दरिद्रता का दुष्चक्र

VICIOUS CIRCLE OF POVERTY)

अल्पविकसित देश दखिता के दुश्चकों में पड़े हुए हैं। बाजार की अपूर्णताएँ, अर्धविकसित बसाधन, अशिक्षा, निम्न तकनीकी विकास एवं पूंजी की कमी, आदि कारणों से अर्द्ध-वित राष्ट्रों में उत्पादकता का स्तर निम्न रहता है। निम्न उत्पादकता का अर्थ है कि वास्तविक आय कम हो जाती है और उससे बचत व पूंजी की कमी होकर निम्न उत्पादकता को प्रोत्साहन मिलता है । मेयर एवं बाल्डविन का मत है कि "वास्तविक साधनों की कमी एवं निम्न उत्पादकता से इस कथन का आधार बनता है कि एक देश गरीब इसलिए है क्योंकि वह गरीब है ।"" इस सम्बन्ध में रेगनर नर्कसे का कथन है कि, "इसमें शक्तियों का चक्रीय प्रभाव इस ढंग से होता है कि इनके कार्य और प्रतिक्रिया का एक-दूसरे पर इस प्रकार प्रभाव पड़ता है कि वह गरीब राष्ट्र को गरीब की स्थिति में ही रखता है। इस प्रकार की स्थिति, जो कि समूचे देश से सम्बन्धित हो तो यही कहा जा सकता है कि 'एक देश इसलिए गरीब है, क्योंकि वह गरीब है।

बचत के निम्न स्तर का परिणाम होता है निवेश की निम्न दर व पूंजी की कमी होना । पूंजी की कमी का परिणाम उत्पादकता का निम्न स्तर है। अतः पूर्ति की ओर से दुश्वक पूरा हो जाता है । प्राकृतिक साधनों का विकास देश में लोगों की उत्पादन क्षमता पर निर्भर रहता है। यदि लोग पिछड़े हैं तो उनमें ज्ञान व उद्यमीय क्रियाशीलता का अभाव पाया जाता है।

मूल दुश्चक ( vicious circle) इस तथ्य से उत्पन्न होता है किसी की कमी अपूर्णताओं अधिक पिछड़ेपन तथा अल्पविकास के कारण अल्पविकसित देशों में कुल उत्पादकता कम होती है । निम्न उत्पादकता निम्न वास्तविक आय में झलकती है। वास्तविक आय के निम्न स्तर का मतलब बचत की निम्न दर है। वास्तविक आय का निम्न स्तर माँग के स्तर को गिरा देता है जिसमे आगे निवेश का अनुपात गिर जाता है तथा उसने पूंजी की कमी हो जाती है एवं उत्पादकता का स्तर निम्न हो जाता है। दुश्चक्र की स्थिति को निम्न चित्रों में प्रदर्शित किया गया है
आर. एन. भट्टाचार्य का मत है कि, "अर्थव्यवस्था का अल्प विकास तथा दरिद्रता - वाची शब्द है। कोई भी देश इसलिए गरीब है कि वह अल्पविकसित है और कोई राष्ट्र इस कारण अल्पविकसित है कि यह दरिद्र है और इसलिए अल्पविकसित रहता है कि उसके पास विकास करने के लिए आवश्यक साधनों का अभाव बना रहता है। दरिद्रता एक अभिशाप है, परन्तु उससे भी बड़ा अभिशाप यह है कि वह स्वयं को चिरस्थायी बनाये रखती है ।"*

परिस्थितियों की संचयी प्रकृति के कारण स्थिति और भी अधिक खराब हो जाती है।
प्रकार घूमता है कि वे शक्तियां परस्पर क्रिया व प्रतिक्रिया करती हुई निर्धन राष्ट्र को निर्धनता की अवस्था में ही रखती हैं। उदाहरणस्वरूप, एक निर्धन व्यक्ति को खाने के लिए पर्याप्त खाद्य नहीं मिलता, खाद्य की कमी के कारण वह निर्बल हो जाता है, निर्बल होने से उसकी कार्यक्षमता कम हो जाती है, जिसका अर्थ यह होता है कि वह निर्धन है, जिसका फिर अर्थ यह होता है कि उ पर्याप्त खाना नहीं मिलता और यह क्रम फिर चलता रहता है। इस प्रकार की परिस्थिति सम्पूर्ण देश में होने से यह कहा जा सकता है कि देश इसलिए निर्धन है कि वह निर्धन है ।""

निर्धनता के कुचक्र को निम्न प्रकार दिखाया जा सकता है:

संलग्न चित्र में निर्धन राष्ट्र में पर्याप्त खाद्यान्न का अभाव पाया जाता है जिससे जनता निर्बल हो जाती है और उसमें कार्यक्षमता की कमी हो जाती है जो जनता को और निर्धन बनाती है। इन देशों में पर्याप्त पूंजी का अभाव पाया जाता है, जिससे यहाँ आय की कमी बनी रहती है, वचत सम्भव नहीं हो पाती और पर्याप्त मात्रा में पूंजी का निर्माण नहीं हो पाता है । यह कुचक्र निरन्तर चलता रहता हैं।
निर्धनता के कुचक्र की माँग व पूर्ति दोनों पक्षों की दृष्टि से अध्ययन किया जा सकता है। निर्धनता के कुचक्र का मांग पक्ष यह है कि वास्तविक आय कम होने व विनियोग कम होने से उत्पादकता कम होती है। आय कम होने से ऋय शक्ति कम रहती है और विनियोग को कम प्रेरणा मिलती है। निर्धनता के कुचक्र के माँग पक्ष को चित्र 'अ' के अनुसार दिखाया जा सकता है ।

निर्धनता के कुचक्र का पूर्ति पक्ष यह है कि उत्पादकता कम होने से वास्तविक आय में कमी रहती है। विनियोग कम होने से उत्पादकता कम होती है। बचत कम होने से विनियोग कम रहता है । बचत करने की क्षमता कम होने से कम बचत हो पाती है। आय कम होने से बचत करने की क्षमता भी कम हो जाती है। यह एक चलता रहता है और राष्ट्र निर्धन ही बना रहता है । इस प्रकार पूर्ति पक्ष को वित्र 'व' के अनुसार भी समझाया जा सकता है। इन दोनों चक्रों में वास्तविक आय कम होने से उत्पादकता में कमी बनी रहती है। परन्तु

यह आवश्यक नहीं है कि गरीब राष्ट्र सदैव गरीब ही बना रहे। यह भी सम्भव हो सकता है कि गरीब राष्ट्र धनी बनने की प्रवृत्ति की ओर अग्रसर होकर समस्त क्रियाओं को गतिशील करके सभी घटकों को बल प्रदान करके देश को विकास की ओर ले जाये। विभिन्न प्रकार की घटनाओं का भी देश पर प्रभाव पड़ता है, जैसे बचत आन्दोलन देश की अर्थव्यवस्था को देर से परन्तु युद्ध का भय अर्थव्यवस्था को शीघ्र ही गतिशीलता प्रदान कर देगा। चक्र की समस्त घटनाएँ एक-दूसरे से सम्बन्धित होने से किसी एक घटना को दूसरी घटना की तुलना में अधिक महत्व प्रदान नहीं किया जा सकता । पूंजी के अतिरिक्त खनिज सम्पत्ति के अभाव, सम्भव नहीं हो पाता। विश्व के कुछ राष्ट्रों में प्राकृतिक साधनों की बाहुल्यता पाये जाने पर भी उनका उचित रूप से विदोहन सम्भव न होने के कारण वहाँ बचत व विनियोग क्षमता कम होकर पूंजी का अभाव बना रहता है।


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