पूर्ति

पूर्ति [SUPPLY]

जिस प्रकार किसी कीमत पर एक वस्तु की जितनी इकाइयाँ खरीदी जाती हैं वे उस वस्तु की माँग को दिखाती हैं, इसी प्रकार, एक निश्चित कीमत पर एक निश्चित अवधि में किसी वस्तु की जितनी इकाइयाँ बेची जाती हैं वे उस वस्तु की पूर्ति को दिखाती हैं। माँग की भाँति पूर्ति भी कीमत से सम्बन्धित होती है। हम सदैव यही कहते हैं कि अमुक कीमत पर पूर्ति इतनी है। यहाँ पर पूर्ति और स्टॉक के अन्तर को समझना आवश्यक है। 'स्टॉक' वस्तु विशेष की कुल मात्रा को बताता है, जो किसी निश्चित समय पर बाजार में मौजूद है। किन्तु पूर्ति 'स्टॉक' का वह भाग है जो विक्रेता एक निश्चित समय और एक निश्चित कीमत पर बेचने के लिए तैयार है। पूर्ति के सम्बन्ध में दो बातें आवश्यक हैं: प्रथम, पूर्ति का सम्बन्ध बिक्री करने की तत्परता से है न कि उस मात्रा से जिसे बेचा जाता है। द्वितीय, पूर्ति एक प्रवाह है। जिसका सम्बन्ध एक समय अवधि (प्रति दिन, सप्ताह, माह अथवा वर्ष) से हैं।

पूर्ति तालिका

[SUPPLY SCHEDULE]

बाजार में भिन्न-भिन्न कीमतों पर पूर्ति की मात्राएँ कितनी-कितनी होती हैं, इसकी यदि हम एक सूची बना लें, तो इस सूची को पूर्ति तालिका (अनुसूची) कहा जाता है। पूर्ति तालिका 'कीमत' और 'बेची जाने वाली मात्रा' के फलनात्मक सम्बन्ध को दिखाती है।
पूति- अनुसूची
(SUPPLY SCHEDULE)

पूर्ति- अनुसूची एक ऐसी तालिका होती है जो विभिन्न परिकल्पित कीमतों पर वस्तु की  बिक्री हेतु प्रस्तुत की जाने वाली विभिन्न मात्राओं को प्रदर्शित करती है 1) इस प्रकार  सूची यह बताती है कि अमुक-अमुक कीमतों पर वस्तु की कितनी कितनी मात्राओं को विक्रेता बेचने को तैयार होते हैं। पूर्ति अनुसूची दो प्रकार की होती है- (1) व्यक्तिगत पूर्ति अनुसूची (Individual Supply Schedule), तथा (2) बाजार पूर्ति अनुसूची (Market Supply Sex. dule) 
(व्यक्तिगत पूर्ति अनुसूची एक उत्पादक, फर्म अथवा विक्रेता विशेष द्वारा एक निश्चित में विभिन्न कीमत-स्तरों पर विक्री हेतु प्रस्तुत की जाने वाली वस्तु की विभिन्न मात्राओं को करती है, जबकि बाजार पूर्ति अनुसूची बाजार के सभी विक्रेताओं द्वारा एक निश्चित अवधि विभिन्न कीमत स्तरों पर विक्री हेतु वस्तु की सामूहिक रूप से प्रस्तुत की जाने वाली मात्राओं प्रदर्शित करती है । निम्नांकित सारणी से व्यक्तिगत तथा बाजार पूर्ति अनुसूची का अन्तर स्पष्ट हो जायगा ।
सारणी -1 व्यक्तिगत तथा कुल अथवा बाजार पूर्ति अनुसूचियों को प्रदर्शित करती है। सारणी में फर्म A, B तथा C की व्यक्तिगत पूर्ति अनुसूचियों को प्रदर्शित किया गया है जो फर्म B तथा C द्वारा कीमत के विभिन्न स्तरों पर बेचने के लिए प्रस्तुत की जाने वाली मात्राओं व्यक्त करती हैं। बाजार में उपस्थित सभी फर्मों की व्यक्तिगत पूर्ति अनुसूचियों का योग बाजार पूर्ति अनुसूची बनायी जा सकती है। सारणी-1 में बाजार में A, B तथा C तीन फर्मों के उपस्थिति मानकर इन फर्मों की व्यक्तिगत पूर्ति अनुसूचियों का योग करके बाजार पुर्ति अनुसुची बनायी गयी है। पूर्ति अनुसूचियों के सन्दर्भ में यह बात उल्लेखनीय है कि इनको बताते सम उत्पादन की दशाओं से सम्बन्धित विभिन्न तत्वों, जैसे साधनों की कीमतें, तकनीक आदि को ि मान लिया जाता है।)

पूर्ति-वक्र [SUPPLY CURVE)

पूर्ति अनुसूची को रेखाचित्र द्वारा प्रदर्शित करने पर जो वक्र बनता है उसे पूर्ति-वक्र कहते है यह वक्र वस्तु की कीमत तथा पूर्ति में सम्बन्ध स्थापित करके कीमत के विभिन्न स्तरों पर पूर्ति की जा वाली विभिन्न मात्राओं को व्यक्त करता है। व्यक्तिगत पूर्ति अनुसूची को रेखांकित करके व्यक्तिगत पूर्ति वक्र- (Individual Supply Curve) तथा बाजार पूर्ति अनुसूची को रेखांकित करके बाजार पूर्ति वक्र को प्राप्त किया जा सकता हैं। रेखाचित्र  द्वारा पूर्ति व को प्रदर्शित किया गया है।
पूर्ति-वक्र (Market Supply Curve) को प्राप्त किया जा सकता है। संलग्न चित्र में SS पूर्ति-व है जो वस्तु की कीमत तथा वस्तु की मात्रा का सम्बन्ध व्यक्त करता है । SS वक्त बायें से दाहिनी ओर ऊपर को उठता हुआ है जो कीमत तथा पूर्ति में धनात्मक सम्बन्ध को व्यक्त करता है अर्थात् यस्तु की कीमत बढ़ने पर पूर्ति की अधिक मात्राओं तथा कीमत कम होने पर पूर्ति की कम मात्राओं को व्यक्त करता है। चित्र से स्पष्ट है कि OY, कीमत पर पूर्ति OX, भी जो कीमत के बढ़कर OY, हो जाने पर बढ़कर OX, हो गयी है।"

पूर्ति का नियम
यह नियम बवस्तु की कीमत तथा विक्रेताओं द्वारा बेची जाने वाली वस्तु की मात्रा में प्रत्यक्ष सम्बन्ध की व्याख्या करता है। यह नियम बताता है कि अन्य बातें समान रहने पर जैसे- जैसे किसी वस्तु की कीमत बढ़ती जाती है वैसे-वैसे विक्रेतागण वस्तु को विकी हेतु प्रस्तुत मात्राओं को बढ़ाते चले जाते हैं तथा जैसे-जैसे कीमत कम होती चली जाती है विक्रेतागण बिक्री हेतु वस्तु की प्रस्तुत की जाने वाली मात्राओं को कम करते चले जाते हैं। अर्थात वस्तु की कीमत तथा पूर्ति में धनात्मक तथा एक ही दिशा का सम्बन्ध होता है ) कीमत के बढ़ने पर पूर्ति भी जाती है तथा कीमत के घटने पर पूति भी घट जाती है । यहीं पर यह बात उल्लेखनीय है कि पति का नियम कीमत में परिवर्तन के परिणामस्वरूप पूर्ति में होने वाले परिवर्तनों की केवल दिशा को बताता है, निरपेक्ष रूप से परिवर्तन की मात्राओं को व्यक्त नहीं करता । पूर्ति के नियम को संलग्न रेखाचित्र  द्वारा प्रदर्शित किया जा सकता है। 
(संलग्न चित्र में ss पूर्ति-वक्र है जो दाहिनी ओर ऊपर की उठता हुआ होता है। पूर्ति-वक्र का सामान्य रूप यही होता है । SS पूर्ति व कीमत तथा वस्तु की मात्रा में प्रत्यक्ष एवं धनात्मक सम्बन्ध को प्रदर्शित करता है। चित्र में OY, कीमत पर OX, पूति है जो कीमत बढ़कर OY2 हो जाने के कारण बढ़कर OX, हो गयी है। इस प्रकार कीमत बढ़ने पर पूर्ति में वृद्धि हो गयी है। वस्तु की कीमत तथा पूर्ति का यही धनात्मक सम्बन्ध 'पूर्ति का नियम' है जो कुछ विशेष बातों के स्थिर रहने पर लागू होता है।

पूर्ति के नियम की मान्यताएँ
[ASSUMPTIONS OF THE LAW OF SUPPLY J पूर्ति का नियम अथवा वस्तु की कीमत तथा पूर्ति का धनात्मक सम्बन्ध निम्नलिखित मान्यताओं में ही लागू होता है :

(1) उत्पादक अथवा विक्रेताओं का व्यवहार विवेकशील है।
(2) क्रेताओं एवं विक्रेताओं की आय स्थिर है। 
(3) क्रेताओं एवं विक्रेताओं की रुचियाँ, फैशन एवं रीति-रिवाज अपरिवर्तनशील है।
(4) उत्पादन के साधनों के मूल्य स्थिर रहते हैं। 
(5) उत्पादन से सम्बन्धित तकनीकी ज्ञान स्थिर रहता है।
(6) कीमतों के प्रत्येक परिवर्तन का प्रभाव पूर्ति पर अवश्य पड़ता है। 
(7) वस्तु विभाज्य है।

पूर्ति के नियम के लागू होने के कारण
[REASONS OF APPLICATION OF THE LAW OF SUPPLY]

पूर्ति का नियम सामान्य विवेक एवं मानवीय मनोवृत्ति पर आधारित है। जब वस्तु की कीमत बढ़ती है तो विक्रेताओं के लाभ में वृद्धि होने लगती है, इस कारण लाभ में और वृद्धि करने के उद्देश्य से प्रेरित होकर विक्रेता अपने विवेकपूर्ण व्यवहार का परिचय देते हुए वस्तु की पूर्ति बढ़ा देते हैं। इसके विपरीत, जब कीमत कम होती है तो विक्रेता का लाभ या तो क होने लगता है अथवा हानि होने लगती है जिसके कारण उत्पादक अपनी हानि को न्यूनतम करने के उद्देश्य से प्रेरित होकर पूर्ति में कमी कर देते हैं। इस विश्लेषण के आधार पर पूर्ति के नियम लागू होने के कारणों को निम्न प्रकार बताया जा सकता है :

(1) कीमत बढ़ने पर अधिक लाभ की सम्भावना विक्रेता को अधिक पूर्ति करने के लिए प्रेरित करती है, जबकि कीमत कम होने पर हानि की सम्भावना कम पूर्ति के लिए प्रेरित करती है । 
(2) कीमत बढ़ जाने पर सीमान्त उत्पादक, जो अभी तक बाजार में नहीं थे, मो पुति करने लगते हैं, जबकि कीमत कम होने पर सीमान्त उत्पादक हानि की सम्भावना के
कारण बाजार से बाहर चले जाते हैं। 

पूर्ति के नियम के अपवाद
[EXCEPTIONS OF THE LAW OF SUPPLY] पूर्ति के नियम के कुछ अपवाद हैं जिनमें यह नियम लागू नहीं होता है। इसके कुछ अपवाद निम्नवत् हैं :

(1) भविष्य में कीमत-परिवर्तन की और सम्भावना - यदि भविष्य में कीमत में वृद्धि अथवा कमी और जारी रहने की सम्भावना होती है तो यह नियम लागू नहीं होता है। जैसे कीमत गिरने की स्थिति में यदि भविष्य में कीमत की और गिरने की सम्भावना होती है तो वर्तमान में विक्रेता पूर्ति को कम न करके अधिक वस्तुएँ बेचने को तैयार रहते हैं क्योंकि भविष्य में तो अधिक हानि की सम्भावना होती है।

(2) कलात्मक वस्तुओं पर नियम लागू नहीं—कलात्मक वस्तुओं की पूर्ति का वस्तु की कीमत से विशेष सम्बन्ध नहीं होता है। इस कारण इन वस्तुओं की कीमत कम होने अथवा अधिक होने से पूर्ति पर प्रायः प्रभाव नहीं पड़ता है ।

(3) नीलामी वाली वस्तुओं पर लागू नहीं - जो वस्तुएँ नीलाम द्वारा बेची जाती है। उनकी बेची जाने वाली मात्रा प्रायः पूर्व-निश्चित होती है जिसमें कीमत बढ़ने पर भी वृद्धि नहीं हो पाती है।

(4) उत्पादन में प्राकृतिक शक्तियों का हाथ होने पर यदि उत्पादन में प्राकृतिक शक्तियाँ की भूमिका रहती है, जैसे—कृषि उत्पादन, वन सम्पदा, मत्स्य पालन आदि, तो भी कीमतों में वृद्धि होने पर इन वस्तुओं की पूर्ति नहीं बढ़ पाती है क्योंकि पूर्ति में स्वयं परिवर्तन नहीं किया जा सकता है।

पूर्ति को प्रभावित करने वाले तत्व [FACTORS AFFECTING SUPPLY]
पूर्ति को प्रभावित करने वाले तत्वों को निम्न प्रकार स्पष्ट किया जा सकता है : 
(1) कीमत - किसी वस्तु की पूर्ति मूल रूप से उस वस्तु की कीमत से महत्वपूर्ण रूप से प्रभावित होती है-कीमत बढ़ने पर पूर्ति भी बढ़ जाती है जबकि कीमत घटने पर पूर्ति भी घट जाती है।
 (2) उत्पादन के साधनों की कीमत — किसी वस्तु की पूर्ति उस वस्तु के उत्पादन में प्रयुक्त ने बाले साधनों की कीमतों पर भी निर्भर करती है। वस्तु की कीमत स्थिर रहने पर यदि साधनों कीमतें कम हो जाती हैं तो प्रायः वस्तु की पूर्ति बढ़ जाती है तथा साधनों की कीमतें बढ़ जाने पर कम हो जाती है।
(3) उत्पादन से सम्बन्धित विशिष्ट ज्ञान—अन्य दशाओं के समान रहने पर यदि उत्पादन सम्बन्धित तकनीकी एवं विशिष्ट ज्ञान में सुधार होता है तो लागत कम होने के कारण पूर्ति में हो जाती है। 
(4) परिवहन एवं सन्देशवाहन साधन-किसी विशेष स्थान अथवा विशेष समय में यातायात एवं सन्देशवाहन के साधनों में विस्तार एवं विकास के कारण वस्तुओं की पूर्ति बढ़ जाती है। 
(5) उत्पादकों की रुचियाँ - वस्तु की पूर्ति उत्पादकों की रुचि पर भी निर्भर करती है। जिन वस्तुओं के उत्पादन में उत्पादकगण अधिक रुचि एवं उत्साह दिखाते हैं, उन वस्तुओं की पूर्ति गती है तथा जिन वस्तुओं के उत्पादन में उत्पादक रुचि नहीं लेते हैं अथवा कम रुचि लेते हैं, उन वस्तुकों को पूर्ति कम होती है।
(6) प्राकृतिक दशाएँ—किसी वस्तु की पूर्ति पर प्राकृतिक दशाओं का भी प्रभाव पड़ता है। यदि देश में अकाल, सूखा, बाढ़, महामारी तथा अन्य प्राकृतिक प्रकोप होते हैं तो प्रायः सभी वस्तुओं की पूर्ति कम हो जाती है । इसके विपरीत, यदि देश में इस प्रकार की स्थितियां न होकर खुशहाली है तो वस्तुओं की पूर्ति अधिक होगी।
(7) सरकारी नीति — आज के युग में सरकारी नीति पर किसी वस्तु की पूर्ति बहुत बड़ी सीमा तक निर्भर होती है। यदि सरकार किसी वस्तु के उत्पादन को अधिक प्रोत्साहन देती है तो उस वस्तु की पूर्ति बढ़ती है। लेकिन यदि सरकार किसी वस्तु के उत्पादन को भारी करारोपण एवं नियन्त्रण द्वारा हतोत्साहित करती है तो पूर्ति कम होती है।
(8) विक्रेता संघों की भूमिका - किसी वस्तु की पूर्ति उत्पादन में लगे हुए उत्पादकों के
संघों की उपस्थिति तथा उनकी नीतियों द्वारा भी प्रभावित होती है। प्रायः उत्पादक संघों की उपस्थिति से वस्तु की पूर्ति में कमी आ जाती है। 
(9) वस्तु की माँग- मूलतः किसी वस्तु की माँग होने के कारण ही उसकी पूर्ति की व्यवस्था की जाती है। इस आधार पर मांग बढ़ने पर पूर्ति भी बढ़ेगी, चाहे उसमें कुछ समय अवश्य लगे तथा मांग घटने पर पूर्ति भी अन्ततः कम होगी ।

पूर्ति में परिवर्तन तथा पूर्ति में वृद्धि एवं कमी
[CHANGE IN SUPPLY & INCREASE AND DECREASE IN SUPPLY] 

पूर्ति में परिवर्तन तथा पूर्ति में वृद्धि एवं कभी में स्पष्ट अन्तर होता है जिसे स्पष्ट करने के लिए इन अवधारणाओं का स्पष्टीकरण आवश्यक है जो इस प्रकार है ।
पूर्ति में परिवर्तन (Change in Supply)

पूर्ति में परिवर्तन से तात्पर्य वस्तु की कीमत में वृद्धि अथवा कमी के कारण पूर्ति में वाले विस्तार अथवा संकुचन (Expansion and Contraction) से है। कीमत बढ़ने पर पूर्ति में होने वाले विस्तार को पूर्ति का विस्तार (Expansion of Supply) तथा कीमत में कमी होने पर पूर्ति में होने वाली कमी को पूर्ति का सकुचन (Contraction of Supply) कहा जाता है। पूर्ति के विस्तार तथा संकुचन अथवा पूर्ति के परि वर्तन को संलग्न चित्र द्वारा प्रदर्शित किया जा सकता है ।

संलग्न चित्र में OY, कीमत पर वस्तु की पूर्ति OX, है | कीमत बढ़कर OY, हो जाने पर पूर्ति भी बढ़कर OX2 हो गयी हैं । पूर्ति की वृद्धि ही पूर्ति का विस्तार कहलाती है । अब यदि कीमत कम होकर OY, रह जाती है तो पूर्ति भी कम होकर OX, हो जायगी । पूर्ति में XXकी कमी ही पूर्ति का सकुचन कहलाती है ।

पूर्ति में वृद्धि एवं कमी (Increase and Decrease in Supply) 
वस्तु की कीमत के अतिरिक्त अन्य कारणों से यदि पूर्ति में वृद्धि अथवा कमी होती है
 तो उसे पूर्ति में वृद्धि एव कमी कहा जाता है। कीमत के अतिरिक्त अन्य तत्व उत्पादक की दशा “विक्रेताओं के दृष्टिकोण, सरकारी नीति तथा प्राकृतिक दशाओं में परिवर्तन से सम्बन्धित हो हैं। इस स्थिति में पूर्ति वक्र अपने मूल स्थान से हट जाता है। पूर्ति में वृद्धि होने की दशा में पूर्ति वक्र अपने से दाहिने नीचे की ओर खिसक जाता है तथा पूर्ति में कमी की दशा में पूर्ति-वक्र अपने से बायें ऊपर की ओर खिसक जाता है। इसे संलग्न चित्र  द्वारा स्पष्ट किया जा सकता है।

संलग्न चित्र में SS मूल पूर्ति-वक्र  है जो OY, कीमत पर OX, पूर्ति को प्रदर्शित करता है। कीमत OY, स्थिर रहने पर यदि पूर्ति बढ़ जाती है तो पूर्ति-वक्र नीचे की ओर खिसककर S'S' हो गया। जो Or, कीमत पर हो OX, पूर्ति को व्यक्त करता है। पूर्ति में वृद्धि ही पूर्ति में वृद्धि (Increase in Supply) कह- लाती है। यदि कीमत OY रहने पर ही अन्य तत्वों के कारण पूर्ति कम हो जाती है तो नया पूर्ति-वक्र मूल वक्र से ऊपर उठ जायगा। चित्र में S S' नया पूर्ति-वक्र है जो पूर्ति में कमी का द्योतक है तथा OY, कीमत पर ही OX, पूर्ति को व्यक्त करता है । पूर्ति में की कमी पूर्ति में कमी (Decrease in Supply) कहलाती है।





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