सार्वजनिक व्यय

सार्वजनिक व्यय

[PUBLIC EXPENDITURE)

सार्वजनिक व्यय से अभिप्राय उस व्यय से है जो केन्द्रीय राज्य तथा स्थानीय सरकारों द्वारा उन सामान्य आवश्यकताओं की सन्तुष्टि के लिए किया जाता है, जिनको लोग अपनी व्यक्तिगत क्षमता द्वारा कुशल ढंग से सन्तुष्ट करने में अयोग्य होते हैं। इस प्रकार "सार्वजनिक व्यय सामूहिक सामाजिक आवश्यकताओं की सन्तुष्टि में सहायता करता है।"

निजी तथा सार्वजनिक व्यय में अन्तर
(DIFFERENCE BETWEEN PRIVATE AND PUBLIC EXPENDITURE) 
सार्वजनिक व्यय और निजी व्यय में अन्तर का निम्नलिखित बिन्दुओं के आधार पर अध्ययन किया जा सकता है:

(1) आय-व्यय का समायोजन-निजी व्यय, आय के अनुसार किया जाता है। प्रत्येक व्यक्ति पहले अपनी आय का अनुमान करता है फिर अपना बजट तैयार करता है, अर्थात् यह "cut your coat according to cloth" के अनुसार कार्य करता है, परन्तु सार्वजनिक व्यय राज्य की आय पर नहीं वरन् उसके व्यय की मद पर निर्भर करता है। सार्वजनिक क्षेत्र में पहले व्यय का अनुमान लगाया जाता है अर्थात् देश को आवस्यकताओं की जानकारी प्राप्त की जाती है, फिर उस व्यय की पूर्ति के लिए साधनों की खोज की जाती है।

(2) मितव्ययिता निजी व्यय में सार्वजनिक व्यय को अपेक्षा अधिक ध्यान दिया जाता है।

(3) उद्देश्य-निजी व्यय का उद्देश्य सर्वथा सीमित होता है। निजी व्यय का उद्देश्य प्रायः निजी लाभ प्राप्त करना होता है। परन्तु सार्वजनिक व्यय समाज या राष्ट्र के हित की दृष्टि से किया जाता है।

(4) लोच निजी व्यय में लोच रहती है अर्थात् व्यक्ति अपनी आय को व्यय भी कर सकता है और नहीं भी, परन्तु सार्वजनिक व्यय में लोच नहीं रहती।

(5) नियन्त्रण-निजी व्यय पर प्रायः व्यक्ति का अपना ही नियन्त्रण रहता है, परन्तु सार्वजनिक व्यय पर संसद तथा महा-अंकेक्षक (महा लेखाकार) (Comptroller Auditor and General) का नियंत्रण होता है। इसलिए सार्वजनिक व्यय स्वतन्त्रतापूर्वक नहीं किया जा सकता है। (6) प्रभाव-निजी व्यय का यदि सतर्कतापूर्वक प्रयोग किया जाता है तो इसका प्रभाव व्यक्ति-विशेष पर पड़ता है, परन्तु सार्वजनिक व्यय का प्रभाव समस्त समाज तथा देश के आर्थिक जीवन पर पड़ता है।

(7) क्षेत्र निजी व्यय का क्षेत्र सीमित होता है, जबकि सार्वजनिक व्यय का क्षेत्र विस्तृत होता है।

सार्वजनिक व्यय का बढ़ा हुआ महत्व
(INCREASING IMPORTANCE OF PUBLIC EXPENDITURE)
सार्वजनिक व्यय के महत्व में वृद्धि के निम्नलिखित कारण हैं :

(१) कल्याणकारी राज्य की स्थापना बीसवीं शताब्दी में राज्य की प्रकृति व स्वभाव में अन्तर आया है और अनेक प्रगतिशील देशों ने कल्याणकारी राज्य के आदर्श को माना है। चूँकि कल्याणकारी राज्य की स्थापना में सामाजिक उद्देश्यों की पूर्ति के लिए सर्वाधिक महत्व दिया जाता है, इन उद्देश्यों की पूर्ति सार्वजनिक व्यय के द्वारा ही होती है फलतः सार्वजनिक व्यय के महत्व में वृद्धि हुई है।

(2) आर्थिक विकास एवं नियोजन में सहायक-वर्तमान समय में प्रत्येक देश ने अपने आर्थिक विकास के लिए आर्थिक नियोजन को अपना रखा है। आर्थिक नियोजन की सफलता में सार्वजनिक व्यय का काफी महत्व है, क्योंकि :

(i) आर्थिक नियोजन का संचालन करने के लिए सार्वजनिक व्यय की राशि में वृद्धि करनी होती है।

(ii) आर्थिक विकास की प्रक्रिया में सरकार को स्वयं अनेक आर्थिक एवं वाणिज्यिक उपक्रमों का संचालन करना पड़ता है। उनके लिए भी पर्याप्त मात्रा में सार्वजनिक व्यय करना पड़ता है।

(iii) आर्थिक विकास के लिए पूँजी निर्माण की गति में वृद्धि करनी होती है, इसमें सार्वजनिक व्यय को प्रभावशाली भूमिका रहती है।

(iv) आर्थिक नियोजन की सफलता के लिए विभिन्न मदों पर सार्वजनिक व्ययों का उचित प्रबन्ध होता है।

(3) सामाजिक न्याय-आधुनिक समय में सरकारें आय और सम्पत्ति की असमानताओं को कम करने पर जोर दे रही हैं। सामाजिक न्याय के इस उद्देश्य की पूर्ति में सार्वजनिक व्यय अत्यधिक सहायक होता है, कारण यह है कि सार्वजनिक व्यय की उचित नीति का अनुकरण करके, निर्धनों पर अधिक व्यय करके उनकी आय और जीवन-स्तर में वृद्धि की जा सकती है।

(4) आर्थिक स्थिरता-अर्थव्यवस्था में आर्थिक स्थिरता बनाये रखने में भी सार्वजनिक व्यय का महत्वपूर्ण योगदान रहता है। मन्दी की स्थिति में सार्वजनिक व्यय में इस प्रकार की वृद्धि की जाती है कि उससे विनियोग, पूँजी निर्माण और रोजगार में वृद्धि हो तथा अर्थव्यवस्था को मन्दी के प्रभावों से मुक्त किया जा सके। इसके विपरीत, स्फीति के समय उत्पादकीय तथा शीघ्र फलदायक योजनाओं पर सार्वजनिक व्यय को बढ़ाकर स्फीतिक प्रभावों को कम किया जा सकता है। इस प्रकार सार्वजनिक व्यय के द्वारा मन्दी तथा स्फीति को नियन्त्रित करके आर्थिक स्थायित्व को बनाये रखने में मदद मिलती है।

(5) सामाजिक सुधार-सामाजिक स्तर के सुधार अर्थात् शिक्षा एवं स्वास्थ्य के स्तर में वृद्धि, सामाजिक कल्याण के कार्यक्रमों का संचालन, निर्धन एवं पिछड़े वर्गों का विकास आदि में भी सार्वजनिक व्यय की विशिष्ट भूमिका रहती है।

(6) अर्द्ध विकसित क्षेत्रों का विकास-विकासशील देशों में पिछड़े व अर्द्धविकसित क्षेत्रों के विकास की समस्या रहती है, अतः सार्वजनिक व्यय के द्वारा इन क्षेत्रों में आधारभूत संरचना (Infra Structure) का निर्माण किया जा सकता है और विकास के लिए वित्तीय सहायता तथा उपादान (Assistance and Subsidy) प्रदान की जा सकती है।

7) सार्वजनिक क्षेत्र के आकार में वृद्धि द्वितीय महायुद्ध के बाद राष्ट्रीय आय की तुलना में सार्वजनिक क्षेत्र के कुल आधार में ही नहीं बल्कि सार्वजनिक दृष्टि से भी पर्याप्त वृद्धि हुई है जिसके कारण भी सार्वजनिक व्यय का महत्व बढ़ा है।

(३) लागत-लाभ विश्लेषण-लागत-लाभ विश्लेषण के नये परिवर्तनों से सार्वजनिक व्यय के और अधिक यथार्थ, आर्थिक मूल्यांकन का क्षेत्र बढ़ गया है, जिससे सार्वजनिक व्यय के अध्ययन को एक नई दिशा मिली है।

(9) नागरिकों की प्रत्याशाएँ-देश के नागरिक सदैव ही यह इच्छा रखते हैं कि उनके रहन-सहन के स्तर में र में निरन्तर सुधार होता रहे और सार्वजनिक व्यय द्वारा उन्हें और अधिक तथा श्रेष्ठ सुविधाएँ उपलब्ध होती रहें। अपनी विशिष्ट आय-स्तर का ध्यान किये बिना ही लोगों की प्रत्याशाएँ बहुत अधिक होती हैं। इन प्रत्याशाओं को पूरा करने में सार्वजनिक व्यय का महत्वपूर्ण स्थान है।

उपर्युक्त सभी घटकों के परिणामस्वरूप सार्वजनिक व्यय के विश्लेषण एवं महत्व में वृद्धि हुई है। आजकल सरकारें और अधिक भूमिका अदा कर रही हैं और वे विभिन्न सामाजिक सेवाओं तथा सार्वजनिक विनियोग कार्यक्रमों के लिए और अधिक सार्वजनिक व्यय की माँग कर रही हैं। इसके फलस्वरूप सार्वजनिक व्यय के क्षेत्र एवं स्वरूप का विस्तार हुआ है, अतः आजकल सार्वजनिक व्यय विभिन्न आर्थिक नीतियों को पूरा करने में महत्वपूर्ण अस्त्र बन गया है।
अनावश्यक व्यय किया जाता है जो कि भारतीय जनता पर एक भार है।

✓ सार्वजनिक व्यय के आर्थिक प्रभाव

(ECONOMIC EFFECTS OF PUBLIC EXPENDITURE)

सार्वजनिक व्यय से केवल सरकार की आवश्यकताएँ ही पूरी नहीं होतीं वरन् इसका देश के उत्पादन, उपभोग व वितरण पर भी महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ता है। प्रतिष्ठित अर्थशास्त्री एडम स्मिथ, रिकाडों, मिल आदि सार्वजनिक व्यय को अनुत्पादक श्रम के लिए भुगतान मानते थे परन्तु आधुनिक विचारधारा के अनुसार सार्वजनिक व्यय सर्वप्रथम तो समाज में क्रय-शक्ति के हस्तान्तरण को जन्म देता है जिससे माँग प्रभावित होती है तथा उत्पादन की मात्रा व प्रकृति आदि पर भी प्रभाव पड़ता है। दूसरा, सार्वजनिक व्यय का प्रत्यक्ष प्रभाव समाव की उत्पादन शक्ति, उपभोग प्रवृत्ति व वितरण व्यवस्था पर पड़ता है।

संक्षेप में, सार्वजनिक व्यय उचित दिशा में हो रहा है कि नहीं, इस बात की जाँच करने के लिए हमे सार्वजनिक व्यय से देश की अर्थव्यवस्था पर पड़ने वाले प्रभावों का अध्ययन करना पड़ेगा। ये प्रभाव बहुसंख्यक हो सकते हैं। 
सार्वजनिक व्यय से देश की अर्थव्यवस्था पर पड़ने वाले प्रभावों का निम्न शीर्षकों के अन्तर्गत अध्ययन कर सकते हैं:
✓ (1) उत्पादन पर प्रभाव (Effects on Production)
✓ (II) उपभोग पर प्रभाव (Effects on Consumption
(III) वितरण पर प्रभाव (Effects on Distribution )
(IV) अन्य प्रभाव (Other Effects)

(1) सार्वजनिक व्यय के उत्पादन पर प्रभाव (EFFECTS OF PUBLIC EXPENDITURE ON PRODUCTION) किसी देश में वस्तुओं के उत्पादन की प्रकृति एवं मात्रा पर सार्वजनिक व्ययों का महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ता है। इन प्रभावों का हम दो भागों में अध्ययन कर सकते हैं:
(अ) उत्पादन पर प्रत्यक्ष प्रभाव, तथा
(ब) उत्पादन पर परोक्ष प्रभाव ।

(अ) सार्वजनिक व्यय का उत्पादन पर प्रत्यक्ष प्रभाव (Direct Effects of Public Expenditure on Production) सरकार निम्नलिखित विधियों से सार्वजनिक व्यय के माध्यम से उत्पादन को प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित कर सकती है:
(i) उद्योगों की स्थापना प्रायः सभी देशों में किसी न किसी आधार पर सरकार कुछ उद्योगों की स्थापना का उत्तरदायित्व स्वयं ले लेती है और इन उद्योगों की स्थापना पर व्यय करके उत्पादन में वृद्धि करती है। यही नहीं, सार्वजनिक उद्योग देश में औद्योगिक विकास के लिए आवश्यक आर्थिक संरचना का निर्माण करते हैं; जैसे-विद्युत, परिवहन, संदेशवाहन, पूँजीगत एवं आधारभूत उद्योग जिसके फलस्वरूप देश के उद्योगों के विकास हेतु अनुकूल वातावरण का निर्माण होता है।
(ii) अनुदान एवं आर्थिक सहायता-सरकार उद्योगों को अनुदान एवं आर्थिक सहायता देकर पी उत्पादन वृद्धि में प्रत्यक्ष योगदान दे सकती है। इस प्रकार की सहायता सामान्यतया शिशु उद्योगों, विदेशी प्रति- योगिता से कुप्रभावित उद्योगों और हानि पर चलने वाले उद्योगों को प्रदान किये जाते हैं।
(iii) औद्योगिक अनुसंधान सरकार औद्योगिक अनुसंधान पर व्यय करके भी उत्पादन को प्रत्यक्ष रुप से प्रभावित कर सकती है। औद्योगिक अनुसंधान से ऐसे उपाय विकसित किये जा सकते हैं जिससे उत्पादन में आधुनिक तकनीकी का उपयोग करके उत्पादकता और उत्पादन में वृद्धि की जा सकती है।

(iv) प्रभावपूर्ण माँग में वृद्धि सरकार अपने व्ययों को इस प्रकार समायोजित कर सकती है जिससे देश को प्रभावपूर्ण माँग में वृद्धि हो। बढ़ती हुई प्रभावपूर्ण माँग रोजगार और उत्पादन पर अनुकूल प्रभाव डालती है। 
व) सार्वजनिक व्यय का उत्पादन पर परोक्ष प्रभाव (Indirect Effects of Public Expenditure on Production)

सार्वजनिक व्यय परोक्ष रूप से भी उत्पादन वृद्धि में सहायक हो सकता है। इस दृष्टि से प्रो. डाल्टन ने सार्वजनिक व्यय के प्रभावों का अध्ययन निम्नलिखित तीन शीर्षकों के अन्तर्गत किया है :

(अ) काम करने तथा बचत करने की शक्ति पर प्रभाव।
(ब) काम करने तथा बचत करने की इच्छा पर प्रभाव ।
(स) आर्थिक साधनों के स्थानान्तरण पर प्रभाव ।

(अ) काम करने तथा बचत करने की शक्ति पर प्रभाव-सार्वजनिक व्यय व्यक्तियों को कार्य करने बचत करने की शक्ति को कई प्रकार से प्रभावित कर सकता है; जैसे :
(i) क्रयशक्ति में वृद्धि (सार्वजनिक व्यय द्वारा क्रयशक्ति का हस्तान्तरण राज्य से जनता में विभिन्न रूपों में होता है जिससे अनेक व्यक्तियों की क्रयशक्ति (आय) बढ़ती है। पेन्शन, भत्ते, बेकारी व बीमारी के समय मिलने वाले लाभ व वस्तुओं तथा सेवाओं पर किया गया व्यय आदि ऐसे व्यय है जिससे व्यक्तियों को क्रयशक्ति (आय) में वृद्धि होती है इिस प्रकार के व्ययों में वृद्धि होने से व्यक्तियों का जीवन स्तर ऊँचा उठता
है और उनके शारीरिक तथा मानसिक कल्याण में वृद्धि होती है। फलस्वरूप उनकी कार्यक्षमता में वृद्धि होती है,जो दीर्घकाल में उत्पादन को बढ़ाती है।
चूंकि निर्धन व्यक्ति अधिकतर अशिक्षित होते हैं, इसलिए ऐसी शंका कुछ सीमा तक सत्य हो सकती है, फिर भी ये कहा जाता है कि दीर्घकाल में उनकी कार्यक्षमता में अधिक वृद्धि होगी।
(ii) वस्तुओं व सेवाओं का प्रबन्ध राज्य अपने व्ययों द्वारा निर्धन व्यक्तियों की वस्तुएँ व सेवाएँ प्रत्यक्ष रूप में प्रदान करके इनकी कार्यक्षमता को बढ़ा सकती है। राज्य इस प्रकार की सेवाओं की व्यवस्था या तो निःशुल्क या फिर सस्ते मूल्य पर करता है। जैसे-निःशुल्क शिक्षा, चिकित्सा और सस्ते तथा कम किराये वाले मकान आदि के रूप में सहायता प्रदान करना।
(iii) सुविधाएँ प्रदान करना-राज्य अपने व्ययों द्वारा कुछ ऐसी सुविधाएँ प्रदान कर सकता है जिनको सहायता से व्यक्ति अधिक अच्छी प्रकार से उत्पादन कर सकता है। उदाहरण के लिए, सड़क, सिंचाई, विद्युत् आदि के विकास पर किया गया व्यय प्रत्यक्ष रूप से उत्पादन को प्रोत्साहित करता है।
(iv) बचत करने की शक्ति में वृद्धि बचत दो प्रकार से की जा सकती है-प्रथम, उपभोग को कम - करके, द्वितीय, आय को बढ़ाकर। चूँकि सार्वजनिक व्यय से व्यक्तियों की क्रय-शक्ति में वृद्धि होती है इसलिये व्यक्ति अधिक बचत करने के लिए समर्थ हो जाते हैं। उपरोक्त विवेचन से स्पष्ट हो जाता है कि "सार्वजनिक व्यय से व्यक्तियों की कार्य करने व बचत करने की शक्ति पर अच्छा प्रभाव पड़ता है। यदि सरकार की व्यय-नीति देश के निर्माण में सहायक होती है तो अवश्य ही देश में उत्पादन बढ़ेगा।"
उससे उत्पादन में वृद्धि होगी।

सार्वजनिक व्यय के उपभोग पर प्रभाव
(EFFECT OF PUBLIC EXPENDITURE ON CONSUMPTION)

सार्वजनिक व्यय का उपभोग पर महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ता है, जैसा कि निम्न बिन्दुओं से स्पष्ट हो जायेगा।

(1) यदि सरकार ऊँची उपभोग प्रवृत्ति वाले वर्गों को सार्वजनिक व्यय द्वारा आय का हस्तान्तरण को तो उपभोग में तीव्र गति से वृद्धि की जा सकती है और उनके जीवन स्तर में सुधार लाया जा सकता है।

(2) चूँकि मन्दी का आविर्भाव प्रभावपूर्ण माँग की कमी के कारण होता है अतः मन्दीकाल में कम आप वाले व्यक्तियों को सरकार द्वारा आर्थिक सहायता प्रदान की जाती है तो उनको आय बढ़ने के कारण प्रभावपूर्ण माँग की कमी को बहुत सीमा तक पूरा किया जा सकता है, इस प्रकार की सहायता वृद्धावस्था पेंशन, बेरोजगारो लाभ, अपाहिज सहायता आदि के रूप में प्रदान की जा सकती है। अमेरिका के 1935 के मन्दीकाल के समय इस प्रकार की आर्थिक सहायता देकर नागरिकों की प्रभावपूर्ण मांग में वृद्धि करने का प्रयत्न किया गया था।


सार्वजनिक व्यय का वितरण पर प्रभाव
( EFFECTS OF PUBLIC EXPENDITURE ON DISTRIBUTION)

प्रो. पीगू ने अपनी पुस्तक 'Economics of Welfare' में बताया है कि लोक कल्याण में वृद्धि देश दे वस्तुओं और सेवाओं का उत्पादन बढ़ाकर की जा सकती है। परन्तु यदि सम्भव न हो तो लोक कल्याण व्यय करके को वृद्धि राष्ट्रीय लाभांश के वितरण के द्वारा समाज में धन की असमानता को दूर करके भी की जा सकती है। जो पौगू के अनुसार, "कोई भी कार्य जो गरीबों की वास्तविक आय के कुल भाग में वृद्धि करता हो, बरातें किसी भी दृष्टिकोण से राष्ट्रीय आय में कमी न आये, सामान्यतः आर्थिक कल्याण में वृद्धि करेगा।"
सरकार धन के वितरण में समानता दो प्रकार से स्थापित कर सकती है-करारोपण द्वारा तथा सार्वजनिक अब द्वारा 'यद्यपि दोनों क्रियाएँ एक-दूसरे पर अवलम्बित हैं, किन्तु यहाँ हम केवल सार्वजनिक व्यय के प्रभावों का अध्ययन करेंगे, जो निम्न हैं:

(1) प्रतिगामी (Regressive), (2) आनुपातिक (Proportional) और (3) प्रगतिशील (Progressive) व्यय डाल्टन का मत है कि घर की भाँति सार्वजनिक व्यय भी तीन प्रकार के हो सकते है-प्रतिगामी, आनुपातिक और प्रगतिशील ।

(1) प्रतिगामी व्यय-किसी वर्ग की जितनी आय कम होती है, सार्वजनिक व्यय से यदि इस वर्ग को उड़ना ही लाभ कम अनुपात में प्राप्त हो पाता है तो यह सार्वजनिक व्यय प्रतिगामी हैं; जैसे-यदि भारतवर्ष में गरीबों के बच्चों के लिए प्राथमिक शिक्षा पर व्यय न करके सरकार उच्च वर्ग के बच्चों के लिए पब्लिक स्कूल पर खर्च करती है तो यह प्रतिगामी व्यय कहलायेगा।

(2) आनुपातिक व्यय-यदि विभिन्न बर्गों को, उनकी आय के अनुपात में हो सार्वजनिक व्यय से लाभ प्राप्त होता है तो इस व्यय को आनुपातिक व्यय कहते हैं; जैसे-सरकारी कर्मचारी को मकान का भत्ता वेतन का 12 प्रतिशत मिलता है।

(3) प्रगतिशील व्यय-किसी वर्ग की आय जितनी कम है, सार्वजनिक व्यय से होने वाले लाभ का अनुपात यदि उसे उतना ही अधिक मिलता है तो व्यय प्रगतिशील होगा; जैसे-निर्धन वर्ग के लिए निःशुल्क शिक्षा, चिकित्सा पर व्यय, वृद्धावस्था पेंशन आदि।

इन तीनों प्रकार के व्ययों में लोगों की आय की असमानता में कमी करने में प्रगतिशील व्यय सर्वश्रेष्ठ माना गया है। सार्वजनिक व्यय जितना ही तीव्र प्रतिगामी होगा, आय की असमानता उतनी ही अधिक बढ़ेगी देथा व्यय जितना ही प्रगतिशील होगा आय की असमानता उतनी ही अधिक तेजी से कम होगी। अधिकतम सामाजिक कल्याण की दृष्टि से भी यह आवश्यक है कि सार्वजनिक व्यय में प्रगतिशील अनुदान नौति का हो पालन किया जाय। प्रगतिशील व्यय के निम्न रूप हो सकते हैं:

(अ) नकदी के रूप में आर्थिक सहायता देना जैसे, वृद्धावस्था पेंशन, दुर्घटना लाभ, प्रसव लाभ, बेकारी एवं बीमारी का लाभ आदि देना ।

(क) निःशुल्क या सस्ती सेवाएँ और वस्तुएँ प्रदान करना जैसे, निःशुल्क शिक्षा तथा चिकित्सा सुविधाएँ, सस्ता मकान, अनाज आदि, बच्चों को स्कूल में मुफ्त दूध, फल देना इत्यादि।
(स) व्यक्तियों की आवश्यकताओं से समायोजन करना- अर्थात् जिस व्यक्ति के कुटुम्ब की संख् जितनी ही अधिक है उसे उतनी ही आर्थिक सहायता प्रदान की जाय।

उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि निर्धन लोगों की आय बढ़ाने और असमानताओं को कम करने के प्रगतिशील सार्वजनिक व्यय का योगदान बहुत महत्वपूर्ण है परन्तु इसकी भी कुछ सीमाएँ हैं-प्रथम, सार्वजनिक व्यय से लोगों को अधिक सुविधाएँ मिलने लगती हैं जिससे उसमें कार्य करने की इच्छा कम हो जाती है। फलतः इन सेवाओं से यदि एक ओर धन के वितरण में समानता आती है तो दूसरी ओर उत्पादन गिरने लगत है और राष्ट्रीय आय कम हो जाती है। द्वितीय, सार्वजनिक व्यय को पूरा करने के लिए भारी करारोपण कर पड़ता है जिससे उत्पादन निरुत्साहित होता है। डाल्टन के ही शब्दों में, "यदि किसी अनुदान के कारण कोई व्यक्ति उसके मुकाबले कम काम तथा कम बचत करता है जितना कि वह अन्य स्थिति में करता, तो इसके उसकी आय बढ़ाने में अनुदान का प्रभाव कम हो जायेगा और इसके विपरीत दशा में अनुदान से प्रभाव के वृद्धि हो जायेगी।"

अतः यह अत्यन्त आवश्यक है कि सार्वजनिक व्यय की योजना इस प्रकार बनायी जानी चाहिए कि काम करने, बचत करने और विनियोग करने की इच्छा पर कोई विपरीत प्रभाव न पड़े।

(IV) सार्वजनिक व्यय के अन्य प्रभाव
(OTHER EFFECTS OF PUBLIC EXPENDITURE)

सार्वजनिक व्यय के अन्य प्रभाव निम्न प्रकार हैं:

(1) सार्वजनिक व्यय और आर्थिक स्थिरता-मन्दीकाल में सार्वजनिक व्यय सार्वजनिक व्यय के द्वारा विभिन्न प्रकार से विनियोगों और अन्य उपयोगों में वृद्धि करके मन्दीकाल में रोजगार स्तर को ऊपर उठाया जा सकता है। मन्दीकाल में पूर्ण रोजगार के स्तर को प्राप्त करने के लिए सरकार की ओर से जो व्यय किया जाता है उसे क्षतिपूरक व्यय कहते हैं)

सार्वजनिक व्यय तथा स्फीति काल-स्फीति की दशा में मूल्य बढ़ते जाते हैं और वस्तुएँ स्वल्प होतों जाती हैं। सार्वजनिक व्यय के द्वारा मुद्रा-स्फीति को कुछ अंश तक नियन्त्रित किया जा सकता है। मुद्रा-स्कोत को दशा में सरकार उत्पादन पर इस प्रकार से व्यय करती है; जिससे उत्पादन में यथेष्ठ मात्रा में वृद्धि हो जाय और वस्तुओं की स्वल्पता समाप्त हो जाय

(2) सार्वजनिक व्यय और आर्थिक विकास-विकसित देशों की मुख्य समस्या 'आर्थिक स्थिरता' को बनाये रखने की है और इस दृष्टि से सार्वजनिक व्यय मन्दी व तेजी को नियंत्रित करके एक महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता है। इसके विपरीत, विकासशील राष्ट्रों की मुख्य समस्या तेजी के साथ आर्थिक विकास करने को है। अब प्रश्न यह उठता है कि सरकारी व्यय इस उद्देश्य की पूर्ति में कहाँ तक योगदान दे सकता है। आर यह बात सौ प्रतिशत स्वीकार की जा चुकी है कि सार्वजनिक व्यय आर्थिक विकास का एक सशक्त माध्यम है।

(अर्द्धविकसित देशों के आर्थिक विकास में सार्वजनिक व्यय निम्नलिखित रूप में योगदान दे सकता

(i) यातायात, संवादवाहन, शक्ति व सिंचाई पर व्यय करके, देश की आर्थिक संरचना को सुदृढ़ करके।

(ii) सरकार शिक्षा, स्वास्थ्य, सामाजिक सुरक्षा व तकनीकी प्रशिक्षण पर बड़ी मात्रा में व्यय करके देश में मानव पूँजी के निर्माण में वृद्धि करके।

(iii) व्यक्तिगत विनियोग को सार्वजनिक व्यय के द्वारा प्रोत्साहित करके ।

(iv) सामाजिक महत्व के उद्योगों का विकास करके।

(v) सामाजिक सुरक्षा और गरीबों के कल्याण के लिए योजनाएँ चालू कर आय और सम्पत्ति को असमानताओं को कम करके ।

(vi) खोज और अनुसंधान पर बड़ी मात्रा में व्यय करके

वस्तुनिष्ठ प्रश्न (Objective Type Questions)

सही विकल्प चुनकर लिखिए:
1. सार्वजनिक व्यय के महत्व में विशेष रूप में वृद्धि हुई है:

(अ) उन्नीसवीं शताब्दी में
(ब) बीसवीं शताब्दी में
(स) अठारहवीं शताब्दी में
(द) एडम स्मिथ की पुस्तक 'राष्ट्रों का धन' के प्रकाशन के बाद ।

2. सार्वजनिक व्यय के महत्व में वृद्धि का कारण कहा जा सकता है:
(अ) आर्थिक विकास एवं नियोजन
ब) कल्याणकारी राज्य की स्थापना
(स) आर्थिक स्थायित्व
(द) उपर्युक्त सभी।

3. प्रायः सार्वजनिक व्यय के द्वारा सन्तुष्टि की जाती है:
(अ) वर्ग विशेष की आवश्यकताओं की
(ब) व्यक्तिगत आवश्यकताओं की
(स) सामूहिक आवश्यकताओं की
(द) उपर्युक्त में से कोई नहीं।

4. सार्वजनिक व्यय का मुख्य सिद्धान्त है:
(अ) अधिकतम सामाजिक कल्याण का सिद्धान्त
(ब) स्वीकृति का सिद्धान्त
(स) लाभ का सिद्धान्त
(द) उपर्युक्त में से कोई नहीं।

5. सार्वजनिक व्यय का काम तथा बचत करने की इच्छा पर प्रतिकूल प्रभाव पड़े इसके लिए सार्वजनिक व्यय:
(अ) वस्तुओं के रूप में किया जाना चाहिए
(ब) धीरे-धीरे करके किया जाना चाहिए
(स) सेवाओं के रूप में किया जाना चाहिए
(द) उपर्युक्त सभी ।

6 काम तथा बचत करने की इच्छा पर सार्वजनिक व्यय का प्रभाव सदैव :
(अ) अनुकूल होता है
(ब) प्रतिकूल पड़ता है
(स) सार्वजनिक व्यय की प्रकृति तथा सरकार की नीति पर निर्भर करता है
(द) उपर्युक्त में से कोई नहीं।

7. शिक्षा, प्रशिक्षण, जन-स्वास्थ्य आदि पर किया गया व्यय कहलाता है:
(अ) पूँजी निर्माण
(ब) मानव पूँजी
(स) तकनीकी प्रगति
(द) उपर्युक्त में से कोई नहीं।

8 किसी वर्ग की आय जितनी कम हो, सार्वजनिक व्यय से होने वाले लाभ का अनुपात यदि उसे उतना हो अधिक मिलता है तो उसे कहते हैं:
(अ) प्रतिगामी व्यय
(ब) आनुपातिक व्यय
(स) प्रगतिशील व्यय
द) उपर्युक्त में से कोई नहीं।

9. मन्दीकाल में पूर्ण रोजगार प्राप्त करने के लिए जो व्यय किये जाते है, उसे कहा जाता है:
(अ) विनियोग
(ब) आर्थिक सहायता
(स) क्षतिपूरक व्यय
(द) उपर्युक्त में से कोई नहीं।

10. निम्नलिखित में से कौन-से व्यय आर्थिक विकास में योगदान करते है:
(अ) आर्थिक संरचना के निर्माण पर व्यय
ब) मानव पूँजी के निर्माण पर व्यय
(स) खोज और अनुसंधान पर व्यय
(द) उपर्युक्त सभी ।

(उत्तर-1. (ब)
2. (द)
3. (स

4. (अ)
5. (द)
6. (स)
7. (ब)
8. (स)
9. (स)
10. (द)।





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