कल्याण अर्थशास्त्र
कल्याण - अर्थशास्त्र
[WELFARE ECONOMICS]
काफी लम्बे समय तक अर्थशास्त्र का स्वभाव विवाद का विषय बना रहा और अर्थशास्त्री यह निश्चित करने में ही लगे रहे कि अर्थशास्त्र एक वास्तविक विज्ञान है अथवा आदर्श विज्ञान । इस सम्बन्ध में 'अर्थशास्त्र का स्वभाव' शीर्षक अध्याय में विस्तृत विवेचना की जा चुकी है। अब प्रायः यह माना जाने लगा है कि अर्थशास्त्र एक वास्तविक विज्ञान होने के साथ-साथ कल्याण- अर्थशास्त्र भी है ।
कल्याण- अर्थशास्त्र का अर्थ
[MEANING OF WELFARE ECONOMICS]
कल्याण - अर्थशास्त्र का अर्थ जानने से पूर्व 'कल्याण' का अर्थ जान लेना अति आवश्यक है। कल्याण का अर्थ भी दोनों रूपों—व्यक्तिगत कल्याण (Individual welfare) तथा सामाजिक कल्याण (Social welfare) में जानना आवश्यक है । कल्याण एक व्यक्तिगत विचार एवं मानसिक अनुभूति है जो मनुष्य को सन्तुष्टि को व्यक्त करती है। इस दृष्टि से व्यक्तिगत कल्याण मनुष्य के सन्तोष को बताता है एवं जिसको अधिकतम करने हेतु मनुष्य सदैव प्रयत्नरत रहता है । व्यक्ति- गत मानसिक स्थिति से सम्बन्धित होने के कारण इसको एक व्यक्ति के सन्दर्भ में सदैव मापा जा सकता है। इसके विपरीत, सामाजिक कल्याण एक सामूहिक विचार है जो समाज में रहने वाले सभी व्यक्तियों की सन्तुष्टि से सम्बन्धित होता है। जहाँ तक सामाजिक अथवा सामूहिक कल्याण का प्रश्न है, इसको मापना अत्यन्त कठिन है क्योंकि समाज में सभी व्यक्तियों के विचार, अनु- भूतियाँ, निर्णय एवं निष्कर्ष एकसमान नहीं होते हैं। एक व्यक्ति विशेष का कल्याण समाज के लिए हानिकारक भी हो सकता है। इसी कारण अब कल्याण को सामाजिक दृष्टिकोण से देखा जाने लगा है। यद्यपि सामाजिक कल्याण को मापना एक कठिन कार्य है, फिर भी अनेक बातों को ध्यान में रखते हुए सामाजिक कल्याण को मापने एवं उसमें होने वाली वृद्धि के अनुमान लगाने के लिए प्रयास किये जाते हैं। किसी आर्थिक घटना से कुछ व्यक्ति लाभान्वित होते हैं जबकि अन्य नहीं । ऐसी स्थिति में यदि उस घटना अथवा निर्णय से लाभान्वित होने वाले व्यक्तियों की संख्या यदि अपेक्षतया अधिक होती है तो यह माना जायगा कि सामाजिक कल्याण में वृद्धि हो रही है।
कल्याण के उपर्युक्त अर्थ के सन्दर्भ में कल्याण-अर्थशास्त्र को अर्थशास्त्र की एक ऐसी शाखा के रूप में परिभाषित किया जा सकता है जिसके अन्तर्गत समाज के कल्याण को अधिकतम करने हेतु बनायी गयी आर्थिक नीतियों का विश्लेषण किया जाता है। कल्याण-अर्थशास्त्र की मूल समस्या सामाजिक कल्याण को अधिकतम करना है। इस कार्य के लिए कल्याण-अर्थशास्त्र- (1) कल्याण को अधिकतम करने हेतु सुझाव प्रस्तुत करता है,
(2) ऐसे सिद्धान्तों का प्रतिपादन करता है जिनके आधार पर यह मापा जा सके कि आर्थिक नीतियाँ कल्याण को अधिकतम करने हेतु उपयुक्त हैं अथवा नहीं।
पीगू (Pigou) के अनुसार, "कल्याण-अर्थशास्त्र उन प्रभावों की खोज से सम्बन्ध "जिनके द्वारा विश्व अथवा किसी देश के आर्थिक कल्याण को बढ़ाया जा सकता है।"" इस प्रकार पीगू के अनुसार कल्याण-अर्थशास्त्र का उद्देश्य एवं कार्य सामाजिक कल्याण में वृद्धि करता है। प्रो. रेडर (Reder) ने कल्याण-अर्थशास्त्र को इस प्रकार परिभाषित किया है" का अर्थशास्त्र अर्थ-विज्ञान की वह शाखा है जो आर्थिक नीतियों के लिए औचित्य के मानदण्ड की स्थापना एवं उनके प्रयोग करने का प्रयास करती है ।"" रेडर के अनुसार कल्याण-अर्थशास्त्र का मुख्य कार्य कल्याण को अधिकतम करने हेतु आर्थिक नीतियों के मूल्यांकन के लिए मानदण्ड प्रतिपादित करना है। सितोवस्की (Scitovosky) ने कल्याण- अर्थशास्त्र को नीति से सम्बन्धित किया है- "कल्याण-अर्थशास्त्र आर्थिक सिद्धान्त का वह भाग है जो नीति से सम्बन्धित होता है । "3
उपर्युक्त विवेचन से यह स्पष्ट हो जाता है कि कल्याण-अर्थशास्त्र नीतिशास्त्र से घनिष्ठ रूप से सम्बन्धित होता है और इसका सम्बन्ध आर्थिक विश्लेषण की उस शाखा से होता है जिसके द्वारा ऐसे मानदण्डों की स्थापना की जाती है जिनके आधार पर आर्थिक नीतियों का निर्माण करके सामाजिक कल्याण को अधिकतम किया जा सके।
कल्याण- अर्थशास्त्र के उद्देश्य
[OBJECTIVES OF WELFARE ECONOMICS]
कल्याण-अर्थशास्त्र का मूल उद्देश्य एवं समस्या सामाजिक कल्याण को अधिकतम करना होता है तथा इसके सभी उद्देश्य किसी न किसी प्रकार से इसी पर आधारित है। इसके उद्देश्य निम्नवत् हैं
(1) कल्याण-अर्थशास्त्र का उद्देश्य ऐसे सिद्धान्तों, उपायों एवं मानदण्डों की खोज करना होता है जिनका प्रयोग करके सामाजिक कल्याण को अधिकतम बनाया जा सके। (2) कल्याण-अर्थशास्त्र का उद्देश्य अर्थशास्त्र में नैतिक मूल्यों (Ethical values) का प्रयोग करके कल्याण के सन्दर्भ में उन 'मूल्यों का निर्णय' (Value judgement) एवं मूल्यांकन करना होता है । उदाहरणार्थ, नैतिक मूल्यों के आधार पर यह निर्णय लिये जाते हैं कि देश में बेरोजगारी दूर करनी चाहिए, आय एवं धन की विषमताएँ समाप्त करनी चाहिए, समान कार्य हेतु समान वेतन देना चाहिए, सभी क्षेत्रों का समान आर्थिक विकास करना चाहिए, आदि। कल्याण-अर्थशास्त्र का कार्य इन निर्णयों के आधार पर आर्थिक नीतियां तैयार करवाना एवं वाद में उन नीतियों का मूल्यांकन करना होता है । (3) कल्याण- अर्थशास्त्र का उद्देश्य ऐसे मापदण्डों को विकसित करना भी होता है जिनके आधार पर दो विभिन्न स्थितियों के मध्य कल्याण में पाये जाने वाले अन्तर को मापा जा सके ।
वास्तविक एवं कल्याण - अर्थशास्त्र में अन्तर (Difference between Positive and Welfare Economics)
कल्याण-अर्थशास्त्र एवं वास्तविक अर्थशास्त्र में अन्तर जानने से पूर्व वास्तविक अर्थशास्त्र का अर्थ जान लेना भी महत्वपूर्ण है। वास्तविक अर्थशास्त्र आर्थिक विश्लेषण की वह शाला है जिसके अन्दर विभिन्न आर्थिक घटनाओं के कारण एवं परिणाम' के सम्बन्ध की व्याख्या की जाती है । आर्थिक घटनाओं के कारणों एवं उनके परिणामों के नैतिक पहलू के सम्बन्ध में वास्तविक अर्थशास्त्र
(1 "Welfare Economics is concerned to investigate the dominant influences through which the economic welfare, of the world, or of a particular country is likely to be increased." -A. C. Pigou. 2 “Welfare Economics is the branch of economic science that attempts to estab-lish and apply criteria of propriety to economic policies." -M. W. Reder.
3 "Welfare Economics is that part of general body of economic theory which is concerned with policy."T. Scitovosky.)
तटस्थ रहता है, इसका कार्य तो उन तथ्यों को यथावत प्रस्तुत करना होता है। इसके विपरीत, कल्याण-अर्थशास्त्र में आर्थिक नीतियों का नैतिक मूल्यों के दृष्टिकोण से मूल्यांकन एवं उपयुक्तता का परीक्षण किया जाता है। इन आधारों पर वास्तविक एवं कल्याण-अर्थशास्त्र में निम्न प्रकार अन्तर किया जा सकता है :
(1) वास्तविक अर्थशास्त्र में आर्थिक सिद्धान्तों का प्रतिपादन किया जाता है, जबकि कल्याण- अर्थशास्त्र इन सिद्धान्तों को अधिकतम कल्याण हेतु प्रयोग करने का मार्ग प्रशस्त करता है ।
(2) वास्तविक अर्थशास्त्र आर्थिक तत्वों का यथावत् रूप में अध्ययन करता है, जबकि कल्याण- अर्थशास्त्र आदर्शात्मक दृष्टिकोण से आर्थिक तत्वों का परीक्षण करता है।
(3) वास्तविक अर्थशास्त्र नैतिक मूल्यों (Ethical values) से स्वयं को अलग रखता है, जबकि कल्याण - अर्थशास्त्र का नैतिक मूल्यों से घनिष्ठ सम्बन्ध होता है।
(4) वास्तविक अर्थशास्त्र या है' से सम्बन्धित होता है, जबकि कल्याण-अर्थशास्त्र 'क्या होना चाहिए' से।
(5) वास्तविक अर्थशास्त्र आर्थिक नीतियों का परीक्षण नहीं करता है, जबकि कल्याण- अर्थशास्त्र आर्थिक नीतियों की उपयुक्तता का परीक्षण करके कल्याण को अधिकतम करने हेतु उन नीतियों में सुधार करने के लिए सुझाव भी देता है ।
(6) वास्तविक अर्थशास्त्र आर्थिक अध्ययन का सैद्धान्तिक पथ है, जबकि कल्याण-अर्थशास्त्र व्यावहारिक ।
कल्याण- अर्थशास्त्र का विकास
[DEVELOPMENT OF WELFARE ECONOMICS]
समाज कल्याण को अधिकतम करने एवं उसके मापन हेतु प्राचीन काल से ही विभिन्न सिद्धान्त प्रस्तुत किये गये। इन सिद्धान्तों का क्रमबद्ध अध्ययन करने हेतु कल्याण-अर्थशास्त्र को निम्न प्रकार विभक्त किया जा सकता है :
पुराना कल्याण-अर्थशास्त्र (Old Welfare Economics)
प्राचीनकाल से ही कल्याण सम्बन्धी विचार किसी न किसी रूप में प्रचलित रहे हैं। वणिक- बादी, प्रकृतिवादी एवं परम्परावादी विचारकों ने भी कल्याण-अर्थशास्त्र पर अपने विचार व्यक्त
किये हैं, लेकिन उनके द्वारा व्यक्त किये गये विचार अधिक वैज्ञानिक नहीं थे। वणिकवादियों ने सोने एवं चाँदी के भण्डारों को अधिकतम करने को कल्याण माना, जबकि प्रकृतिवादियों ने शुद्ध उत्पादन में वृद्धि को कल्याण में वृद्धि का द्योतक माना। इसी प्रकार, परम्परावादी अर्थशास्त्रियों ने भी धन के उत्पादन को अधिकतम करने का सम्बन्ध कल्याण से स्थापित किया। लेकिन इस समय तक कल्याण-अर्थशास्त्र के सम्बन्ध में व्यक्त किये गये विचार अवैज्ञानिक एवं अपूर्ण ही रहे।
मार्शल (Marshall), पीगू (Pigou) तथा कैनन (Cannan) आदि ने कल्याण-अर्थशास्त्र के सम्बन्ध में विस्तृत विचार व्यक्त किये। यद्यपि पीगू से पूर्व मार्शल ने भी उस सम्बन्ध में अपने विचार व्यक्त किये थे, फिर भी दी के विचार अधिक विकसित एवं वैज्ञानिक होने के कारण पुराना कल्याण - अर्थशास्त्र (Old Welfare Economics) पीगू के नाम से ही सम्बन्धित किया जाता है ।
मार्शल ने अपनी पुस्तकों Principles of Economics तथा Industry and Trade 'उपभोक्ता की बचत' की अवधारणा के आधार पर कल्याण-अर्थशास्त्र सम्बन्धी विचार व्यक्त किये है। मान ने उपयोगिता अथवा सन्तोष को मुद्रा द्वारा मापनीय माता एवं बताया कि उपभोक्ता अधिकतम सन्तोष प्राप्त करने तथा अधिकतम वचत प्राप्त करने के लिए उपभोग के नियम के अनु. सार अपने साधनों को व्यय करता है। उन्होंने बताया कि सभी व्यक्तियों की सन्तुष्टि का योग समाज के कुल कल्याण को व्यक्त करता है। न ने बताया कि किसी समाज में उपभोक्ताओं की कुल बचत अधिक कल्याण का मापक यन्त्र है। उनके अनुसार यदि उपभोक्ताओं की बचत है वृद्धि होती है तो इसका अर्थ होता है कि समाज का कुल आर्थिक कल्याण भी अधिक हो रहा है इसी कारण उपभोक्ताओं की बचत को अधिकतम करके देश में समाज का कल्याण अधिकतम किया जा सकता है। साथ ही मार्शल ने यह भी बताया कि आर्थिक कल्याण को अधिकतम करने के लिए (उत्पादकों की बचत का होता भी आवश्यक के लिए उन्होंने बुद्धिमीन माग उद्योगों पर करारोपण करके उनसे प्राप्त आय को ह्रासमान लागत उद्योगों को आर्थिक सहायता देने का सुझाव दिया। इस प्रकार मार्शल के अनुसार उत्पादकों एवं उपभोक्ताओं की कुल बचत में वृद्धि करके आर्थिक कल्याण को अधिकतम किया जा सकता है।
प्रथम बार कल्याण-अर्थशास्त्र के सम्बन्ध में अधिक वैज्ञानिक ढंग से विचार प्रस्तुत किये। इसी कारण पीगू की पुस्तक Economics of Welfare के सन् 1920 में प्रकाशन के साथ ही कल्याण-अर्थशास्त्र का अलग से व्यवस्थित रूप में अध्ययन आरम्भ हुआ। पीगू ने भी कल्याण को व्यक्तियों को सन्तुष्टि से सम्बन्धित किया और बताया कि सभी व्यक्तियों को सन्तुष्टि का योग समाज के कुल कल्याण को व्यक्त करता है। पीगू ने कल्याण-अर्थशास्त्र का सम्बन्ध केवल आर्थिक कल्याण से स्थापित किया और इसी के आधार पर उन्होंने कल्याण को दो भागों में विभक्त किया- (1) आर्थिक कल्याण; और (2) गैर-आर्थिक कल्याण । पीगू ने बताया कि कल्याण-अर्थशास्त्र के अन्तर्गत केवल आर्थिक कल्याण का ही अध्ययन किया जाता है। आर्थिक कल्याण को समझाते हुए पीगू ने बताया कि "आर्थिक कल्याण सामान्य अथवा सामाजिक कल्याण का वह भाग है जो प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से मुद्रा रूपी पैमाने से सम्बन्धित किया जा सकता है।"(1 "Economic welfare is that part of social (general) welfare that can be brought directly or indirectly into relation with the measuring rod of money."-Pigou)
इस प्रकार पीग के अनुसार कल्याण-अर्थशास्त्र मनुष्य की आर्थिक क्रियाओं से सम्बन्धित है और सभी व्यक्तियों की सन्तुष्टि का योग करके आर्थिक कल्याण को ज्ञात किया जा सकता है। मान्यताएँ (Assumptions ) - पीनू ने कल्याण- अर्थशास्त्र का विवेचन करते समय निम्न- लिखित मान्यताओं को आधार बनाया
(1) उपयोगिता को मुद्रा रूपी पैमाने के द्वारा मापा जा सकता है ।
(2) सभी उपभोक्ता विवेकशील व्यवहार करते हैं अथवा अपने सन्तोष को अधिकतम करना चाहते हैं
(3) विभिन्न उपभोक्ताओं को मिलने वाली कुल सन्तुष्टि तथा एक ही वस्तु के प्रयोग के मिलने वाली सन्तुष्टि की तुलना की जा सकती है।
(4) समान स्थितियों में स्थित सभी उपभोक्ता अपनी समान वास्तविक आय से समान सन्तुष्टि प्राप्त करेंगे।
(5) मुद्रा की सीमान्त उपयोगिता घटती जाती है।
उपर्युक्त मान्यताओं के आधार पर पीगू ने देश में आर्थिक कल्याण को अधिकतम करने के सम्बन्ध में अपने विचार व्यक्त किये हैं पीगू ने राष्ट्रीय आय को आर्थिक कल्याण का सूचक माना और यह निष्कर्ष निकाला कि किसी देश में आर्थिक कल्याण उस देश की राष्ट्रीय आय पर निर्भर करता है। अतः यदि देश में आर्थिक कल्याण को अधिकतम करना है तो देश में राष्ट्रीय आय को अधिकतम करना होगा । राष्ट्रीय आय देश में उत्पादित वस्तुओं एवं सेवाओं के शुद्ध मूल्य से सम्ब ति होती है राष्ट्रीय आय अधिकतम तभी सम्भव है जबकि देश में उत्पादन के साधनों का सर्वोत्तम सम्भव प्रयोग हो रहा हो तथा साधनों के सर्वोत्तम प्रयोग के लिए आवश्यक है कि कम उत्पादक उपयोगों से साधनों को हटाकर अधिक उत्पादक उपयोगों में लगाया जाय और ऐसा तब तक किया जाय जब तक सभी उद्योगों में व्यक्तिगत शुद्ध उत्पादन समान न हो जाय। सभी उद्योगों में सीमान्त व्यक्तिगत शुद्ध उत्पादन (Marginal Private Net Production) समान हो जाने पर ही साधनों का अनुकूलतम प्रयोग सम्भव है इसके साथ ही पीगू ने राष्ट्रीय आय अथवा शुद्ध उत्पादन के समान वितरण को भी आर्थिक कल्याण को अधिकतम करने के लिए आवश्यक बताया और ऐसा तब सम्भव हो सकता है जबकि सभी व्यक्तियों की आय की सीमान्त उपयोगिताएँ समान हों। इस प्रकार पीगू ने देश में आर्थिक कल्याण को अधिकतम करने हेतु निम्नलिखित उपाय बताये :
(1) शुद्ध राष्ट्रीय उत्पादन को अधिकतन करने हेतु उत्पादन के विभिन्न साधनों का विभिन्न उपयोगों में बँटवारा इस प्रकार किया जाय कि सभी उद्योगों का सीमान्त व्यक्तिगत शुद्ध उत्पादन समान हो।
(2) शुद्ध राष्ट्रीय उत्पादन का विभिन्न व्यक्तियों में इस प्रकार समान वितरण किया जाय कि सभी व्यक्तियों को अपनी वास्तविक आय से मिलने वाली सीमान्त उपयोगिताएँ समान हों।
पीगू द्वारा आर्थिक कल्याण को अधिकतम करने के लिए बताये गये उपायों को निम्न प्रकार भी व्यक्त किया जा सकता है :
(1) यदि उत्पादक के साधनों का हस्तान्तरण कम उत्पादक प्रयोगों से अधिक उत्पादक प्रयोगों में हो रहा है तो यह इस बात का सूचक है कि आर्थिक कल्याण में वृद्धि हो रही है। साधनों का अनुकूलतम प्रयोग तब होगा जब साधनों में एक प्रयोग से स्थानान्तरित होकर दूसरे प्रयोग में जाने की प्रवृत्ति पूर्णतः समाप्त हो जाय।
(2) यदि आय का हस्तान्तरण धनवान व्यक्तियों से निर्धन व्यक्तियों की ओर हो रहा है तो यह इस बात का सूचक है कि आर्थिक कल्याण में वृद्धि हो रही है। आय का सर्वोत्तम वितरण तब होगा जबकि आय के वितरण में एक वर्ग से दूसरे वर्ग में हस्तान्तरित होने की प्रवृत्ति पूर्णतः समाप्त हो जाय ।
आलोचनाएँ (Criticism) – पीगू ने प्राचीन कल्याण-अर्थशास्त्र की अनेक विद्वानों द्वारा निम्न प्रकार आलोचना की गयी है
(1) प्राचीन कल्याण-अर्थशास्त्र इस मान्यता पर आधारित है, कि उपयोगिता को मापा जा सकता है। लेकिन उपयोगिता एक मानसिक, भावनात्मक एवं सापेक्ष तत्व होने के कारण अमापनीय है।
(2) विभिन्न व्यक्तियों को मिलने वाली उपयोगिताओं की तुलनीयता की मान्यता भी अवास्तविक है क्योंकि अलग-अलग दशाओं में विभिन्न व्यक्तियों की उपयोगिताएँ तुलना योग्य नहीं हो सकतीं।
(3) विभिन्न व्यक्तियों की समान क्षमता वाली मान्यता भी वास्तविक नहीं है क्योंकि सभी व्यक्तियों का व्यवहार समान रूप से विवेकशील नहीं होता है।
(4) पीगू ने राष्ट्रीय आय को आर्थिक कल्याण का मापदण्ड माना है जो उचित नहीं है। क्योंकि सर्वप्रथम तो राष्ट्रीय आय की सही गणना सम्भव नहीं है और दूसरे राष्ट्रीय आय में वृद्धि मात्र से ही कल्याण में वृद्धि सम्भव नहीं है क्योंकि सम्भव है उस अवधि में कीमत-स्तर में वृद्धि हो जाय । (5) पीगू ने आर्थिक कल्याण में वृद्धि के लिए धन के समान वितरण पर बल दिया है जबकि कल्याण में वृद्धि होने के लिए धन के उचित वितरण के साथ उत्पादन की अनुकूलतम दशाओं का होना भी आवश्यक है।
नवीन कल्याण-अर्थशास्त्र (New Welfare Economics)
प्राचीन कल्याण- अर्थशास्त्र की कमियों के कारण कल्याण-अर्थशास्त्र के सम्बन्ध में आधुनिक समय में नवीन दृष्टिकोणों का विकास हुआ। इस सम्बन्ध में प्रो. परेटो (Pareto) ने कल्याण-अर्थशास्त्र को नवीन दृष्टिकोण प्रदान करके नवीन कल्याण-अर्थशास्त्र की प्रतिष्ठा थी। बाद में हिक्स (Hicks), काल्डोर (Kaldor) एवं सितोरस्की (Scitovosky) ने परेटी (Pareto) के विचार के परिवर्तन करके सुधार करने का प्रयास करते हुए क्षतिपूर्ति सिद्धान्त प्रस्तुत किया तथा बाद में सेतु सेम्युअलसन (Samuelson) एवं वर्गमन (Bergson) आदि ने नवीन विचार प्रस्तुत करके समाज कल्या फलन के विचार का विकास किया। इस प्रकार नवीन कल्याण-अर्थशास्त्र का विकास निम्नलिखित रूपों में हुआ।
(i)परेटो का कल्याण अर्थशास्त्र (Paretorian Welfare Economics)
(ii) क्षतिपूर्ति सिद्धान्त (Compensatory Principle)
(iii) समाज कल्याण फलन (The Social Welfare Function)
I. परेटो का कल्याण-अर्थशास्त्र (Paretorian Welfare Economics)
पीगू का कल्याण-अर्थमास्त्र इस मान्यता पर आधारित था कि उपयोगिता मापनीय है। लेकिन परेटो ने इस विचार की आलोचना की और उपयोगिता के सम्बन्ध में गणनावाचक विचार (Cardinal approach) के स्थान पर वार जिन (Ordinal approach) का प्रयोग करके कल्याण-अर्थशास्त्र को एक नये ढंग से समझाने का प्रयास किया। परेटो ने इस विचार पर कि का भोसा बने सन्तो को अधम करना चाहता है लेकिन वह भिन्न-भिन्न वस्तु से मिलने वाली उपयोगिताओं का माप तो नहीं कर सकता वरन् उन उपयोगिताओं को एक क्रम में रख सकता है, कल्याण की अनुकूलतम दिशाओं को बताने का प्रयास किया। परेटो ने पीगू द्वारा की गयी अन्त यक्तिक उपयोगिताओं की तुलना की मान्यता की भी आलोचना की।
इस प्रकार परेटो ने प्राचीन कल्याण-अर्थशास्त्र की आलोचना करके उत्पादन की अनुकूलता एवं वितरण की अनुकूलता पर बल देते हुए कल्याण को अधिकतम करने हेतु नवीन दशाओं एवं मानदण्डों का विकास किया। पेरेटो ने इस सम्बन्ध में सामान्य अनुकूलतम दशाओं (General Optimum Conditions) को उस स्थिति के रूप में व्यक्त किया जिसमें उत्पादन के साधनों एवं उत्पादन की मात्राओं के पुनआवंटन द्वारा किसी एक व्यक्ति के सन्तोष को कम किये बिना अथवा किसी एक वस्तु के उत्पादन को कम किये बिना किसी उपभोक्ता के सन्तोष में वृद्धि करता अपना किसी वस्तु के उत्पादन में वृद्धि करना असम्भव हो ) परेटो (Pareto) के अनुसार यही सामान्य अनुकूलतम द्वारा अधिकतम कल्याण का द्योतक है। इस सामान्य अनुकूलतम दशा को समझाते हुए एरेटो ने बताया- "हम लोग अधिकतम कल्याण की स्थिति को उस स्थिति के रूप में परिभाषित कर सकते हैं जिसके अन्तर्गत किसी भी प्रकार का ऐसा सूक्ष्म परिवर्तन करना असम्भव होता है जिससे स्थिर रहने वाली सन्तुष्टियों के अलावा, सभी व्यक्तियों की आय बढ़ जाय अथवा घट जाय।"" (1 "We are led to define as a position of maximum ophelimity (welfare) as one where it is impossible to make a small change of any sort such that ophelimi ties of all the individuals, except those that remain constant, are either all increased or all diminished," -Pareto.)
परेटो के अनुसार बतायी गयी सामान्य अनुकूलतम दशा तभी सम्भव है जब सभी उपभोक्ता अधिकतम सन्तोष प्राप्त कर रहे हों एवं सभी उत्पादक अधिकतम उत्पादन कर रहे हो। मान्यताएँ (Assumptions ) —परेटो ने कल्याण-अर्थशास्त्र का विवेचन करते समय निम्नलिखित मान्यताओं को स्वीकार कर लिया है :
(1) उपयोगिता एक क्रमवाचक विचार है अर्थात् उपयोगिता को मापना तो सम्भव नहीं है लेकिन उसको एक क्रम में रखा जा सकता है।
(2) प्रत्येक उपभोक्ता अपने सन्तोष को अधिकतम करना चाहता है।
(3) प्रत्येक उत्पादक अपने नाम को अधिकतम करने हेतु लागत को न्यूनतम करना चाहता है।
(4) सभी वस्तुएँ पूर्ण विभाज्य है।
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(5) उत्पादन के साधन पूर्ण गतिशील हैं। (6) उत्पादित वस्तु एवं उत्पादन के साधनों में पूर्ण प्रतियोगिता है।
इन उपर्युक्त मान्यताओं को आधार मानकर (परेटो ने अधिकतम कल्याण की स्थिति को वह दशा बताया जहाँ पर किसी के कल्याण में कमी किये बिना दूसरे के कल्याण को बढ़ा पाना असम्भव हो ऐसा तभी सम्भव होगा जब सभी उपभोक्ता एवं उत्पादक क्रमशः अधिकतम एवं लाभ प्राप्त कर रहे हो । अधिकतम कल्याण के इस विचार के सन्दर्भ में परेटो (Pareto) ने अधिकतम कल्याण को ज्ञात करने के मानदण्ड (Criterion) को बताते हुए स्पष्ट किया कि उद्या दन के साधनों के पुनः आवंटन से यदि किसी व्यक्ति अथवा किन्हीं व्यक्तियों की स्थिति को खराब किये बिना, अन्य व्यक्तियों की स्थिति में सुधार करना सम्भव हो तो इसका अर्थ है कि सानों का इस प्रकार का पुनर्जीवंटन आर्थिक कल्याण में वृद्धि कर रहा है और आर्थिक कल्याण को अधिकतम करने की दिशा में यह आवश्यक है ।परेटो के अनुसार इस दृष्टि से अधिकतम आर्थिक कल्याण के लिए निम्नलिखित दशाओं का होना आवश्यक है ।
(1) समाज के सभी उपभोक्ताओं में किन्हीं दो वस्तुओं के मध्य विनिमयदर समान होती चाहिए, तभी वस्तुओं का उपभोक्ताओं के मध्य वितरण अनुकूलतम हो सकता है।
(2) उत्पादन में संलग्न फर्मों में समान साधनों का प्रयोग करने वाली किन्हीं दो फर्मों में साधनों की तकनीकी प्रतिस्थापन की दर समान होनी चाहिए, तभी कारण अनुकूलतम हो सकता है।
(3) उत्पादन में संलग्न विभिन्न फर्मों में किसी साधन की सीमान्त उत्पादकता समान होनी चाहिए, तभी किसी साधन का अनुकूलतम प्रयोग सम्भव है।
क्षतिपूर्ति सिद्धांत
(Compensatory Principle)
परेटो का अर्थशास्त्र उपयोगिता के क्रमवाचक विचार, उत्पादन के साधनों की गतिशीलता एवं पूर्ण प्रतियोगिता की मान्यता पर आधारित था और उसके अनुसार यदि किसी की दशा में स्थिति के खराब किये बिना किसी अन्य की दशा में सुधार सम्भव हो तो उससे कल्याण में वृद्धि होगी। हिक्स (Hicks). कालडोर (Kaldor) आदि ने परेटो के द्वारा दी गयी मान्यताओ की आलोचना करते हुए बताया कि परेटो का मानदण्ड उस स्थिति में कल्याण की माप करने में असमर्थ है जबकि किसी नीति परिवर्तन के कारण किसी एक वर्ग की दशा में सुधार हो रहा हो जबकि किसी अन्य वर्ग की स्थिति खराब हो रही हो ।
काल्डोर (Kaldor) तथा हिक्स (Hicks) ने कल्याण-संकेतक (Welfare indicator) के आधार पर कल्याण-अर्थशास्त्र को समझाने का प्रयास करते हुए क्षतिपूर्ति-सिद्धान्त (Compen satory Principle) का प्रतिपादन किया। कल्याण-संकेतक को समझाते हुए उन्होंने बताया कि "जब एक या अधिक व्यक्ति बिना किसी दूसरे व्यक्ति की सन्तुष्टि को कम किये हुए अधिक सन्तुष्ट हो जाते हैं तो आर्थिक कल्याण बढ़ता है। इसके विपरीत यदि वे दूसरे की सन्तुष्टि को बिना कम किये हुए ही स्वयं कम सन्तुष्ट हो जाते हैं तो आर्थिक कल्याण घटता है।" इस प्रकार कल्याण-संकेतक का सम्बन्ध प्रत्यक्ष रूप से कल्याण से होता है, इसमें वृद्धि होने से कल्याण में वृद्धि होती है तथा इसमें कमी होने से कल्याण में कमी आती है।
कल्याण-संकेतक के आधार पर हिक्स-काल्डोर ने क्षतिपूर्ति सिद्धान्त का प्रतिपादन करते हुए बताया कि यदि किसी नीति के परिणामस्वरूप किसी वर्ग के कल्याण में वृद्धि होती है तथा किसी अन्य वर्ग के कल्याण में कमी, तो इस स्थिति में वास्तविक कल्याण में वृद्धि का अनुमान
लगाने के लिए यह देखना चाहिए कि अर्थव्यवस्था के पुनर्गठन अथवा किसी नयी नीति के लागू होने से जिस वर्ग के कल्याण में वृद्धि होती है, उस वर्ग के कल्याण में होते वाली वृद्धि दूसरे वर्ग के कल्याण में होने वाली कमी की क्षतिपूर्ति करती है अथवा नहीं दूसरे शब्दों में, यह देखना चाहिए कि जिस वर्ग के कल्याण में वृद्धि हुई है, वह वृद्धि दूसरे वर्ग के कल्याण में होने वाली कमी से अधिक है अथवा कम यदि कल्याण में होने वाली बुद्धि कल्याण में होने वाली अभी से अधिक है तो कुल कल्याण में वृद्धि होगी तथा इस स्थिति में अर्थव्यवस्था का पुनर्गठन एवं नई नीति श्रेयस्कर है। इसके विपरीत, यदि कल्याण में होने वाली वृद्धि, कल्याण में होने वाली कमी से कम है तो कुल कल्याण में कभी होगी तथा इस स्थिति में अर्थव्यवस्था का पुनर्गठन एवं नयी नीति श्रेष स्कर नहीं है। सारांश में, यह कहा जा सकता है कि यदि अर्थव्यवस्था के पुनर्गठन से होने वाला लाभ, पुनर्गठन से होने वाली हानि की क्षतिपूर्ति कर दे एवं फिर भी अतिरिक्त लाभ बना रहता इस प्रकार का निर्णय लाभदायक एवं कल्याणकारी रहेगा। ऐसा करने के लिए सरकार नाम प्राप्त करने वाले वर्ग पर करारोपण करके हानि होने वाले वर्ग को आर्थिक सहायता देकर उनकी क्षति पूर्ति कर सकती है किन क्षतिपूर्ति हेतु की गयी इस प्रकार की सहायता का उ वितरण करना नहीं होता क्योंकि उत्पादन में होने वाली वृद्धि स्वयं इस बात की प्रतीक है कि स्थिति में पहले से सुधार हुआ है। इस सिद्धान्त के आधार पर हिक्स-काल्डोर मानदण्ड (Hicks Kaldor Criterion) को निम्न प्रकार स्पष्ट किया जा सकता है
हिक्स काल्डोर मानदण्ड के अनुसार यदि यह किया जा सके कि केन ठन अथवा किसी नीति के लागू करने से आय का वितरण इस प्रकार से हो जाता है कि कुछ व्यक्ति पहले से अच्छी स्थिति में आ जाते हैं और शेष व्यक्तियों की स्थिति रहती है तो उस में आर्थिक नीति से आर्थिक कल्याण में वृद्धि होती है।
आलोचनाएँ (Criticism) हिक्स-काडोर द्वारा प्रतिपादित मानदण्ड की आलोचनाएँ की जाती हैं :
(1) हिक्स-काल्डोर ने केवल आर्थिक कुशलता की बात पर ध्यान केन्द्रित किया है, धन के उचित वितरण का उनके मानदण्ड में कोई स्थान नहीं है।
(2) हिक्स-काल्डोर द्वारा दी गयी मान्यताएँ जैसे क्रमवाचकता, साधनों का गतिशील होना आदि अवास्तविक हैं ।
(3) डॉ. लिटिल (Little) के अनुसार हिक्स- काल्डोर का मानदण्ड भी मूल्यगत निर्णयों के पूर्णतया स्वतन्त्र नहीं है ।
(4) हिक्स - काल्डोर का मानदण्ड सम्भावित कल्याण के विचार पर आधारित है लेकिन हिक्स ने सम्भाव्य कल्याण एवं वास्तविक कल्याण को समान समझ लिया है जो गलत है।
(5) सितोवस्की ( Scitovosky) ने हिक्स- काल्डोर मानदण्ड के अन्तविरोध की चर्चा करते हुए उसकी आलोचना की।
सितोवस्की का दोहरा मानदण्ड (Scitovosky's Double Criterion ) — सितोवस्की ने हिक्स- काल्डोर के मानदण्ड की आलोचना करके बताया कि उससे परस्पर-विरोधी स्थितियों का निर्माण हो सकता है । इसलिए हमें कल्याण की दशाओं का पता लगाने के लिए केवल यह हो नहीं देखना चाहिए कि अर्थव्यवस्था के पुनर्गठन अथवा नयी नीति से होने वाले माप के विर कल्याण में वृद्धि हो रही है अथवा नहीं। सितोवस्की के अनुसार कल्याण का सही पता लगाने के लिए हमें माप के पुनर्वितरण की सम्भावना पर अर्थव्यवस्था के पुनर्वठन से पूर्व एवं दोनों ही दशाओं में विचार करना चाहिए। कल्याण का अनुमान लगाते समय दोनों ही दशाओं पर विचार करने के कारण इसे सितोवस्की का दोहरा मानदण्ड कहा जाता है। इस मानदण्ड के सार यदि अर्थव्यवस्था के पुनर्गठन से स्थिति में परिवर्तन होता है और परिवर्त न्वित व्यक्ति अपनी परिवर्तित स्थिति को स्वीकार कर लेने के लिए हानि होने वाले व्यक्तियों को प्रेरित करने में समर्थ है जबकि हानि होने वाले व्यक्ति लाभान्वित व्यक्तियों को मौक बने रहने के लिए प्रेरित करने में असमर्थ है, तो यह कहा जा सकता है कि समाज-या बुद्धि हो रही है। इसी प्रकार यदि अर्थव्यवस्था के मंडन से सभी व्यक्तियों को की अपेक्षा सुधार हो रहा है तो इसका अर्थ है कि आर्थिक-कल्याण में वृद्धि हो रही है।
III. समाज कल्याण फलन (The Social Welfare Function)
नवीन कल्याण-अर्थशास्त्र का मुख्य दोष यह रहा कि इसके अंतर्गत केवल उत्पादन और विनिमय सम्बन्धी शर्तों पर ही ध्यान दिया गया है जबकि धन के वितरण पर कोई भी ध्यान नही दिया गया है। जहाँ तक धन के वितरण पर ध्यान देने का प्रश्न है, धन के वितरण पर विचार करते समय नैतिक पक्ष को भी ध्यान में रखना पड़ता है। इसी कारण प्रो. सैमुअलगन (Samuelson) तथा वर्गमन (Bergion) आदि ने नवीन कल्याण-अर्थशास्त्र की आलोचना की और कल्याण पर विचार करते समय धन के वितरण के ढांचे को ध्यान में रखकर समाज कल्याण फलन सिद्धान्त (Social Welfare Function Principle) का प्रतिपादन किया।
इस कल्याण सिद्धान्त का प्रतिपादन सर्वप्रथम वर्गसन (Bergson) ने अपने लेख "A Re- formulation of Certain Aspects of Welfare Economics" में किया। समाज कल्याण फलन का यह सिद्धान्त उपयोगिता के क्रमवाचक विचार पर आधारित है। जहाँ तक विभिन्न व्यक्तियों की क्रमवाचक उपयोगिताओं का सम्बन्ध है, वह बहुत से अन्य तत्वों पर निर्भर करती हैं। इन्हीं सब तथ्यों को ध्यान में रखते हुए वर्गसन ने बताया कि यह आवश्यक नहीं है कि जब प्रत्येक व्यक्ति पहले से अधिक सन्तुष्ट हो तब आर्थिक कल्याण अधिकतम हो। किसी समय में आर्थिक कल्याण उत्पादन एवं विनिमय की दशाओं के अतिरिक्त अन्य तत्वों जैसे - आय के वितरण के ढंग, विभिन्न व्यक्तियों के कल्याण की पारस्परिक निर्भरता, जनसंख्या में होने वाले विभिन्न परिवर्तन, उपभोक्ताओं की अभिसूचियाँ आदि पर भी निर्भर करता है। इसी कारण अधिकतम कल्याण पर विचार करते समय इन सभी तत्वों पर भी ध्यान रखना चाहिए। प्रो. सेम्युअलसन (Samuelson) तथा वर्गसन (Bergson) द्वारा प्रतिपादित समाज कल्याण फलन में चूंकि समाज- कल्याण की विभिन्न तत्वों पर निर्भरता को व्यक्त किया गया है, इसी कारण समाज कल्याण एवं अन्य विभिन्न तत्वों के आपसी सम्बन्ध को समाज कल्याण फलन कहा गया। समाज कल्याण फलन को गणितीय रूप से निम्न प्रकार समझाया जा सकता है :
W= f ( a, b, c, d n)
यहाँ पर W का अर्थ कल्याण से है, का अर्थ फलन से है तथा a, b, c, dn का अर्थ उन विभिन्न तत्वों से है जो कल्याण को प्रभावित करते
प्रश्न और उनके संकेत
1. Distinguish between real economics and welfare economics. Is there any fundamental difference between both the two. वास्तविक अर्थशास्त्र एवं कल्याणवादी अर्थशास्त्र में अन्तर समझाइए। क्या इन दोनों में कोई आधारभूत भेद है ? (संकेत वास्तविक अर्थशास्त्र एवं कल्याणवादी अर्थशास्त्र का
अर्थ बताते हुए उनमें अन्तर स्पष्ट कीजिए तथा बताइए कि वास्तविक और कल्याणवादी अर्थशास्त्र में यथार्थ और आदर्श का अन्तर है । वास्तविक अर्थशास्त्र 'क्या है' की सूचना देता है तथा कल्याणवादी अर्थशास्त्र क्या होना चाहिए' की ओर संकेत करता है । ] Explain critically the Welfare Economics
Or
Write a critical essay on the concept of 'Welfare Economics'. कल्याणवादी अर्थशास्त्र की आलोचनात्मक व्याख्या कीजिए।
अथवा
'कल्याणवादी अर्थशास्त्र' के विचार पर एक आलोचनात्मक निबन्ध लिखिए। [ संकेत-कल्याणवादी अर्थशास्त्र का अर्थ बताते हुए प्राचीन एवं नवीन कल्याणवादी अर्थ- शास्त्र की विवेचना कीजिए।]
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