हरित क्रांति


 हरित क्रांति 1960 के दशक में नॉर्मन बोरलॉग (Norman Borlaug) द्वारा शुरू किया गया एक प्रयास था। इन्हें विश्व  में 'हरित क्रांति के जनक' (Father of Green Revolution) के रूप में जाना जाता है।
वर्ष 1970 में नॉर्मन बोरलॉग को उच्च उपज देने वाली किस्मों (High Yielding Varieties- HYVs) को विकसित करने के उनके  कार्य के लिये नोबेल शांति पुरस्कार प्रदान किया गया।
भारत में हरित क्रांति का नेतृत्व मुख्य रूप से एम.एस. स्वामीनाथन द्वारा किया गया।
हरित क्रांति के परिणामस्वरूप खाद्यान्न (विशेषकर गेहूंँ और चावल) के उत्पादन में भारी वृद्धि हुई, जिसकी शुरुआत  20वीं शताब्दी के मध्य में विकासशील देशों में नए, उच्च उपज देने वाले किस्म के बीजों के प्रयोग के कारण हुई।
इसकी प्रारंभिक सफलता मेक्सिको और भारतीय उपमहाद्वीप में देखी गई।
वर्ष 1967-68 तथा वर्ष 1977-78 की अवधि में हुई हरित क्रांति  भारत  को खाद्यान्न की कमी वाले देश की श्रेणी से निकालकर विश्व  के अग्रणी कृषि देशों की श्रेणी में परिवर्तित कर दिया।
हरित क्रांति 
हरित क्रांति के उद्देश्य: 
लघु अवधि के लिये: दूसरी पंचवर्षीय योजना के दौरान भारत में भुखमरी की समस्या  को दूर करने हेतु  हरित क्रांति शुरू की गई थी।
दीर्घ अवधि के लिये: दीर्घकालिक उद्देश्यों में ग्रामीण विकास, औद्योगिक विकास पर आधारित समग्र कृषि का आधुनिकीकरण; बुनियादी ढांँचे का विकास, कच्चे माल की आपूर्ति आदि शामिल थे।
रोज़गार: कृषि और औद्योगिक दोनों क्षेत्र के श्रमिकों को रोज़गार प्रदान करना।
वैज्ञानिक अध्ययन: स्वस्थ  पौधों का उत्पादन करना, जो अनुकूल/विषम जलवायु और रोगों का सामना करने में सक्षम हो।
कृषि का वैश्वीकरण: गैर-औद्योगिक राष्ट्रों में प्रौद्योगिकी का प्रसार करना और प्रमुख कृषि क्षेत्रों में निगमों की स्थापना को प्रोत्साहित करना।
हरित क्रांति के मूल तत्त्व: 
कृषि क्षेत्र का विस्तार: यद्यपि वर्ष 1947 से ही कृषि योग्य भूमि के क्षेत्रफल को विस्तारित किया जा रहा था परंतु यह खाद्यान की बढ़ती मांँग को पूरा करने हेतु पर्याप्त नहीं था।
हरित क्रांति ने कृषि भूमि के विस्तार में सहायता प्रदान की है।
दोहरी फसल प्रणाली: दोहरी फसल,  हरित क्रांति की एक प्राथमिक विशेषता थी। इसके तहत वर्ष में एक के बजाय दो फसल प्राप्त करने का निर्णय लिया गया।
    • प्रतिवर्ष एक फसल को प्राप्त करना इस तथ्य पर आधारित था कि बरसात का मौसम वर्ष में केवल एक बार ही आता है।
    • हरित क्रांति के दूसरे चरण में जल की आपूर्ति के लिये बड़ी सिंचाई परियोजनाएँ शुरू की गई। बांँधों का निर्माण किया गया और अन्य सरल सिंचाई तकनीकों को भी अपनाया गया।
  • उन्नत आनुवंशिकी बीजों का उपयोग: श्रेष्ठ आनुवंशिकी (Superior Genetics) बीजों का उपयोग करना हरित क्रांति का वैज्ञानिक पहलू था।
    • भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (Indian Council for Agricultural Research) द्वारा उच्च उपज देने वाले बीज, मुख्य रूप से गेहूं , चावल, बाजरा और मक्का के बीजों की नई किस्मों को विकास किया गया।
  • क्रांति में शामिल महत्त्वपूर्ण फसलें:
    • मुख्य फसलें गेहूंँ, चावल, ज्वार, बाजरा और मक्का ।
    • गैर-खाद्यान्नों फसलों को नई रणनीति के दायरे से बाहर रखा गया था।
    • गेहूँ कई वर्षों तक हरित क्रांति का मुख्य आधार बना रही।

भारत में हरित क्रांति:  

भारत में हरित क्रांति की पृष्ठभूमि:

  • 1943 में, भारत विश्व में सबसे अधिक खाद्य संकट से पीड़ित देश था। बंगाल में  अकाल के कारण पूर्वी भारत में लगभग 4 मिलियन लोग भूख के कारण मारे गए थे।
  • हालांँकि वर्ष 1947 में आज़ादी के बाद वर्ष 1967 तक, सरकार द्वारा बड़े पैमाने पर कृषि क्षेत्रों के विस्तार पर ध्यान केंद्रित किया गया।
    • लेकिन देश की जनसंख्या वृद्धि खाद्य उत्पादन की तुलना में बहुत तीव्र गति से बढ़ रही थी।
  • तीव्र गति से बढ़ती जनसंख्या ने खाद्यान उत्पादन बढ़ाने हेतु तत्काल और कठोर कार्रवाई करने की आवश्यकता पर बल दिया जिसकी परणिति हरित क्रांति के रूप में उभरकर सामने आई।
  • भारत में हरित क्रांति उस अवधि को संदर्भित करती है जब भारतीय कृषि अधिक उपज देने वाले बीज की किस्मों, ट्रैक्टर, सिंचाई सुविधाओं, कीटनाशकों और उर्वरकों के उपयोग जैसे आधुनिक तरीकों एवं  प्रौद्योगिकियों को अपनाने के कारण  एक औद्योगिक प्रणाली में परिवर्तित हो गई थी।
  • इसे भारत सरकार और अमेरिका की फोर्ड एंड रॉकफेलर फाउंडेशन (Ford and Rockefeller Foundation) द्वारा वित्तपोषित किया गया था।
  • भारत में हरित क्रांति मोटे तौर पर गेहूंँ क्रांति है क्योंकि वर्ष 1967-68 और वर्ष 2003-04 के मध्य  गेहूंँ के उत्पादन में तीन गुना से अधिक की वृद्धि हुई, जबकि अनाजों   के उत्पादन में कुल वृद्धि केवल दो गुना थी।

    हरित क्रांति के सकारात्मक प्रभाव:

    • फसल उत्पादन में वृद्धि: इसके परिणामस्वरूप वर्ष 1978-79 में 131 मिलियन टन अनाज का उत्पादन हुआ और भारत विश्व के सबसे बड़े कृषि उत्पादक  देश के रूप में स्थापित हो गया।
      • हरित क्रांति के दौरान गेहूंँ और चावल की अधिक उपज देने वाली किस्मों के तहत फसल क्षेत्र में काफी वृद्धि हुई।
    • खाद्यान्न आयात में कमी: भारत खाद्यान्न में आत्मनिर्भर हो गया और केंद्रीय पूल में पर्याप्त भंडार था, यहांँ तक कि भारत खाद्यान्न निर्यात करने की स्थिति में था।
      • खाद्यान्न की प्रति व्यक्ति शुद्ध उपलब्धता में भी वृद्धि हुई है।
    • किसानों को लाभ: हरित क्रांति की शुरुआत से किसानों की  आय के स्तर में बढ़ोतरी हुई।
      • कृषि उत्पादकता में सुधार हेतु  किसानों द्वारा अपनी अधिशेष आय का पुनः निवेश किया गया।.
      • 10 हेक्टेयर से अधिक भूमि वाले बड़े किसानों को इस क्रांति से विशेष रूप से विभिन्न आदानों जैसे-HYV बीज, उर्वरक, मशीन आदि में बड़ी मात्रा में निवेश करने से लाभ प्राप्त हुआ। इसने पूंजीवादी कृषि  (Capitalist Farming) को भी बढ़ावा दिया।
    • औद्योगिक विकास: हरित क्रांति ने बड़े पैमाने पर कृषि मशीनीकरण को बढ़ावा दिया जिससे ट्रैक्टर, हार्वेस्टर, थ्रेशर, कंबाइन, डीज़ल इंजन, इलेक्ट्रिक मोटर, पंपिंग सेट इत्यादि विभिन्न प्रकार की मशीनों की मांँग उत्पन्न हुई।
      • इसके अलावा रासायनिक उर्वरकों, कीटनाशकों, खरपतवारनाशी आदि की मांग में भी काफी वृद्धि हुई है।
      • कृषि आधारित उद्योगों के रूप में पहचाने जाने वाले विभिन्न उद्योगों में कई कृषि उत्पादों का उपयोग कच्चे माल के रूप में भी किया जाता था।
    • ग्रामीण रोज़गार: बहुफसली और उर्वरकों के उपयोग के कारण श्रम बल की मांग में उल्लेखनीय वृद्धि हुई।
      • हरित क्रांति से न केवल कृषि श्रमिकों हेतु बल्कि औद्योगिक श्रमिकों के लिये भी  कारखानों और पनबिजली स्टेशनों से  संबंधित सुविधाओं का निर्माण होने से  रोज़गार के विभिन्न अवसर निर्मित हुए। 

    हरित क्रांति के नकारात्मक प्रभाव:

    • गैर-खाद्य अनाज शामिल नहीं: हालांँकि गेहूंँ, चावल, ज्वार, बाजरा और मक्का सहित सभी खाद्यान्न का उत्पादन क्रांति स्तर पर हुआ  परंतु अन्य फसलों जैसे- मोटे अनाज, दलहन और तिलहन को हरित क्रांति के दायरे से बाहर रखा गया था।
      • कपास, जूट, चाय और गन्ना जैसी प्रमुख व्यावसायिक फसलें भी हरित क्रांति से लगभग अछूती रहीं।
    • HYVP का सीमित कवरेज: अधिक उपज देने वाला किस्म कार्यक्रम (High Yielding Variety Programme- HYVP) केवल पांँच फसलों: गेहूंँ, चावल, ज़्वार, बाजरा और मक्का तक ही सीमित था।
      • इसलिये गैर-खाद्यान्नों को नई रणनीति के दायरे से बाहर रखा गया।
      • गैर-खाद्य फसलों में HYV बीज या तो अभी तक विकसित नहीं हुए थे या किसान उनके प्रयोग हेतु जोखिम उठाने हेतु तैयार नहीं थे।

    क्षेत्रीय असमानताएँ:

    • हरित क्रांति प्रौद्योगिकी ने अंतर-क्षेत्रीय और अंतरा-क्षेत्रीय स्तरों पर आर्थिक विकास में असमानताओं को और अधिक बढ़ाया।
      • हरित क्रांति का प्रभाव अभी तक कुल फसली क्षेत्र के  40 प्रतिशत पर ही दिखा  है 60 प्रतिशत क्षेत्र अभी भी इससे अछूता है।
      • इसका सबसे अधिक प्रभाव उत्तर में पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश और दक्षिण में आंध्र प्रदेश एवं  तमिलनाडु में है।
      • इसका प्रभाव असम, बिहार, पश्चिम बंगाल और ओडिशा सहित पूर्वी क्षेत्र तथा पश्चिमी एवं दक्षिणी भारत के शुष्क और अर्ध-शुष्क क्षेत्रों में शायद ही हुआ हो।
      • हरित क्रांति ने केवल उन्हीं क्षेत्रों को प्रभावित किया जो पहले से ही कृषि की दृष्टि से बेहतर स्थिति में थे।
      • इस प्रकार हरित क्रांति के परिणामस्वरूप क्षेत्रीय असमानता की समस्या और बढ़ गई है।
    • रसायनों का अत्यधिक उपयोग: हरित क्रांति के परिणामस्वरूप उन्नत सिंचाई परियोजनाओं और फसल किस्मों हेतु  कीटनाशकों और सिंथेटिक नाइट्रोजन उर्वरकों का बड़े पैमाने पर उपयोग हुआ।
      • कीटनाशकों के गहन उपयोग से जुड़े उच्च जोखिम के बारे में किसानों को शिक्षित करने हेतु कोई प्रयास नहीं किया गया।
        • आमतौर पर अप्रशिक्षित खेतिहर मज़दूरों द्वारा निर्देशों या सावधानियों का पालन किये बिना ही फसलों पर कीटनाशकों का छिड़काव किया जाता था।
      • इससे फसलों को फायदे से ज़्यादा नुकसान होता है और यह पर्यावरण और मिट्टी के प्रदूषण का कारण भी बनता है।
    • पानी की खपत: हरित क्रांति में शामिल की गई फसलें जलप्रधान फसलें थीं।
      • इन फसलों में से अधिकांश अनाज/ खाद्यान्न थीं  जिन्हें  लगभग 50% जल आपूर्ति की आवश्यकता होती है।
      • नहर प्रणाली की शुरुआत की गई, इसके अलावा सिंचाई पंपों का उपयोग भी बढ़ा, जिसने भूजल के स्तर को और भी नीचे ला दिया जैसे- गन्ना और चावल जैसी अधिक जल आपूर्ति की आवश्यकता वाली फसलों में गहन सिंचाई के कारण  भूजल स्तर में गिरावट आई।
      • पंजाब एक प्रमुख गेहूंँ और चावल की खेती वाला क्षेत्र है, इसलिये  यह भारत में सबसे ज़्यादा  जल की कमी वाले क्षेत्रों में से एक है।
    • मृदा और फसल उत्पादन पर प्रभाव: फसल उत्पादन में वृद्धि सुनिश्चित करने हेतु  बार-बार एक ही फसल चक्र को अपनाने से मृदा में पोषक तत्त्वों की कमी हो जाती है।
      • नए प्रकार के बीजों की ज़रूरतों के हिसाब से किसानों द्वारा उर्वरकों का अधिक उपयोग किया गया।
      • इन क्षारीय रसायनों के उपयोग से मिट्टी के पीएच स्तर में बढ़ोतरी हो गई है।
      • मृदा में ज़हरीले रसायनों के उपयोग से  लाभकारी रोगजनकों ( Beneficial Pathogens) नष्ट हो गए , जिससे उपज में और गिरावट आई।
    • बेरोज़गारी: पंजाब को छोड़कर और कुछ हद तक हरियाणा में हरित क्रांति के तहत कृषि यंत्रीकरण ने ग्रामीण क्षेत्रों में खेतिहर मज़दूरों के मध्य व्यापक स्तर पर बेरोज़गारी को बढाया है।
      • इसका सबसे ज़्यादा असर गरीब और भूमिहीन मज़दूर पर देखा गया।
    • स्वास्थ्य पर प्रभाव: रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों जैसे- फॉस्फामिडोन, मेथोमाइल, ट्रायज़ोफोस और मोनोक्रोटोफॉस के बड़े पैमाने पर उपयोग के परिणामस्वरूप कैंसर, गुर्दे का फेल होना, मृत शिशुओं और जन्म दोषों सहित कई गंभीर स्वास्थ्य बीमारियाँ उत्पन्न हुईं।

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