देन में होती हैं। यह विधिग्राह्य (Legal Tender) मुद्रा होती है इसलिए इसमें भुगतान हेतु सामान्य सर्वग्राह्यता होती है।

(ब) माँग जमा (Demand Deposits) - जिन देशों में बैंकिंग व्यवस्था पर्याप्त विकसित है उनमें बैंकों की माँग जमा मुद्रा-पूर्ति का एक बहुत महत्वपूर्ण घटक होती है क्योंकि इन्हें चैक के द्वारा बिना किसी प्रकार सूचना दिये चाहे जब निकाला जा सकता है। इस प्रकार यह नकद मुद्रा के समान ही तरल होती है तथा इसे कुल मुद्रा पूर्ति का एक अंग समझा जाता है। किन्तु इसमें विभिन्न समय-अवधियों के लिए बैंकों में जमा राशियाँ (Time deposits) शामिल नहीं की जाती हैं। इसका कारण यह है कि ये जमा राशियाँ निश्चित समय-अवधियों के पूरा होने के पहले नहीं निकाली जा सकतीं। चूँकि समय-जमाओं में तरलता का गुण होता है इसलिए इन्हें भी मुद्रावत् (Near Money) या अर्द्ध-मुद्रा (Quasi-Money) कहा जा सकता है।

संक्षेप में, मुद्रा की पूर्ति में दो तत्व सम्मिलित होते हैं--(अ) करेन्सी (Currency) अर्थात् सिक्के एवं उनक M कागजी नोट तथा (ब) वह माँग जमाएँ जो चेक के द्वारा चाहे जब निकाली जा सकती हैं। अर्थात् :
मुद्रा की पूर्ति =जनता के पास करेन्सी+ बैंकों की माँग जमा।

प्रो. एम. आर. ऐजमण्ड के अनुसार-"मुद्रा की पूर्ति से आशय गैर-बैंकिंग जनता के पास पाई जाने बाली करेन्सी तथा माँग जमा से है।"।

मुद्रा की पूर्ति का स्टॉक तथा प्रवाह में अन्तर
DISTINCTION ( BETWEEN STOCK AND FLOW OF SUPPLY OF MONEY) मुद्रा की पूर्ति का स्टॉक तथा प्रवाह दोनों के रूपों का अध्ययन किया जा सकता है। यदि मुद्रा पूर्ति का अध्ययन किसी समय-बिन्दु के सम्बन्ध में किया जाता है तो यह स्टॉक धारणा कहलाती है। यह कहना कि देश में इस दिनांक को मुद्रा की पूर्ति इतनी है तो यह स्टॉक धारणा कहलायेगी। परन्तु जब मुद्रा की पूर्ति किसी अवधि में देखी जाती है तो यह प्रवाह धारणा (Flow concept) बन जाती है। मुद्रा का प्रवाह मालूम करने के लिए जनता के पास मुद्रा के स्टॉक को एक निश्चित अवधि (या एक वर्ष) में चलन मुद्रा के औसत प्रचलन वेग से गुणा कर दिया जाता है। मुद्रा के प्रचलन वेग (Velocity) से तात्पर्य इस बात से होता है कि एक निश्चित अवधि में मुद्रा की एक इकाई सौदों के निपटारे हेतु एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति के पास किस गति से जाती है। यदि मुद्रा का स्टॉक M हो तथा औसत वेग V हो तो एक निश्चित अवधि में मुद्रा की पूर्ति Mx V = MV होगी ।

मुद्रा पूर्ति एवं मुद्रा स्टॉक में अन्तर
(DISTINCTION BETWEEN MONEY SUPPLY AND MONEY STOCK)

मुद्रा की पूर्ति तथा मुद्रा के स्टॉक में अन्तर होता है। मुद्रा की पूर्ति में केवल उस मुद्रा को शामिल किया जाता है जो समय-विशेष पर चलन में होती हैं, जबकि मुद्रा के स्टॉक में मुद्रा की इस पूर्ति के अतिरिक्त मुद्रा सृजित करने वाली एजेन्सियों (केन्द्रीय बैंक, व्यापारिक बैंक तथा कोषागार) की मुद्राओं को भी शामिल किया जाता है।

मुद्रा की पूर्ति के सम्बन्ध में विभिन्न धारणाएँ
(DIFFERENT CONCEPTS OF MONEY SUPPLY)

मुद्रा की पूर्ति के सम्बन्ध में हम निम्न दृष्टिकोणों का अध्ययन करेंगे:

 (1) परम्परावादी विचारधारा,
 (2) फ्रीडमैन की विचारधारा
(3) गुरले तथा शॉ की विचारधारा,
(4) केन्द्रीय बैंकिंग या रैडक्लिफ विचारधारा ।

(1) परम्परावादी विचारधारा (Classical View) - परम्परावादी अर्थशास्त्रियों तथा कीन्स के अनुसार मुद्रा की पूर्ति में दो तत्व शामिल किए जाते हैं- (i) वैधानिक मुद्रा या करेन्सी जिसमें सिक्के तथा नोट आते हैं तथा (ii) बैंकों में माँग जमा (Demand Deposits) जो चैक द्वारा निकाली जा सकती है। अर्थात्

मुद्रा की पूर्ति = करेन्सी (नोट या सिक्के) + बैंकों की माँग जमा लोगों के पास कुल करेन्सी तथा लोगों की बैंकों में कुल माँग जमाराशियों का पूर्ति योग M, के द्वारा E, दर्शाया जाता है।

(2) फ्रीडमैन की विचारधारा (Friedman's View) - प्रो. फ्रीडमैन के अनुसार, लोगों के पास कुल करेन्सी तथा लोगों की बैंकों में कुल माँग जमाराशियों के अतिरिक्त लोगों को बैंकों में कुल मियादी या समय जमाओं (Time Deposits) को भी मुद्रा की पूर्ति में शामिल करना चाहिए। इसका कारण यह है कि बचतों तथा सावधि जमाओं को आसानी से करेन्सी या माँग जमा के रूप में परिवर्तित किया जा सकता है। अर्थात्ः

मुद्रा की पूर्ति = करेन्सी + माँग जमा + सावधि जमा

इस विचारधारा के अनुसार, मुद्रा की पूर्ति में M, के साथ-साथ व्यापारिक बैंक की समय जमाओं का भी योग होता है। इस विस्तृत विचारधारा को भारत में M, से दर्शाया जाता है।

(3) गुरले तथा शों की विचारधारा (Gurley and Shaw Approach) -मुद्रा को पूर्ति का तीसरा दृष्टिकोण जो कि और अधिक विस्तृत है, गुरले एवं शॉ (Gurley and Shaw) का है जोकि उन्होंने अपनी पुस्तक 'Money in a Theory of Finance' में दिया है। उनके अनुसार मुद्रा की पूर्ति में M, के अतिरिक्त बचत की जमाओं, बिल्डिग सोसाइटी को जमाओ  को भी सम्मिलित करना चाहिए। अर्थात्

मुद्रा की पूर्ति - M,+ सेविंग या बचत बैंक की जमाएँ +शेयर + बॉण्ड्‌य

(4) केन्द्रीय बैंकिग था रेडक्लिफ़ विवरण (Central Banking or Redeliff Approach) इंग्लैण्ड को मौद्रिक प्रणाली की परीक्षा हेतु रेडक्लिक समिति की नियुक्ति की गयी थी, जिसने 1959 में अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की। इस सामिति ने मुद्रा की पूर्ति के सम्बन्ध में अत्यन्त व्यापक दृष्टिकोण का समर्थन किया है।

इस दृष्टिकोण के अनुसार, "मुद्रा से अभिप्राय विभिन्न साधनों द्वारा दी गई साख है।" (Money is the credit extended by a wide variety of sources.) इस दृष्टिकोण के अनुसार, मुद्रा के अन्तर्गत करेन्सी, मांग जमा, सावधि जमा, गैर-बैंकिंग, वित्तीय मध्यस्थों तथा असंगठित संगठनों द्वारा जारी की गई साख को शामिल किया जाता है। अर्थात् :

मुद्रा की पूर्ति करेन्सी + मांग जमा+ समय जमा +बचत खाता जमा + शेयर+ बान्ड्स + प्रतिभूतियां + असंगठित क्षेत्र के साख

इस दृष्टिकोण के अनुसार, मुदा तथा अन्य वित्तीय साधनों में समानता पाई जाती है, इसलिए कुल साख को मुद्रा में शामिल किया जाता है।

उचित दृष्टिकोण -यदि मुद्रा को पूर्ति का क्षेत्र अधिक कर दिया जायगा तो मुद्रा की पूर्ति का अनुमान लगाना कठिन हो जाएगा। इसलिए मुद्रा की पूर्ति में सामान्य रूप से करेन्सी तथा माँग जमा को ही शामिल किया जाना चाहिए और बचतों तथा जमाओं को इसमें सम्मिलित नहीं किया जाना चाहिए। "मुद्रा की पूर्ति के अन्तर्गत केवल करेन्सी तथा माँग जमाओं को हो शामिल किया जाता है।" अर्थात् :

मुद्रा को पूर्ति करेन्सी (सिक्के+नोट) माँग जमा

MS=Currency (Coins + Notes) + Demand Deposits

भारत में मुद्रा पूर्ति के मापक
(MEASURES OF MONEY SUPPLY IN INDIA)

मुद्रा-पूर्ति के द्वितीय कार्यकारी दल (Second Working Group on Money Supply) सिफारिशों के आधार पर भारतीय रिजर्व बैंक भारत में मुद्रा पूर्ति का आकलन चार संघटकों को सहायता में करता है:

M, = जनता के पास मुद्रा (करेन्सी, नोट, सिक्के) बैंकों की मांग जमा (चालू और बचत बैंक खाते पर

M, M, + डाकखानों की बचत बैंक जमा;

M, M, + बैंकों की सावधि जमा; और

M. - M, + डाकखानों की सम्पूर्ण जमा

M, से M, की ओर बढ़ने पर मुद्रा के इन चार रूपों की तरलता क्रमशः घटती जाती है।
भारतीय रिजर्व बैंक के अनुसार मौद्रिक समुच्चय

• M (रिजर्व मनी): प्रवाह में मुद्रा + आरबीआई के पास बैंको का जमा + आरबीआई के पास अन्य जमा= आरबीआई का सरकार केपास नेट क्रेडिट + आरबीआई का वाणिज्यिक क्षेत्र में नेट क्रेडिट +बैंकों पर आरबीआई का दावा + आरबीआई की कुल विदेशी संपत्तियां + जनता केलिए सरकार की मुद्रा देनदारियां – आरबीआई की कुल गैर मौद्रिक देनदारियां

• M1 + (संकीर्ण (नेरो) मनी): जनता के पास करेंसी + जनता की जमा पूंजी (बैंकिंग प्राणाली के साथ जमा की मांग+ आरबीआई की अन्य जमा)

• M2: M1 + डाकघर के साथ बचत जमा।

• M3 (ब्रॉड मनी): M1 + बैंकों के साथ समयावधि जमा = सरकार के पास नेट बैंकिंग क्रेडिट + वाणिज्यिक क्षेत्र में बैंक क्रेडिट + बैंक सेक्टर की कुल विदेशी संपत्ति+ जनता के प्रति सरकार की मौद्रिक जिम्मेदारियां – बैंकिंग क्षेत्र की कुल गैर मौद्रिक देनदारियों (समय जमा के अलावा)।

• M4 (ब्रॉड मनी): M3+ डाकघर बचत बैंकों के साथ सभी जमा (राष्ट्रीय बचत पत्र को छोड़कर)।



मुद्रा की पूर्ति को प्रभावित करने वाले तत्व
FACTORS INFLUENCING THE SUPPLY OF MONEY)

( किसी समय बिन्दु पर मुद्रा की पूर्ति को निर्धारित करने वाले प्रमुख तत्व निम्नलिखित है:

(1) आवश्यक रिजर्व अनुपात (The Required Reserve Ratio)- आवश्यक रिजर्व अनुपात अथवा न्यूनतम नकदी कोष या रिजर्व अनुपात मुद्रा-पूर्ति का एक महत्वपूर्ण निर्धारक तत्व है। इसको कार्य-प्रणाली इस प्रकार है:

(1) चालू तथा सावधि जमा देयताओं से नकदी का अनुपात (RR) कानून द्वारा निर्धारित किया जाता है। प्रत्येक बैंक को इन देयताओं का कुछ प्रतिशत देश के केन्द्रीय बैंक के पास जमा के रूप में रखना पड़ता है। (2) जब आवश्यक कोष अनुपात में वृद्धि हो जाती है तो व्यापारिक बैंकों के पास मुद्रा को पूर्ति बाद जाती है और जब आवश्यक कोष अनुपात घट जाता है तो मुद्रा को पूर्ति में वृद्धि हो जाती है।

(2) तरल कोषानुपात (Liquidity Ratio)- किसी देश का केन्द्रीय बैंक हो मुद्रा पूर्ति निर्धारित करने के लिए व्यापारिक बैंकों के कोषों या तरल कोषानुपात को प्रभावित करते हैं। तरल कोषानुपात जितना अधिक होगा व्यापारिक बैंकों के कोषों का स्तर उतना ही कम होगा अर्थात् वह कम मात्रा में उधार सुविधाएँ दे पायेंगे। दूसरे शब्दों में, तरल कोषानुपात के अधिक होने पर मुद्रा की पूर्ति कम होगी। इसके विपरीत दशा होने पर अर्थात् तरल कोषानुपात के कम होने पर बैंक के कोषों का स्तर (जिसे वह अपनी इच्छा से उधार कर सकते है) ऊँचा होगा अर्थात् मुद्रा की पूर्ति अधिक होगी।

(3) उच्च शक्ति मुद्रा या मौद्रिक आधार का आकार (High Powered Money) - व्यापारिक बैंकों के पास जो रिजर्व की मात्रा होती है, और लोगों के पास सिक्के और नोटों के रूप में जो चलन की मात्रा होती है, इन दोनों के योग को उच्च शक्ति मुद्रा या मौद्रिक आधार का आकार कहा जाता है। इसी के आधार पर बैंक जमाओं का विस्तार किया जाता है एवं मुद्रा का निर्माण किया जाता है जिससे मुद्रा की पूर्ति बढ़ती है। मुद्रा की पूर्ति एवं उच्च शक्ति मुद्रा में सीधा सम्बन्ध होता है अर्थात् उच्च शक्ति मुद्रा के बढ़ने से मुद्रा की पूर्ति बढ़ती है एवं उसके घटने से मुद्रा की पूर्ति घटती है। इसका विस्तृत विवेचन आगे किया गया है।

अन्य शब्दों में :
उच्च शक्ति मुद्रा (High Powered Money) = जनता के पास करेन्सी (नोट एवं सिक्के) + बैंक रिजर्व ।

मुद्रा तथा उच्च शक्ति मुद्रा में अन्तर (Distinction between Money and High Powered Money) -मुद्रा तथा उच्च शक्ति मुद्रा में मुख्य अन्तर यह है कि मुद्रा में करेन्सी के अतिरिक्त माँग जमाओं को सम्मिलित किया जाता है, जबकि उच्च शक्ति मुद्रा में करेन्सी के अतिरिक्त बैंक की समय जमाओं को भी शामिल किया जाता है। जब उच्च शक्ति मुद्रा में वृद्धि होती है तो मुद्रा की पूर्ति में भी वृद्धि होती है।

(4) जनता की करेन्सी तथा जमाएँ रखने की इच्छा जनता की करेन्सी तथा जमाएँ रखने की इच्छा भी मुद्रा की पूर्ति को निर्धारित करती है। यदि लोगों की यह आदत बनी हुई है कि वे नकदी कम रखते हैं और व्यापारिक बैंकों में अधिक जमा रखते हैं, तो मुद्रा पूर्ति अधिक होगी। इसका कारण यह है कि अधिक जमाओं से अधिक मुद्रा का निर्माण किया जा सकता है। इसके विपरीत, यदि लोगों में बैंकिंग की आदत नहीं है और वे अपनी बचतों को अपने पास ही नकदी के रूप में रखना श्रेष्ठकर समझते हैं तो बैंक द्वारा साख निर्माण अपेक्षाकृत कम होगा और मुद्रा पूर्ति का स्तर भी नीचा होगा।

(5) मुद्रा की चलन गति-मुद्रा की चलनगति भी मुद्रा की पूर्ति को प्रभावित करती है। एक विशेष समयावधि में मुद्रा की एक इकाई का प्रयोग कई बार किया जा सकेगा। इसलिए मुद्रा की वह एक इकाई एक से अधिक इकाइयों का काम करेगी। मान लीजिए भारत में मुद्रा की एक इकाई एक वर्ष में औसतन 5 बार भुगतान के लिए प्रयोग में लायी गयी है। इसका अर्थ यह हुआ कि मुद्रा की एक इकाई ने 5 इकाइयों का काम किया है। अर्थशास्त्र की भाषा में यह कहा जायेगा कि मुद्रा की व्यवसाय चलन गति (अर्थात् V) 5 है। अतः एक निश्चित समयावधि में मुद्रा की पूर्ति का अनुमान मुद्रा की मात्रा की चलन गति से गुणा करके लगाया जायेगा। अन्य शब्दों में : मुद्रा की पूर्ति (Supply of Money) = M × V = MV

परीक्षा प्रश्न
(EXAMINATION QUESTIONS)

अ) निबन्धात्मक प्रश्न (Essay Type Questions) 

1.मुद्रा को पूर्ति से क्या आशय है? मुद्रा को पूर्ति के विभिन्न अंगों की व्याख्या कीजिए।
2  मुद्रा की पूर्ति से आप क्या समझते हैं? मुद्रा पूर्ति के माप के सम्बन्ध में विभिन्न धारणाओं को समझाइये।
3 मुद्रा को पूर्ति से आप क्या समझते है ? उसके घटक तथा उसे प्रभावित करने वाले तत्व बताइये। 
4  'मुद्रा' से क्या तात्पर्य है ? मुद्रा की परिभाषा दीजिए तथा मुद्रा को पूर्ति को प्रभावित करने वाले को कीजिए । 
5- मुद्रा की पूर्ति से क्या आशय है? इसके निर्धारक तत्व कौन-से है? 

लघु उत्तरीय प्रश्न (Short Answer Type Questions) 

1मुद्रा की पूर्ति से क्या आशय है?
2. मुद्रा को पूर्ति और मुद्रा के स्टॉक में अन्तर लिखिए।
3. भारतीय रिजर्व बैंक मुद्रा की पूर्ति की मांग कैसे करता है?
4 मुद्रा पूर्ति के सम्बन्ध में परम्परात्मक दृष्टिकोण क्या है? 
5. गुरले एवं शॉ का दृष्टिकोण मुद्रा की पूर्ति के सम्बन्ध में क्या है ?
6. मुद्रा को पूर्ति को निर्धारित करने वाले किन्हीं तीन तत्वों का विश्लेषण कीजिए।
7. मुद्रा को चलन गति से क्या तात्पर्य है ?

(स) वस्तुनिष्ठ प्रश्न (Objective Type Questions)

1. मुद्रा को पूर्ति को जब किसी समय विशेष के सन्दर्भ में परिभाषित किया जाता है तो यह कहलायेगी :
सही विकल्प छाँटकर लिखिए:
(अ) स्टॉक धारणा
(ब) प्रवाह धारणा,
(स) अनुभवगग्य धारणा,
(द) उपर्युक्त में से कोई नहीं।

2. मुद्रा को पूर्ति के समय जमाओं को शामिल किया गया है:
(अ) शिकागो सम्प्रदाय दृष्टिकोण में,
(ब) परम्परावादी दृष्टिकोण में,
(स) उपर्युक्त दोनों में,
(द) उपर्युक्त में से कोई नहीं ।

3.जब मुद्रा को पूर्ति में कमी होती है तो वस्तुओं के मूल्य :
(अ) बढ़ जाते हैं,
(ब) घट जाते हैं,
(स) समान रहते है,
(द) कोई परिवर्तन नहीं होता।

4. जब मुद्रा की पूर्ति में वृद्धि होती है तो वस्तुओं तथा सेवाओं के मूल्य में जो वृद्धि होती है वह फिशर के अनुसार:
(अ) प्रतिगामी होती है,
(ब) आनुपातिक होती है,
(स) प्रगतिशील होती है,
(द) उपर्युक्त में से कोई नहीं।

5. यदि 1 रुपये में 3 किलोग्राम नमक आता है तथा मूल्य में परिवर्तन होने पर 1 रुपये में 1 किलोग्राम नमक आने लगे तो :
(अ) नमक के मूल्य में वृद्धि हो जाती है,
(ब) रुपये के मूल्य में कमी हो जाती है,
(स) उपर्युक्त सभी,
(द) उपर्युक्त में से कोई नहीं।

6.भारत में M, के अन्तर्गत शामिल किया जाता है :
(अ) लोगों के पास कुल करेन्सी + लोगों की व्यापारिक व सहकारी बैंकों में कुल माँग जमा राशियाँ,
(ब) लोगों के पास कुल करेन्सी+लोगों की व्यापारिक व सहकारी बैंकों में कुल माँग एवं समय जमा राशियां
(स) लोगों के पास कुल करेन्सी + डाकखानों की सेविंग बैंक जमा राशियाँ,
(द) उपर्युक्त में से किसी को नहीं।

7. मौद्रिक नीति की दृष्टि से मुद्रा माप सम्बन्धी अधिक उपयुक्त दृष्टिकोण है:
(अ) तरलता,
(ब) गुरले एवं शॉ का,
(स) शिकागो सम्प्रदाय,
(द) परम्परावादी 

8-. भारत में M₂ के अन्तर्गत शामिल किया जाता है:
(अ) लोगों के पास कुल करेन्सी + लोगों की व्यापारिक व सहकारी बैंकों में कुल माँग व जमा राशियाँ+ डाक खानों की कुल जमा राशियाँ, 
(ब) लोगों के पास कुल करेन्सी+लोगों की व्यापारिक व सहकारी बैंकों में कुल माँग एवं समय जमा राशियों
(स) लोगों के पास कुल करेन्सी,
(द) उपर्युक्त में से कोई नहीं।

9 मुद्रा की पूर्ति बढ़ जायेगी यदि :
(अ) बैंक कोषों का स्तर बढ़ जाता है,
(ब) आवश्यक प्रारक्षित अनुपात बढ़ जाता है,
(स) उपर्युक्त दोनों ही दशाओं में,
(द) उपर्युक्त में से कोई नहीं ।

[ उत्तर-1. (अ)
2. (अ)
3. (ब)
4. (ब)
5. (स)
6. (अ)
7. (स)
8. (ब)
9. (अ)





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