मांग, मांग वक्र, मांग में परिवर्तन
माँग एवं पूर्ति
[DEMAND AND SUPPLY]
माँग तथा पूर्ति दो ऐसे तत्त्व हैं जो एक अर्थ-व्यवस्था में समस्त आर्थिक क्रियाओं का आधार है। सभी प्रकार के आर्थिक उतार-चढ़ाव इन्हीं से प्रभावित होते हैं और इन्हीं के द्वारा अर्थ-व्यवस्था में सन्तुलन प्राप्त होता है। अर्थशास्त्र के अध्ययन में माँग तथा पूर्ति दो महत्त्वपूर्ण तत्व है।
माँग का अर्थ (The Meaning of Demand)
साधारणतः किसी वस्तु प्राप्त करने की इच्छा (desire) को हम मांग कहते हैं, परंतु अर्थशास्त्र में माँग किसी वस्तु के लिए केवल इच्छा मात्र ही नहीं है। जैसा कि पेन्सन ने कहा है, "माँग प्रभावपूर्ण इच्छा है। इसमें तीन बातें सम्मिलित होती हैं— (1) किसी वस्तु को प्राप्त करने की इच्छा, (ii) उस वस्तु को खरीदने की शक्ति, तथा (iii) खरीदने के लिए इस शक्ति के उपयोग की तत्परता।' यह माँग का मनोवैज्ञानिक अर्थ है। भौतिक अर्थ में, मिल (I. S. Mill) के अनुसार, "माँग का अभिप्राय उस मात्रा से है जो कि माँगी जाय और यह कोई निश्चित मात्रा नहीं है वरन् सामान्यतः कीमत के अनुसार घटती-बढ़ती रहती है।"
बेन्हम ने माँग की परिभाषा अधिक स्पष्ट शब्दों में दी है—“एक निश्चित कीमत पर किसी वस्तु की माँग उसकी वह मात्रा है जो उस कीमत पर एक निश्चित समय पर खरीदी जाती है। "
इस परिभाषा में दो बातें महत्त्वपूर्ण हैं-प्रथम, माँग का सम्बन्ध सदैव किसी कीमत से होता है, अर्थात् किस कीमत पर कितनी माँग है। दूसरे, माँग का सम्बन्ध किसी समय इकाई से होता है, अर्थात् किस समय पर कितनी माँग है।
अतः किसी वस्तु की माँग उसकी उन मात्राओं की अनुसूची होती है जिन्हें विभिन
कीमतों पर किसी समय विशेष में क्रेता खरीदते हैं।
माँग- अनुसूची (Demand Schedule)
एक ऐसी सूची जिसमें यह दिखाया जाय कि किसी समय विशेष पर बाजार में विभिन्न कीमतों पर किसी वस्तु की कितनी मात्रा में माँग होती है तो यह 'माँग- अनुसूची' कहलाती है। इस प्रकार, माँग- अनुसूची कीमत और माँग की मात्रा के फलनात्मक सम्बन्ध (functional relationship) को दिखाती है।
किसी वस्तु की माँग पर अनेक बातों का प्रभाव पड़ता है। उपभोग-वस्तुओं के लिए माँग बाजार में 1.उपभोक्ताओं की संख्या, 2.उनकी मौद्रिक आय, 3.उनकी रुचियों और सामाजिक रूढ़ियों, 4.ऐसी वस्तुओं की कीमतों जो इस वस्तु के स्थान पर उपयोग की जा सकती हैं।
यह मान लेते हैं कि माँग को प्रभावित करने वाले इन घटकों में कीमत को छोड़कर कोई परिवर्तन नहीं होता है। दूसरे शब्दों में, माँग- अनुसूची के द्वारा हम इस बात का प्रयत्न करते हैं कि किस वस्तु की बिक्री पर केवल उस वस्तु की कीमतों के प्रभाव का अध्ययन करें।
व्यक्तिगत एवं बाजार माँग-तालिकाएँ [INDIVIDUAL AND MARKET DEMAND SCHEDULES]
माँग की अनुसूची एक व्यक्ति विशेष के लिए भी बनाई जा सकती है तथा सम्पूर्ण बाजार के लिए भी । व्यक्ति की माँग अनुसूची यह दिखायेगी कि एक निश्चित समय पर व्यक्ति अलग-अलग दामों पर वस्तु विशेष की कितनी-कितनी मात्राएँ खरीदेगा।
सम्पूर्ण बाजार के लिए माँग- अनुसूची यह दिखाती है कि विभिन्न कीमतों पर किसी निश्चित काल में उस बाजार में वस्तु कितनी- कितनी मात्राओं में बेची जाती है। एक व्यक्ति के लिए माँग-अनुसूची बनाना सरल है। नीचे व्यक्ति के लिए माँग-अनुसूची दी गई है।
किन्तु सम्पूर्ण बाजार के लिए माँग- अनुसूची बनाना कठिन है। साधारण गति से बाजार की माँग अनुसूची विभिन्न ग्राहकों द्वारा खरीदी हुई मात्राओं को जोड़कर बनाई जा सकती है। इसमें यह दिखाया जाता है कि अलग-अलग कीमतों पर किसी निश्चित समय में सभी ग्राहक मिलकर वस्तु की कुल कितनी मात्रा खरीदते हैं। हम कल्पना करते हैं कि बाजार में केवल ड रख ग घ ङ और च 6 ही ग्राहक हैं। बाजार की मांग- अनुसूची यह दिखावेगी कि वे 6 ग्राहक मिलकर विभिन्न कीमतों पर वस्तु की कुल कितनी मात्रा खरीदते हैं।
बाजार-माँग तालिका
चूंकि विभिन्न प्रकार के व्यक्तियों द्वारा एक बाजार का निर्माण होता है, इसलिए हम ऐसा कह सकते हैं कि विभिन्न व्यक्तियों की मांग-तालिकाओं का योग ही बाजार मांग-तालिका है। यही कारण है कि व्यक्तिगत-मांग-तालिका और बाजार मांग-तालिका एक-दूसरे पर निर्भर रहती है तथा एक-दूसरे को प्रभावित करती हैं।
माँग वक्र
[DEMAND CURVE]
माँग-तालिका को एक रेखाचित्र द्वारा दिखाया जा सकता है। ऐसी रेखा या वक्र को माँग-रेखा या माँग-वक्र कहते हैं। माँग-रेखा विभिन्न कीमतों पर वस्तु विशेष की एक निश्चित समय में खरीदी जाने वाली मात्राओं को सूचित करती है। माँग-तालिका के ही समान माँग रेखा भी दो प्रकार की हो सकती है—व्यक्तिगत-माँग-रेखा, जो व्यक्तिगत-माँग-तालिका पर आधारित होती है और बाजार-माँग-रेखा, जो बाजार-माँग-तालिका पर आधारित है।
माँग-
अनुसूची से हम यह देख सकते हैं कि बाजार में कीमत के 6 विवरण हैं, इनमें से • प्रत्येक विवरण को रेखाचित्र पर बिन्दु के रूप में दिखाया जा सकता है और इस विधि से जो छः बिन्दु हमें प्राप्त हो उन्हें मिलकर एक वक्र रेखा का निर्माण किया जा सकता है। यहाँ माँग-वक्र होगा। रेखाचित्र 10-1 में वस्तु की माँग की मात्राएँ OX रेखा पर नापी गयी हैं और कीमतें OY रेखा पर एवं DD माँग वक्र रेखा है।
माँग-रेखा की मान्यताएँ-माँग-तालिका कुछ मान्यताओं के आधार पर बनायी जाती है। माँग-रेखा की निम्न मान्यताएँ होती हैं— (1) कुछ कीमतें दी हुई और स्थिर हैं। इस प्रकार, माँग-रेखा एक स्थिर को सूचित करती है।
(2) उपभोक्ता के स्वभाव और उसकी रुचि में परिवर्तन नहीं होता है।
(3) उपभोक्ता की मौद्रिक आय भी स्थिर रहती है।
(4) उन वस्तुओं की कीमतों में भी, जिनमें उपभोक्ता रुचि रखता है, परिवर्तन नहीं होते हैं।
(5) कीमत में होने वाले प्रत्येक सूक्ष्म परिवर्तन का माँग पर प्रभाव पड़ता है।
(6) वस्तु को अत्यन्त छोटी-छोटी इकाइयाँ विद्यमान हैं।
उपर्युक्त मान्यताएँ व्यावहारिक जीवन में पूर्णतया सत्य नहीं है, इसलिए माँग-तालिका की भाँति माँग वक्र भी कुछ-कुछ अनुमानजनक होता है।
उपर्युक्त मान्यताएँ व्यावहारिक जगत में सत्य नहीं उतरती हैं, जिस कारण माँग-तालिका की भाँति माँग वक्र भी न्यूनाधिक अनुमानजनक होता है।
आय-माँग एवं आड़ी माँग
[INCOME DEMAND AND CROSS DEMAND]
किसी वस्तु की माँग की मात्रा पर तीन बातों का प्रभाव पड़ता है—उस वस्तु की कीमत में परिवर्तन, उपभोक्ताओं की आय में परिवर्तन और अन्य वस्तुओं की कीमतों में परिवर्तन । इस आधार पर माँग तीन प्रकार की होती है—
(1) कीमत माँग (Price demand),
(2) आय-माँग (Income demand),
(3) प्रति या आड़ी माँग (Cross demand)। हम रेखाकृति में देख चुके हैं कि कीमत-माँग रेखा बायें से नीचे की ओर गिर रही है अर्थात ऋणात्मक ढाल (Negative slope ) का होता है। यदि कीमत बढ़ती है तो माँग घटती है और कीमत घटती है, जिसका अर्थ यह हुआ कि माँग बढ़ती है।
(1) आय-माँग-
आय-माँग यह दिखाती है कि आय के विभिन्न स्तरों पर उपभोक्ता, अन्य बातें यथास्थिर रहते हुए, कितनी मात्राओं में वस्तु की माँग करता है। आय का परिवर्तन विभिन्न वस्तुओं की माँग को विभिन्न प्रकार से प्रभावित करेगा। इस उद्देश्य से हम वस्तुओं को दो भागों में बाँट सकते हैं— (1) सामान्य अथवा उत्तम वस्तुएँ (Superior goods), और (ब) हीन वस्तुएँ (Inferior goods) ।
विलास की वस्तुएँ तथा उच्चकोटि की आरामदायक वस्तुएं उत्तम वस्तुओं की श्रेणी में रखी जा सकती हैं। यदि आय बढ़ती है, तो साधारणतया ऐसी वस्तुएँ अधिक मात्रा में खरीदी जाती हैं। हीन वस्तुएँ वे हैं जिन्हें उपभोक्ता नीची दृष्टि से देखते हैं; जैसे-मोटा कपड़ा, जो, वनस्पति घी आदि । उपभोक्ता की आय बढ़ जाने पर उपभोक्ता इन वस्तुओं की मांग घटा देते हैं। दोनों प्रकार की वस्तुओं से सम्बन्धित आय-मांग की वक्र रेखाएं रेखाकृति (अ) और (ब) में दिखायी गयी हैं।
चित्र (अ) उत्तम वस्तु की माँग-आय को दिखाता है। जैसे ही आय PM से बढ़कर P'M' हो जाती है, माँग की मात्रा OM से बढ़कर OM' हो जाती है। चित्र (ब) होन वस्तु को आय-माँग को दिखाता है। जैसे ही आय बढ़कर PM से P'M' होती है, माँग को मात्रा घटकर OM' से OM रह जाती है।
(2) प्रति या आड़ी माँग (Cross Demand ) - प्रति माँग से हमारा अभिप्राय वस्तु विशेष के लिए माँग की उन मात्राओं के परिवर्तन से है जो उस वस्तु की कीमत में परिवर्तन न होकर किन्हीं अन्य वस्तुओं की कीमतों में परिवर्तन के फलस्वरूप होते हैं। अनेक बार एक वस्तु की कीमत में परिवर्तन हो जाने से दूसरी वस्तु की माँग घट-बढ़ जाती है। एक वस्तु की कीमतों के परिवर्तन का दूसरी वस्तु की माँग पर जो प्रभाव पड़ता है उसका अध्ययन तीन शीर्षकों के अन्तर्गत किया जा सकता है-
A)प्रतियोगी या स्थानपन्न वस्तुओं. ( Competitive or Substitute goods) 1 के (अ) प्रतियोगी या स्थानापन्न वस्तुओं (Competitive or Substitute. सम्बन्ध में ऐसा होता है कि एक वस्तु की कीमत की वृद्धि से दूसरी वस्तु की माँग बढ़ जाती है। उदाहरणार्थ, यदि चाय की कीमत बढ़ जाय और कॉफी की कीमत में कोई परिवर्तन न हो, तो कॉफी की मांग बढ़ जायेगी, क्योंकि अब कुछ लोग चाय के स्थान पर कॉफी खरीदने लगते हैं।
(B) पूरक वस्तुओं (Complementary goods) में ऐसा होता है कि एक की कीमत बढ़ जाने से दूसरी की मांग घट जाती है। यदि चाय की कीमत बढ़ती है तो चीनी की मांग भी घट जायेगी, क्योंकि चाय के उपभोग की कमी चीनी के उपभोग को भी घटा देती है।
C) स्वतन्त्र वस्तुओं (Independent goods) में एक वस्तु की कीमतों के परिवर्तनों का दूसरी की माँग पर लगभग कोई भी प्रभाव नहीं पड़ता। उदाहरणार्थ, यदि चाय की कीमत बढ़ती है, तो इसका नमक की माँग पर लगभग कोई भी प्रभाव नहीं पड़ेगा। रेखाकृति मे(अ) प्रतियोगी वस्तुओं की पारस्परिक माँग को दिखाता है और (ब) पूरक वस्तुओं की पारस्परिक माँग को
(अ) में चाय की कीमत और कॉफी का सम्बन्ध दिखाया गया है। कॉफी और चाय प्रतियोगी वस्तुएँ हैं। यदि चाय की कीमत बढ़ती है, तो लोग चाय के स्थान पर कॉफी खरीदने लगते हैं। इसी कारण चाय की कीमत बढ़ जाने से कॉफी की माँग बढ़ती है। जब चाय की कीमत RM है, तो कॉफी की माँग OM हैं। जब चाय की कीमत बढ़कर R'M' हो जाती है, तो कॉफी की माँग OM' हो जाती है।
चित्र (ब) में चाय की कीमत और चीनी की माँग का सम्बन्ध दिखाया गया है। ये दोनों पूरक वस्तुएँ हैं। यदि लोग कम चाय पीते हैं, तो वे चीनी का उपयोग भी कम करेंगे। जब चाय की कीमत RM है, तो चीनी की माँग OM होती है। किन्तु जब चाय की कीमत बढ़कर R'M' हो जाती है, तो चीनी की माँग घट कर OM' रह जाती है।
उपर्युक्त विवेचना से स्पष्ट है कि किसी वस्तु के लिए माँग उसकी अपनी कीमत पर ही निर्भर नहीं होती है, बल्कि उपभोक्ता की आय और अन्य वस्तुओं की कीमतों पर भी निर्भर होती है।
संयुक्त माँग, व्युत्पन्न माँग एवं सामूहिक माँग
[JOINT DEMAND DERIVED DEMAND AND COMPOSITE DEMAND] माँग 'संयुक्त', 'व्युत्पन्न' अथवा 'सामूहिक' हो सकती है। संयुक्त माँग (Joint Demand) का आशय उस माँग से है जो दो या अधिक वस्तुओं के लिए किसी एक संयुक्त उद्देश्य को पूर्ति हेतु की जाती है; जैसे मोटर और पेट्रोल की मांग। किन्तु जब एक वस्तु की मांग इसलिए की जाती है कि उसकी सहायता से किसी अन्य वस्तु का उत्पादन किया जाए तो ऐसी मांग को 'व्युत्पन्न माँग (Derived Demand) कहते हैं; जैसे मकान बनाने के लिये ईंट और सीमेंट को माँग। 'सामूहिक मांग' (Composite Demand) से आशय वस्तु की उस माँग का है, जिसे अनेक प्रयोगों में लाया जाता है, जैसे- कोयले की माँग।
माँग का नियम
LAW OF DEMAND
नियम की व्याख्या (Explanation of the Law) इसे कभी-कभी क्रय का प्रथम नियम (First Law of Purchase) भी कहते हैं। वह नियम वस्तु की कीमत और बाजार में माँग की गयी उसकी मात्रा के बीच सम्बन्ध को व्यक्त करता है। इस नियम की व्याख्या निम्न शब्दों में की जा सकती है : "अन्य बातें समान रहते हुए किसी सेवा या वस्तु की कीमत में वृद्धि होने पर उसकी मांग घटती है तथा कीमत के कमी होने पर उसकी मांग बढ़ती है। अतएव माँग का नियम कीमत तथा मांगी गयी मात्रा के विपरीत सम्बन्ध को बताता है। "" प्रो. पी. ए. सेम्युलसन (P. A. Samuelson) के अनुसार "जब किसी वस्तु की कीमत में वृद्धि होती है (और साथ ही अन्य बातें समान रहती हैं) तो है उस वस्तु को कम मात्रा मांगी जाती है अथवा दूसरे शब्दों में, यदि बाजार में वस्तु की अधिक मात्रा प्राप्य है तो (अन्य बातों के समान रहने पर) उक्त मात्रा को केवल नीची कीमत पर बेचा जा सकता है।
उपरोक्त विवेचन से स्पष्ट है कि माँग का नियम एक गुणात्मक कथन ( qualitative statement) है न कि परिमाणात्मक कथन (quantitative statement)। इसका अर्थ है कि प्रस्तुत नियम केवल माँग में परिवर्तन की दिशा को बताता है अर्थात् केवल यह बताता है कि मांग कम होगी या अधिक। यह माँग में परिवर्तन के परिमाण (quantity) को नहीं बताता अर्थात् यह नहीं बताता कि माँग कितनी मात्रा में कम होगी और कितनी मात्रा में अधिक। संक्षेप में, माँग का नियम बताता है कि माँग की अपेक्षा विपरीत दिशा में परिवर्तित होती है। परन्तु यह आवश्यक नहीं है कि माँग में परिवर्तन आनुपातिक हो ।
नियम की मान्यताएँ (Assumptions of the Law)
नियम की परिभाषा करते समय हमने इन दो वाक्यांशों (phrases) का जानबूझकर प्रयोग किया है : "माँग की उन्हीं अवस्थाओं के अन्तर्गत" तथा "बशर्ते माँग की अवस्थाएं अपरिवर्तित रहती हैं"। वास्तव में, इन वाक्यांशों का प्रयोग आवश्यक है क्योंकि इनमें वे सभी मान्यताएँ निहित हैं जिनके आधार पर इस नियम का निर्माण किया गया है। अब उनमान्यताओं को हमें स्पष्टतः पाठकों के समक्ष प्रस्तुत करना चाहिए। ये विभिन्न मान्यताएँ इस प्रकार हैं—
(i) लोगों की आय यथास्थिर रहती है,
(ii) लोगों के स्वभाव एवं रुचि में कोई परिवर्तन नहीं होता,
(iii) अन्य सम्बन्धित वस्तुओं की कीमतें यथास्थिर रहती हैं,
(iv) विचाराधीन वस्तु का कोई स्थानापन्न (substitute) उपलब्ध नहीं है,
(v) लोगों को इस बारे में तनिक भी आशंका नहीं है कि आगे चलकर वस्तु की कीमत में कोई परिवर्तन होने वाला है,
(vi) विचाराधीन वस्तु हीरे-जवाहरात की भाँति सम्मानसूचक नहीं है।
माँग का नियम तभी क्रियाशील होता है जब उपर्युक्त बातों को पहले से ही हम मानकर चलते हैं। उपर्युक्त मान्यताओं में तनिक भी परिवर्तन होने से बाजार में माँग के नियम की क्रियाशीलता समाप्त हो जाती है।
माँग का विस्तार अथवा संकुचन CONTRACTION OF DEMAND]
निम्न रेखाकृति में PM कीमत पर वस्तु की मांग की गई मात्रा OM है। यदि कीमत P'M' होती है, तो वस्तु की मांग की गयी मात्रा OM' होगी।
अतः कीमत परिवर्तन के साथ-साथ वस्तु की माँग की गयी मात्रा में भी परिवर्तन होता है लेकिन उपभोक्ता बराबर उसी माँग वक्र पर ही रहता है। वह उसी मांग-वक्र पर ऊपर-न आता-जाता रहता है। इस प्रकार कीमत-परिवर्तन से 'माँग की गयी मात्रा में तो परिवर्तन है लेकिन 'मांग में नहीं। कीमत-परिवर्तनों के परिणामस्वरूप 'माँग को गयो पात्रा में हो वाला परिवर्तन मांग का विस्तार' (extension of demand) अथवा मांग का संकुचन(contraction of demand) कहलाता है। अन्य वस्तुएँ यथास्थिर रहते हुए, कीमत में होने वाली गिरावट के परिणामस्वरूप 'माँग की गयी मात्रा का विस्तार होता है। इसके विपरीत अन्य वस्तुएँ यथास्थिर रहते हुए, कीमत में होने वाली वृद्धि के फलस्वरूप 'माँग की गयी मात्रा' का संकुचन होता है। इस प्रकार, 'माँग की गयी मात्रा में परिवर्तन कीमत-परिवर्तनों के प्रत्युत्तर (response) में ही होते हैं।
माँग में वृद्धि अथवा कमी
[INCREASE OR DECREASE IN DEMAND]
अभी तक हमने 'अन्य बातों को स्थिर मानते हुए माँग पर कीमत के प्रभाव को देखा है। अब हम यह देखेंगे कि कीमतें स्थिर रहते हुए अन्य निर्धारक तत्त्वों में से किसी में भी परिवर्तन का माँग पर जो प्रभाव पड़ता है उसे 'मांग में परिवर्तन' कहते हैं। यह मांग में वृद्धि अथवा कमी के रूप में होता है। अन्य निर्धारक तत्त्व जो माँग में परिवर्तन लाते हैं, ये हैं : उपभोक्ता की आय, रुचि व पसन्द, जनसंख्या में परिवर्तन, आय के वितरण में परिवर्तन, स्थानापन्न वस्तुओं की उपलब्धता इत्यादि ।
'माँग' के परिवर्तन (माँग की वृद्धि अथवा कमी) कीमत-परिवर्तनों के बिना ही हो जाते। हैं। वास्तविकता तो यह है कि माँग-परिवर्तनों (माँग की वृद्धि अथवा कमी) का अध्ययन करते सुमय हम वस्तु की कीमत को यथास्थिर ही मान लेते हैं। उदाहरणार्थ, यदि उपभोक्ता की मौद्रिक आय में वृद्धि होती है और उसके परिणामस्वरूप निश्चित कीमत पर वह वस्तु की मात्रा अधिक खरीदता है तो हम कह सकते हैं कि उसकी वस्तु की माँग बढ़ गयी है। इसके विपरीत, यदि उसकी मौद्रिक आय घट जाती है और परिणामतः निश्चित कीमत पर वह वस्तु की कम मात्रा खरीदता है तो हम कह सकते हैं कि उसकी वस्तु की माँग घट गयी है। दूसरे शब्दों में, माँग-वृद्धि से अभिप्राय यह है कि किसी निश्चित कीमत पर उपभोक्ता पहले की अपेक्षा वस्तु की अधिक मात्रा की माँग करता है। इसका यह भी अर्थ है कि वस्तु की एक निश्चित मात्रा की उपभोक्ता द्वारा अधिक ऊँची कीमत पर माँग की जाती है। इसके विपरीत, माँग- ह्रास से अभिप्राय यह है कि किसी निश्चित कीमत पर उपभोक्ता पहले की अपेक्षा वस्तु की कम मात्रा की माँग करता है। इसका यह भी अर्थ है कि वस्तु की एक निश्चित मात्रा की उपभोक्ता द्वारा पहले की अपेक्षा कम कीमत पर माँग की जाती है। स्मरण रहे कि माँग-परिवर्तन का अध्ययन करते समय हमें मूल माँग- अनुसूची (original demand schedule) के स्थान पर एक नयी माँग अनुसूची का निर्माण करना पड़ता है लेकिन कीमतों में हम कोई परिवर्तन नहीं करते। जब माँग में वृद्धि होती है तो प्रत्येक कीमत के समक्ष प्रदर्शित वस्तु की मात्रा पहले की अपेक्षा बढ़ जाती है। इसी प्रकार, जब माँग में कमी होती है तो प्रत्येक कीमत के समक्ष प्रदर्शित वस्तु की मात्रा पहले की अपेक्षा घट जाती है।
जब माँग-वृद्धि होती है तो समूचा माँग वक्र दायीं ओर विवर्तित (shift) हो जाता है। इसके विपरीत, जब माँग में कमी होती है तो समूचा माँग-वक्र बायीं ओर विवर्तित होता है। जब माँग-वक्र दायीं ओर विवर्तित होता है, तब उपभोक्ता पुरानी कीमत पर वस्तु की अधिक मात्रा खरीदते हैं। इसके विपरीत, जब माँग वक्र बायीं ओर विवर्तित होता है, तब उपभोक्ता पुरानी कीमत पर वस्तु की कम मात्रा खरीदते हैं। 'माँग-वृद्धि' अथवा 'माँग-हास' की व्याख्या करने हेतु हम मूल माँग- अनुसूची का पुनर्निर्माण करेंगे।'
रेखाकृति में DD मूल माँग वक्र है। DD, वक्र माँग-वृद्धि को व्यक्त करता है जबकि D2D2 वक्र माँग-वृद्धि को प्रकट करता है। DID, वक्र से स्पष्ट है कि उसी (पुरानी) कीमत पर उपभोक्ता वस्तु की अधिक मात्रा खरीदता है अथवा ऊँची कीमत पर वस्तु की वही(पुरानी) मात्रा खरीदता है। D2D2 चक्र से स्पष्ट है कि उसी (पुरानी) कीमत पर उपभोक्ता वस्तु की कम मात्रा खरीदता है अथवा कम कीमत पर वस्तु की वही (पुरानी) मात्रा खरीदता है। जैसा कि पहले कहा जा चुका है, "मांग की गयी मात्रा" में परिवर्तन कीमत-परिवर्तन के परिणामस्वरूप होता है जबकि 'माँग' में होने वाले परिवर्तन कीमत-परिवर्तन को छोड़ अन्य परिवर्तनों से होते हैं।स्मरण रहे कि माँग के निर्धारक तत्त्व (कीमत को छोड़कर) दीर्घकाल में बदल जाते हैं, स्थिर नहीं रहते । अतः ‘माँग में परिवर्तन' का महत्त्व दीर्घकाल में है। इसके विपरीत, अल्पकाल में केवल कीमत में परिवर्तन होते हैं जबकि अन्य तत्त्व स्थिर रहते हैं। अतः 'माँग की मात्रा में 'परिवर्तन' का महत्त्व अल्पकाल में है।
माँग को प्रभावित अथवा निर्धारित करने वाले घटक (Factors Influencing or Determinants of Demand)
माँग को प्रभावित करने वाले अथवा निर्धारित करने वाले घटक निम्नलिखित हैं : 1. आय में परिवर्तन - यह मानते हुए कि वस्तुओं की कीमतें यथास्थिर रहती हैं, उपभोक्ताओं की आय में होने वाली वृद्धि के परिणामस्वरूप विभिन्न वस्तुओं की माँग बढ़ जाती है। लेकिन उपभोक्ताओं की आय वृद्धि के परिणामस्वरूप 'गिफिन वस्तुओं' (Giffen Goods) की माँग गिर जाती है क्योंकि आय बढ़ जाने पर साधारणतया उपभोक्तागण प्रकृष्ट (बढ़िया) वस्तुओं को खरीदना आरम्भ कर देते हैं।
आय के प्रभाव के सम्बन्ध में तीन बातें स्मरणीय हैं— (i) आवश्यक वस्तुओं पर आय के परिवर्तन का आरामदायक और विलासिता की वस्तुओं की अपेक्षा कम प्रभाव पड़ता है, (ii) आय के परिवर्तन का माँग पर प्रभाव तत्काल ही पड़ सकता है या कुछ समय बाद, (iii) आय के परिवर्तन का माँग पर कितना प्रभाव पड़ेगा यह उपभोक्ताओं की बचत प्रवृत्ति पर निर्भर करता है। बचत-प्रवृत्ति अधिक होने पर व्यय कम होगा और माँग में अधिक वृद्धि नहीं होगी।
2. धन का वितरण - यदि धन का वितरण असमान है तो धनी लोगों द्वारा विलास की 'वस्तुओं की अधिक माँग होगी। इसके विपरीत, वितरण में समानता होने पर अनिवार्य तथा आरामदायक वस्तुओं के लिए माँग अधिक होगी।
3. आस्वादों एवं वरीयताओं में परिवर्तन- इस उपशीर्षक के अन्तर्गत हम फैशनों, रीति-रिवाजों, आदतों आदि में होने वाले परिवर्तनों को सम्मिलित कर सकते हैं। यदि कोई वस्तु विशेष फैशन में प्रचलित हो जाती है, तो निश्चय ही उपभोक्ताओं की मांग बढ़ जायेगी। उदाहरणार्थ, धोती कुरते के बजाय पैन्ट-शर्ट की मांग बढ़ी है।
4. सम्बन्धित वस्तुओं की कीमतों में परिवर्तन-किसी वस्तु की सम्बन्धित वस्तुएँ दौ प्रकार की होती है— (i) स्थानापन्न वस्तुएँ (substitutes), (ii) पूरक वस्तुएँ (comple- ments)। उदाहरणार्थ, चाय और कॉफी दो अच्छी स्थानापन्न वस्तुएं हैं। यदि चाय की कीमत को हम यथास्थिर मान लें तो कॉफी की कीमत वृद्धि के परिणामस्वरूप चाय की मांग बढ़ जायेगी। इसके विपरीत, (फिर चाय की कीमत को यथास्थिर मानते हुए) कॉफी की कीमत में होने वाली गिरावट के फलस्वरूप चाय की मांग घट जायेगी। दो वस्तुएँ तब पूरक कहलाती हैं जब किसी आवश्यकता को सन्तुष्ट करने हेतु दोनों की एक साथ जरूरत पड़ती है। उदाहरणार्थ, मक्खन और डबलरोटी पूरक वस्तुएँ हैं। डबलरोटी की कीमत में होने वाली गिरावट से मक्खन की मांग बढ़ जायेगी। इसके विपरीत, यदि डबलरोटी की कीमत में वृद्धि होती है तो मक्खन की मांग घट जायेगी।
5. विविध तत्व — इस उपशीर्षक के अन्तर्गत हम (i) जनसंख्या, (ii) व्यावसायिक परिस्थिति, (iii) भावी कीमतों से सम्बन्धित आशंसाएँ, (iv) जलवायु तथा मौसम, (v) मुद्रा की मात्रा, (vi) व्यापार की दशा, इत्यादि जैसे तत्वों को सम्मिलित करते हैं। ये विविध तत्व भी किसी वस्तु की माँग को प्रभावित करते हैं। उदाहरणार्थ, देश में जनसंख्या वृद्धि से खाद्यात्रों की माँग बढ़ जाती है।
जब उपर्युक्त तत्वों में परिवर्तन होते हैं तो माँग वक्र भी परिवर्तित हो जाता है। यह दायों ओर अथवा वायीं ओर विवर्तित हो जाता है। इस प्रकार माँग-वक्र सदैव परिवर्तनशील होते हैं।
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