बाजार संतुलन
बाजार सन्तुलन [MARKET EQUILIBRIUM
सन्तुलन का अर्थ (Meaning of Equilibrium)
सन्तुलन अथवा साम्य का आशय उस दशा से है जिसमें सभी कार्यवाहक शक्तियों का परिणाम कुल मिलाकर शून्य के बराबर होता है। इस दशा में स्थिति वही बनी रहती है जैसी वह पहले थी, बशर्ते किसी नये कारण के आ जाने अथवा किसी पुराने कारण के मिट जाने से इसमें विघ्न न पड़े। सन्तुलन को विश्राम स्थिति के रूप में देखा जाता है। स्टिगलर के अनुसार, " सन्तुलन वह स्थिति है जिससे हटने की प्रवृत्ति नहीं है। प्रवृत्ति के स्थान पर 'शुद्ध' प्रवृत्ति कहना अधिक उपयुक्त होगा क्योंकि सन्तुलन आकस्मिक अकर्मण्यता की स्थिति नहीं है, बल्कि क्रियाशील शक्तियों का बल निष्प्रभावित हो जाने की स्थिति का सूचक है।" इस प्रकार निष्क्रियता सन्तुलन की विशेषता नहीं है, बल्कि विशेषता यह है कि क्रियाओं के बीच सन्तुलन स्थापित हो जाता है। विभिन्न कार्यवाहक शक्तियाँ एक-दूसरे को सन्तुलन में रखती हैं।
सन्तुलन की कल्पना सदा ही एक समयावधि के सन्दर्भ में की जाती है। समय अवधि की ओर संकेत किये बिना हम सन्तुलन की बात नहीं कर सकते।
बाजार- सन्तुलन को बाजार की वह स्थिति बताया जाता है जिसमें माँग की मात्रा विक्रेताओं द्वारा बेचने के लिए प्रस्तुत की हुई पूर्ति मात्रा के बराबर होती है। व्यावहारिक रूप में, सन्तुलन की यह आवश्यक शर्त नहीं है कि माँग की मात्रा बिक्री के लिए प्रस्तुत मात्रा के बराबर हो। यह सम्भव है कि किसी एक दी हुई कीमत पर विक्रेता उससे अधिक बेचने के लिए तैयार हों जितना वे वास्तव में बेचते हैं, क्योंकि उस कीमत पर ग्राहक विक्रय के लिए प्रस्तुत की गयी मात्रा से कम खरीदने के लिए तैयार होते हैं। यह भी सम्भव है कि विक्रेता कम बिक्री करके भी सन्तुष्ट हो जाये यदि उस कीमत पर कम बिक्री भी उनके लाभ को अधिकतम बनाती है।
बाजार सन्तुलन सदा ही किसी निश्चित कीमत पर प्राप्त किया जाता है। जब एक दी हुई कीमत पर किसी वस्तु के लिए माँग और उसकी पूर्ति एक-दूसरे के बराबर हो जायें तोसन्तुलन स्थापित हो जाता है। माँग और पूर्ति का अर्थ केवल एक विशेष कीमत के सन्दर्भ में ही लगाया जा सकता है।
सन्तुलन कीमत (Equilibrium Price)
किसी भी वस्तु की कीमत दो बातों पर निर्भर करती है : उपयोगिता तथा दुर्लभता। हम कीमत इसलिए देते हैं कि वस्तु की हमारे लिए उपयोगिता होती है। साथ ही, वस्तु का दुर्लभ होना भी आवश्यक है। वायु तथा जल हमारे लिए बहुत उपयोगी हैं, परन्तु ये दुर्लभ नहीं हैं। इसीलिए इनकी कीमत (अर्थात् विनिमय मूल्य) नहीं होती है।
प्रो. मार्शल ने यह स्पष्ट किया कि कीमत का निर्धारण माँग (उपयोगिता) तथा पूर्ति (उत्पादन लागत) दोनों संयुक्त रूप से करते हैं। जिस प्रकार कागज को काटने के लिए कैंची के दोनों फलकों (blades) की समान आवश्यकता होती है, उसी प्रकार से वस्तु की कीमत निर्धारण के लिए माँग तथा पूर्ति दोनों की ही समान रूप से आवश्यकता होती है। यह सम्भव है कि कुछ दशाओं में माँग (उपयोगिता) कीमत के निर्धारण में अधिक प्रभावी हो सकती है, तो कुछ दशाओं में पूर्ति (उत्पादन लागत)। परन्तु कैंची के दोनों फलकों के समान प्रभाव माँग तथा पूर्ति दोनों का ही रहता है।
वह कीमत जिससे माँग तथा पूर्ति का साम्य होता है, सन्तुलन कीमत कहलाती है। इस कीमत पर माँग-पूर्ति का साम्य स्थापित होता है जिससे बाजार में स्थिरता की स्थिति (Static Condition) उत्पन्न होती है जिसे सन्तुलन की दशा (State of equilibrium) कहते हैं। सन्तुलन कीमत पर किसी वस्तु की माँग उसकी पूर्ति के बराबर होती है और बाजार में सन्तुलन की स्थापना होती है। इस प्रकार, सन्तुलन कीमत माँग तथा पूर्ति की सापेक्षिक शक्तियों द्वारा उस बिन्दु पर निर्धारित होती है जहाँ वस्तु की पूर्ति उसकी माँग के बराबर होती है और बाजार का सन्तुलन प्राप्त होता है।
कीमत निर्धारण (Determination of Price)
कीमत तथा माँग का विपरीत सम्बन्ध होता है जबकि कीमत तथा पूर्ति का प्रत्यक्ष सम्बन्ध होता है। इस प्रकार, माँग और पूर्ति की शक्तियाँ विपरीत दिशा में कार्य करती हैं। अन्य बातें समान रहने पर, यदि कीमत में वृद्धि होती है तो माँग कम होती है, परन्तु पूर्ति बढ़ती है। सन्तुलित कीमत वह है जिस पर वस्तु को माँग उसकी पूर्ति के बराबर होती है। आगे दी गयी तालिका में अलग-अलग कीमतों पर वस्तु की माँग तथा पूर्ति की इकाइयाँ दिखायी गयी हैं।
1) रेखाकृति में X- अक्ष पर वस्तु की माँग व पूर्ति को तथा Y-अक्ष पर वस्तु की कीमत को दिखाया गया है।
2) DD माँग वक्र है तथा SS पूर्ति वक्र ।
3) E बिन्दु पर वस्तु की कीमत निर्धारित होती है जहाँ माँग व पूर्ति एक-दूसरे के बराबर हैं।
4) यदि कीमत 1 रुपया है। तो माँग 60 इकाइयाँ है, परन्तु पूर्ति केवल 5 इकाइयाँ। दूसरी ओर, कीमत 5 रुपये होने पर पूर्ति 65 इकाइयाँ होगी, परन्तु मांग केवल 10 इकाइयाँ।
5) ऐसी स्थिति में कीमत में कमी करनी होगी। कीमत 2 रुपये होने पर माँग तथा पूर्ति दोनों ही 35 इकाइयाँ होंगी और इसी बिन्दु पर बाजार कीमत का निर्धारण होगा। 6) इस प्रकार 2 रुपये सन्तुलन कीमत है जिस पर बाजार- सन्तुलन स्थापित होता है।
अन्य बातें समान रहने पर, यह स्थायी सन्तुलन की स्थिति है। परन्तु व्यावहारिक जीवन में, अन्य बातें (आय, रुचि तथा पसन्द, जनसंख्या इत्यादि) स्थिर नहीं रहती हैं जिनसे माँग तथा पूर्ति में परिवर्तन होता है।
माँग तथा पूर्ति में परिवर्तन (Changes in Demand and Supply) माँग और पूर्ति को प्रभावित करने वाले तत्त्वों में परिवर्तन के परिणामस्वरूप माँग तथा पूर्ति में चार प्रकार के परिवर्तन हो सकते हैं—
(i) माँग में वृद्धि या कमी
(ii) पूर्ति में वृद्धि या कमी
(i) माँग में कमी
आय में कमी होने पर, माँग कम हो जायेगी जबकि पूर्ति में परिवर्तन नहीं होगा तब माँग वक्र बदल जाएगा और नयी माँग-रेखा DD) होगी। DID पर मूल कीमत OP पर मांग OQ: तथा पूर्ति 0Q होगी। पूर्ति माँग से अधिक होने पर कीमत कम हो जायेगी तथा मांग की मात्रा बढ़ जायेगी। OP, नयी सन्तुलन कीमत P' पर मांग 0Q पूर्ति के बराबर होगी। इस प्रकार, माँग में कमी होने पर सन्तुलन कीमत में कमी होती है तथा मांग और पूर्ति की मात्रा कम हो जाती है। यह रेखाकृति में दर्शाया गया है।
(ii) पूर्ति में परिवर्तन - मान लीजिए, माँग में कोई परिवर्तन नहीं होता, परन्तु तकनीकी सुधार के कारण पूर्ति बढ़ जाती है। पूर्ति-वक्र दायीं ओर खिसककर S1 S1 हो जायेगी। OP सन्तुलन कीमत पर माँग OQ तथा पूर्ति OQ2 है। पूर्ति माँग से अधिक होने पर सन्तुलन कीमत गिरकर OP, हो जायेगी जिस पर माँग तथा पूर्ति की मात्रा OQ1 होगी। इस प्रकार, पूर्ति बढ़ने पर सन्तुलन कीमत कम होगी और माँग बढ़ेगी। यह रेखाकृति में दर्शाया गया है।
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