संपोषित कृषि
रासायनिक खादों तथा कीटनाशकों पर पूर्णतः आधारित पारम्परिक कृषि (Conventional agriculture) से खाद्यान्न उत्पादन में अभूतपूर्व वृद्धि तो हुई लेकिन साथ ही भूमि क्षरण, वनविनाश, पर्यावरण प्रदूषण, आनुवंशिक ह्रास, भूमिगत जलस्तर में गिरावट जैसी गंभीर समस्यायें भी पैदा हुई। उपर्युक्त समस्याओं को देखते हुए यह महसूस किया गया कि पारम्परिक कृषि लम्बी दौड़ में टीकाऊ नहीं है। इसी के परिणामस्वरूप संपोषित कृषि (Sustainable agriculture) की अवधारणा का जन्म 1981 में हुआ जो कि प्राकृतिक संसाधनों तथा पर्यावरण संरक्षण पर विषेष जोर देती है। संपोषित कृषि को सतत कृषि, निर्वहनीय कृषि, समगतिशील कृषि तथा टिकाऊ कृषि के नामों से भी जाना जाता है। ‘संपोषित कृषि वह कृषि है जो वर्तमान पीढ़ी की आवश्यकताओं की पुर्ति के साथ-साथ भावी पीढ़ी की आवश्यकताओं के पुर्ति का भी ध्यान रखती है।’’
लोगों में आमतौर से भ्रान्ति है कि संपोषित कृषि एवं जीवांश कृषि (Organic agriculture) एक-दूसरे के पर्यायवाची हैं। लेकिन यहाँ यह बताना आवश्यक है कि संपोषित कृषि एक विस्तृत शब्दावली है जो जीवांश कृषि को भी अपने आप में समाहित करता है। अर्थात दूसरे शब्दों में जीवांश कृषि संपोषित कृषि का ही एक रूप है जिसमें रासायनिक खादों एवं कीटनाशकों का प्रयोग पूर्णतः वर्जित होता है। संपोषित कृषि के मुख्यतः चार लक्ष्य होते हैं। (i) संसाधन संरक्षण, (ii) पर्यावरण स्वास्थ्य, (iii) आर्थिक लाभ; तथा (iv) सामाजिक एवं आर्थिक समानता।
संपोषित कृषि में प्रबन्धन प्रक्रियायें पारम्परिक कृषि से भिन्न होती है। इस प्रकार की कृषि में आनुवंशिक संसाधनों एवं जल संसाधनों के संरक्षण के साथ मृदा संरक्षण पर विशेष बल दिया जाता है।
संपोषित कृषि में उर्वरा शक्ति बढ़ाने के लिए एकीकृत पोषक प्रबन्धन, कीटों के नियन्त्रण के लिए एकीकृत कीट प्रबन्धन तथा खरपतवार नियन्त्रण के लिए एकीकृत खरपतवार नियन्त्रण को व्यवहार में लाया जाता है। जबकि इसके विपरीत पारम्परिक कृषि में मृदा की उर्वरा शक्ति बढ़ाने के लिए रासायनिक उर्वरकों तथा कीट एवं खरपतवार नियन्त्रण के लिए हानिकारक रसायनों का प्रयोग होता है।
खाद्यान्न उत्पाद में वृद्धि के लिए अधिक उपज देने वाली कुछ संकर किस्मों के उपयोग के कारण विभिन्न फसलों की पारम्परिक देसी किस्में या तो विलुप्त हो चुकी हैं या विलुप्ति के कगार पर खड़ी हैं। फसलों की विभिन्न देसी किस्मों के साथ-साथ उनके जंगली प्रजातियों (Wild relatives) के क्षय को आनुवंशिक ह्रास (Genetic erosion) के रुप में जाना जाता है। देशी किस्मों का संरक्षण आवश्यक है क्योंकि संकर किस्मों की तुलना में इनमें ज्यादा पौष्टिकता होती है। इसके अतिरिक्त इनमें बहुत से उपयोगी गुण (रोगरोधी, कीटरोधी, सूखारोधी आदि) होते हैं जो भविष्य में संकर किस्मों के सुधार में कारगर साबित हो सकते हैं।
चूंकि जैव-विविधता संरक्षण भी संपोषित कृषि का एक प्रमुख लक्ष्य होता है, इसलिए इस प्रकार की कृषि में संकर प्रजातियों के साथ-साथ देसी किस्मों की खेती पर भी विशेष जोर दिया जाता है जिससे फसलों की देसी प्रजातियों को संरक्षित किया जा सके ताकि भावी पीढ़ी इनसे लाभान्वित हो सके।
जल एक अत्यन्त ही महत्वपूर्ण प्राकृतिक संसाधन है। पारम्परिक कृषि कार्यों हेतु जल के अंधाधुन्ध दोहन के परिणामस्वरूप भूमिगत जल में गिरावट आयी है। भारत में हरित क्रान्ति से प्रभावित राज्यों जैसे पंजाब, हरियाणा एवं पश्चिमी उत्तर प्रदेश में भूमिगत जलस्तर के गिरावट में अभूतपूर्व वृद्धि दर्ज की गई है। पंजाब राज्य के 57 प्रतिशत क्षेत्रफल का भूमिगत जल सिंचाई योग्य नहीं रह गया है।
संपोषित कृषि जल संरक्षण पर विशेष ध्यान देती है। संपोषित कृषि में वर्षा जल के संचय, जलविभाजक प्रबन्धन (Watershed management) पर विशेष ध्यान दिया जाता है ताकि वर्षा जल का अधिक से अधिक उपयोग कृषि कार्यों हेतु किया जा सके। इसके अतिरिक्त टपक सिंचाई (Drip irrigation) जैसी सिंचाई विधियों के प्रयोग पर भी जोर दिया जाता है जिसमें सिंचाई कार्यों हेतु जल का न्यूनतम इस्तेमाल होता है। इस प्रकार जल संरक्षण को बढ़ावा मिलता है।
चूंकि भूमि एक अत्यन्त ही महत्वपूर्ण संसाधन है। अतः संपोषित कृषि में भूमि संरक्षण पर भी विशेष ध्यान दिया जाता है क्योंकि पारम्परिक कृषि प्रणाली का सर्वाधिक हानिकारक प्रभाव भूमि पर पड़ा है। आज भारत के कुल क्षेत्रफल 329 मिलियन हेक्टयर का लगभग 178 मिलियन हेक्टेयर भूमि बंजर या बेकार भूमि में तब्दील हो चुकी है। इसमें लगभग 7 मिलियन हेक्टेयर भूमि लवणता तथा लगभग 6 मिलियन हेक्टेयर भूमि जल-जमाव से प्रभावित है। रासायनिक उर्वरकों के अंधाधुन्ध प्रयोग से मृदा अपरदन की दर में लगातार वृद्धि हुई है। देश की लगभग 25 प्रतिशत भूमि जल अपरदन से प्रभावित है।
पारम्परिक कृषि में रासायनिक खादों के अंधाधुन्ध प्रयोग से न सिर्फ मृदा क्षरण को बढ़ावा मिलता है अपितु सतही तथा भूमिगत जल भी प्रदूषित हो जाता हैं। इसलिए संपोषित कृषि में मृदा की उर्वरा शक्ति की बढ़ोत्तरी के लिए एकीकृत पोषक प्रबन्धन को अपनाया जाता है। एकीकृत पोषक प्रबन्धन में खाद, गोबर खाद, हरी खाद, कम्पोस्ट, केंचुआ खाद, जैविक खाद तथा खली (Oil cake) का इस्तेमाल होता है। इसके अतिरिक्त अगर आवश्यकता पड़ती है तो अल्प मात्रा में रासायनिक खादों का भी प्रयोग किया जाता है।
जैविक खाद में नाइट्रोजन आपूर्ति के लिए नील हरित शैवालों (Blue green algae) जैसे एनाबीना, नास्टाक, आलोसाइरा, सिलेण्डोस्परमम, साइटोनीमा, प्लेक्टोनीमा, ग्लियोकैप्सा आदि का उपयोग होता है। नील हरित शैवालों की नाइट्रोजन स्थिरीकरण की दर 15 से 45 किलोग्राम नाइट्रोजन प्रति हेक्टेयर तक होती है। इसके अतिरिक्त फर्न प्रजाति का पौधा एजोला पिन्नेटा (Azolla pinnata) का प्रयोग जैविक खाद के रूप में धान के खेती में होता है। एलोजा जलीय पौधा है जो आमतौर से बरसात में तालाब, टैंक आदि में बहुतायत में उगता है। एजोला की मोटी परत 30 से 40 किलोग्राम नाइट्रोजन प्रति हेक्टेयर की दर से खेत को आपूर्ति करती है।
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