राष्ट्रीय आय में परिवर्तन
योजना काल में राष्ट्रीय आय
स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात 4 अगस्त 1949 को केन्द्रीय सरकार ने कलकत्ता स्थित Stastical Institute के. प्रो. पी. सी. महालनोबीस की अध्यक्षता में एक राष्ट्रीय आय समिती की इस समिती के दो सदस्य गोखले स्कूल ऑफ इकोनोमिक्स के डॉ. डी. आर. दिल्ली स्कूल ऑफ इकोनोमिक्स के डॉ बी. के. आर. बी. रॉय । इस समिती की सहायता एवं के लिए तीन विदेशी विशेषज्ञ भी नियुक्त हुए प्रो. साइमन कुजनेट (पेन्सिलवेनिया विश्वविद्य अमरीका) प्रो. जे. आर. डी. स्टोन (कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय ब्रिटेन) व डॉ. जे. बी. डी. राष्ट्रसंघ) इस समिती ने अपनी प्रथम रिपोर्ट 1951 में व अन्तिम रिपोर्ट 14 फरवरी, 1956 प्रस्तुत
अनुमान स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद कुछ वर्षो तक अर्थात् 1960-61 तक राष्ट्रीय आय के मूल्यों व 1948-49 के मूल्यों के आधार पर लगाये जाते रहे लेकिन 1960-61 में राष्ट्रीय आय गणना की नवीन श्रृंखला प्रारम्भ की गयी जिसमें 1960-61 को आधार वर्ष मान गया, लेकिन में 1870–71, 1980–81, 1993-94, 2004-5 तथा वर्तमान में 2011-12 के आधार पर न श्रृंखलाओं को अपनाया गया है।
1) सकल घरेलू उत्पाद तथा निवल राष्ट्रीय आय में वृध्दि (Growth of Gross Domes product and Net National Income) सकल राष्ट्रीय आय अथवा सकल घरेलू उत्पाद सामान् बराबर बढ़ती रही है जिसका ब्यौरा निम्न प्रकार है :
वर्तमान कीमतो के आधार पर सकल राष्ट्रीय आय और निवल राष्ट्रीय आय में वृध्दि को सारणी में प्रदर्शित किया गया है। 1980-81 के दशक में सकल राष्ट्रीय आय और निवल राष्ट्रीय आय में तेजी से वृद्धि हुई यह वृध्दि 1990-91 में दशक तक बनी रही। इस समय में भारत में नवीन आर्थिक सुधारों के पूर्व की स्थिति थी और सी. पी. चंद्रशेखर एवं जयती घोष के अनुसार इस अवधि में निर्यात इतने अधिक नही थे कि भारत की राष्ट्रीय आय में वृध्दि हो सके। परंतु इस समय राष्ट्रीय आय में जो वृध्दि हुई इसका मुख्य कारण भुगतान संतुलन के घाटे को पूरा करने के लिए सरकार व्दारा लिये गये ऋण थे।
तालिका से स्पष्ट है कि निवल राष्ट्रीय आय के परिणाम उत्साहवर्धक नही रहे प्रथम पंचवर्षीय योजना में लक्ष्य मात्र 2.1 प्रतिशत था जबकि उपलब्धि 46 प्रतिशत प्रति वर्ष थी व्दितीय पंचवर्षीय योजना में लक्ष्य 4.5 प्रतिशत था जबकि उपलब्धि 4.1 प्रतिशत प्रति वर्ष तृतीय पंचवर्षीय योजना में लक्ष्य 5.6 प्रतिशत था जबकि उपलब्धि 3.3 प्रतिशत प्रति वर्ष, चतुर्थ पंचवर्षीय योजना में लक्ष्य 5.7 प्रतिशत था जबकि उपलब्धि 3.0 प्रतिशत प्रति वर्ष पंचम पंचवर्षीय योजना में लक्ष्य 4.4 प्रतिशत था जबकि उपलब्धि 5.0 प्रतिशत प्रति वर्ष रही जो बेहतर कही जा सकती है। इस समय यदपि राष्ट्रीय आय लक्ष्य से अधिक रही परंतु यह विकास अनियमित रहा। छठवी पंचवर्षीय योजना में लक्ष्य 52 प्रतिशत था जबकि उपलब्धि 5.3 प्रतिशत प्रति वर्ष सातवी पंचवर्षीय योजना में लक्ष्य 50 प्रतिशत था जबकि उपलब्धि 5.8 प्रतिशत प्रति वर्ष रही जो कि अनुमान से बेहतर है इस संतोषजनक वृध्दि के कारण देश का आर्थिक विकास तेजी से हुआ। आठवी पंचवर्षीय योजना में लक्ष्य 5.6 प्रतिशत था जबकि उपलब्धि 6.5 प्रतिशत प्रति वर्ष रही जिसमें राष्ट्रीय आय का प्रदर्शन सर्वोत्तम रहा। इस समय में 19.5 प्रतिशत की दशकीय वृध्दि राष्ट्रीय आय में आई जो अब तक कासबसे अधिक सफल दशक माना जाता है। नौवी पंचवर्षीय योजना में लक्ष्य 6.5 प्रतिशत था जबकि उपलब्धि 5.4 प्रतिशत प्रति वर्ष, दसवी पंचवर्षीय योजना में लक्ष्य 8.0 प्रतिशत था जबकि उपलब्ध था लक्ष्य 9.0 प्रतिशत था जबकि उपलब्धि 7.5 प्रतिशत प्रति वर्ष रही। 2011-12 की श्रृंखला के पर (चालू कीमतो के आधार पर) 2012-13 में 13.3 प्रतिशत वार्षिक वृध्दि दर, 2013-14 में 1 प्रतिशत वार्षिक वृद्धि दर 2015-16 में 8.7 प्रतिशत वार्षिक वृध्दि दर रही।
प्रति व्यक्ति आय में परिवर्तन (Variations in per Capital Income)
राष्ट्रीय आय में वृद्धि की अपेक्षा प्रति व्यक्ति आय आर्थिक स्थिति के विकास को -अधिक बेहतर तरीके से स्पष्ट कर सकती है। भारत में स्वतंत्रता के समय प्रति व्यक्ति आय 274 रूपये थी। तब से अब तक वर्षों में प्रति व्यक्ति आय में भी लगातार परिवर्तन होते रहे है जिन संक्षिप्त विवरण निम्न प्रकार है :
उपर्युक्त विवरण से पता चलता है कि पिछले वर्षो से प्रति व्यक्ति आय चालू मूल्यों के धार पर 1 गुनी बढ़ी है। चालू कीमतों के आधार पर प्रतिव्यक्ति आय में निरंतर वृध्दि हुई है। पिछले 65 वर्षों में प्रतिव्यक्ति आय या तो कुछ वर्ष स्थिर रही या इसमें गिरावट आई है। परंतु 1991-92 से 2013-14 के बीच प्रतिव्यक्ति आय में वृद्धि 4.6 प्रतिशत प्रतिवर्ष के स्तर पर रही जो बहुत बेहतर तो नही है परंतु उसमें वृध्दि की उम्मीद रखी जा सकती है। अन्य देशों में प्रतिव्यक्ति आप बहुत अधिक रही है।
सारणी से स्पष्ट है कि कई देशों की तुलना में भारत की प्रति व्यक्ति आय अब भी बहुत कम है। भूटान, चीन और ब्राजील की तुलना में भी भारत की प्रतिव्यक्ति आय का निष्पादन अच्छा नहीं कहा जा सकता।
भारत में राष्ट्रीय आय या घरेलू उत्पाद एंव प्रति व्यक्ति आय कम होने के कारण
- भारत में राष्ट्रीय आय या घरेलू उत्पाद एंव प्रति व्यक्ति आय कम होने के बहुत से कारण है जिनमें प्रमुख कारण निम्न प्रकार है :
1) भूस्वामित्व में असमानता • भारत में ग्रामीण क्षेत्रों में भूमि पर कुछ ही लोगों का स्वामित्व - है। अधिकांश कृषको के पास भूमि का अपेक्षाकृत कम भाव उपलब्ध है जिससे प्रति व्यक्ति आय प्रभावित होती है। भारत में जोतो का औसत आकार 0.37 हेक्टर है जो आवश्यकता के लिए अपर्याप्त है।
2) संपत्ति का केंद्रीकरण बड़े उद्योगपतियो के हाथ में आर्थिक शक्ति का सर्वेन्द्रम है। - Business world, November 17, 2014P-90-93 के अनुसार मार्च 1995 को निजी क्षेत्र की सबसे बड़ी 10 कंपनियो की कुल परिसंपत्ति 45,830 करोड रूपए थी। इसके विपरीत 2013-14 में केवल एक कंपनी रिलायंस इंडस्ट्रीज (जो निजी क्षेत्र की सबसे बड़ी कंपनी है) की परिसंपत्ति अकेले ही 4,28,843 करोड़ रूपए थी। इस वर्ष परिसंपत्ति अनुसार निजी क्षेत्र की सबसे बड़ी पांच कंपनिया थी रिलायंस इंडस्ट्रीज, टाटा मोटर्स, सेसा स्टरलाईट, भारती एयरटेल, तथा लार्सन एण्ड टुब्रो इन पांच कंपनियों की कुल परिसंपत्ति 12,09,694 करोड़ रूपए थी। (भारतीय अर्थव्यवस्था. मिश्रा पुरी पृष्ठ 180 से साभार)
3) पूँजी का अभाव भारत में प्रति व्यक्ति आय कम होने से बचत कम होती है। इससे पुँजी निर्माण की दर कम रहती है जिसका अन्त मे प्रभाव यह होता है कि पूँजी के अभाव में उद्योंगो का विकास नही हो पाता है। अतः उत्पादन वृद्धि के अभाव में प्रति व्यक्ति आय कम ही बनी रहती है।
4 बढ़ती हुई जनसंख्या एवं निम्न उत्पादकता इस देश की जनसंख्या बराबर बढ़ रही जो बढ़ती हुई प्रति व्यक्ति आय को निगल जाती है ओर इस प्रकार प्रति व्यक्ति आय कम रहती है। साथ ही यहाँ पर प्रति श्रमिक उत्पादकता अन्य देशों की तुलना में कम है। अतः उत्पादन में कोई विशेष परिवर्तन न होने के कारण प्रति व्यक्ति आय कम ही बनी रहती है।
5) साहसी योग्यता का अभाव भारत में साहसी योग्यता का अभाव है। यहाँ कोई भी स व्यक्ति जोखिम लेकर नये नये उद्योग व व्यवसाय स्थापित नहीं करना चाहता है। इससे उत्पादन वृद्धि नही होती है और इस प्रकार प्रति व्यक्ति आय में वृध्दि नहीं होती है। • यहाँ पर उन आधारभूत सेवाओं का अभाव है जो
6 आधारभूत सेवाओं का अभाव
उत्पादन को बढ़ाने में योग देती है जिससे प्रति व्यक्ति आय बढ़ती है। यह सेवाएँ है परिवहन संचार बीमा, बैंक, वित्तिय संस्थाएँ, विद्युत शक्ति आदि ।
7) सीमित बाजार • यहाँ पर वस्तुओं व सेवाओं के लिए बाजार भी सीमित है, क्योंकि भारत में भौतिक समृद्धि को अधिक स्थान नही दिया जाता। यहाँ पर वस्तुओं व सेवाओं की मांग उ उत्पादन से कम ही रहती है। इसका परिणाम यह होता है कि न तो नयी नयी वस्तुएँ बनती है औ न कुल उत्पादन ही बढ़ता है।
8) स्फीति और कीमत वृध्दि – पिछले 65 वर्षों में कीमतो में लगातार वृध्दि होती रही है और इस वृध्दि से असंगठित क्षेत्रो में कार्य करने वाले किसानो और श्रमिको की वास्तविक आय लगता घटी है इसके विपरीत स्फीति से उद्योगपतियो और व्यापारियो को लाभ हुआ है जिससे आय लगातर घटी है।
9) बेरोजगारी - भारत में व्यापक स्तर पर बेरोजगारी बढ़ी है कई वर्षो में ग्रामीण एवं शहरी दोनो क्षेत्रों में बेरोजगारी की दर में वृध्दि हुई है। जिसके कारण निर्धनता, आय की असमानता और प्रतिव्यक्ति आय में लगातार कमी हुई है।
10) वित्तिय संस्थाओ की साख नीति विभिन्न समितियों की रिपोर्ट से यह स्पष्ट है कि बैंको - और वित्तिय संस्थाओं की ऋण प्रदान करने की नीति व्यापारियो और उद्योगपतियो के हितो में रही है। इस नीति के कारण छोटे व्यापारी कृषक और अन्य लघु एवं कुटीर उद्योगपतियों को हानि हुई है जिससे प्रतिव्यक्ति आय घटी है।
11) सरकार की भूमिका 1990 के दशक से शुरू किये उदारीकरण और निजीकरण की प्रक्रिया ने समाज के कमजोर वर्ग को नुकसान पहुँचाया है। सरकार की भूमिका सामाजिक शक्तियों को संतुलित कर समायोजित विकास की न रहकर केवल निरिक्षण की रह गई है। जिससे देश आर्थिक असमानता बढी है।
भारत में राष्ट्रीय आय एंव प्रति व्यक्ति आय बढ़ने के सुझाव (SUGGESTIONS FOR RAISING NATIONAL & PER CAPITA INCOME IN INDIA)
भारत की राष्ट्रीय आय एंव प्रति व्यक्ति आय बढ़ने के लिए उन कारणों का ही निवारण करना होगा जो इनको कम बनाये रखने में योग दे रहे तथा जिनका उल्लेख कम होने के कारण। में किया गया है। भारत में राष्ट्रीय एवं प्रति व्यक्ति आय बढ़ाने के लिए सुझाव इस प्रकार है-
1) भूमि सुधार और कृषि का पुर्नवितरण ग्रामीण क्षेत्रों में आय की असमानता को कम करने के लिए भूमि के पुर्नवितरण की तीव्र आवश्यकता है। यदपि इस दिशा में सरकार ने पहले कार्य किया है परंतु अब तक ये प्रयास अपर्याप्त रहे है। गरीबी निवारण के लिए यह अवश्य है कि अतिरिक्त कृषि श्रम को हटाकर नवीन उत्पादक कार्यों में लगाए जायें।
2) रोजगार सृजन प्रतिव्यक्ति आय को बढ़ाने के लिए यह आवश्यक प्रतिि - रोजगार उपलब्धता बढे सरकार के व्दारा विभिन्न योजनाएँ प्रारंभ कि गई है जिसमें महात्मा गांधी राष्ट्रीय रोजगार गारण्टी योजना 2006 (MANREGA) सबसे अधिक महत्वकाक्षी योजना है। परंतु
अब भी इसकी व्यापक सफलता पर संदेह है।
3) निर्धनों के विकास कार्यक्रम भारत में निर्धनों का एक बड़ा वर्ग ग्रामीण क्षेत्र में निवास करता है जहाँ मौसमी और अन्य बेरोजगारी पाई जाती है। ग्रामीणों के उत्थान के लिए यह आवश्यक है कि विभिन्न कार्यक्रम ग्रामीण स्तर पर प्रारम्भ किये जाये।
4 कर व्यवस्था में सुधार भारत में धन के कैदियकरण को रोकने के लिए यह आवश्यक है कि सरकार कर ढाँचे में व्यापक सुधार लागू करे जिससे देश में आर्थिक असमानता को कम करने के लिए सहायता हो सके। औद्योगिक क्षेत्र को दी जा रही कर छूट और रियायतों को घटाकर करो की दरों को प्रगामी बनाया जाए।
5) सामाजिक सुरक्षा व्यवस्था देश में कोई सामाजिक सुरक्षा प्रणाली नहीं है। संगठित क्षेत्र में श्रमिको को सामाजिक सुरक्षा के दृष्टिकोण से कुछ सहायता प्राप्त होती है परंतु यह अपर्याप्त है। ग्रामीण क्षेत्र, मजदूर बेरोजगार वृध्द एवं निर्भर जनसंख्या के लिए कोई सामाजिक सुरक्षा की व्यवस्था नहीं है।
राष्ट्रीय उत्पाद की उद्योगवार प्रवृत्ति (National Product By Industry of Origin)
देश के विभिन्न औद्योगिक गतिविधियो व्दारा राष्ट्रीय आय का निर्माण होता है। इन विभिन्न औद्योगिक क्षेत्रो को सुविधा की दृष्टि एवं उनकी उत्पादन प्रणाली के आधार पर तीन भागों में विभाजित किया गया है। संपूर्ण अर्थव्यवस्था में विभिन्न आर्थिक क्रिया तीन क्षेत्र में विभाजित होती है।
1) कृषि क्षेत्र अथवा प्राथमिक क्षेत्र- इसमें कृषि, पशुपालन मत्स्य पालन वानिकी एवं अन्य संबद्ध गतिविधीयों संलग्न है।
2) औद्योगिक क्षेत्र अथवा द्वितीय क्षेत्र-इसमें खनन उत्खनन् विनिर्माण विद्युत एवं जलपूर्ति तथा निर्माण शामिल है।
3) सेवा क्षेत्र अथवा तृतिय क्षेत्र इसमें व्यापार होटल, परिवहन एवं संचार वित्त व्यवस्था बीमा सामुदायिक सामाजिक एवं व्यक्तिक सेवाएं शामिल होती है।
स्वंतत्रा के पश्चात के वर्षों में भारत की राष्ट्रीय आय में कृषि का हिस्सा लगातर घटा है जो 1950-51 में 53.1 प्रतिशत से घटकर 2013-14 में 13.9 हो गया। इसका कारण यह है कि भारत में इस समय औद्योगिक और सेवा क्षेत्र में तीव्र वृद्धि हो गई है जिससे इन क्षेत्रो की राष्ट्रीय आय में भागीदारी बढ़ी है।
औद्योगिक क्षेत्र या व्दितीय क्षेत्र का राष्ट्रीय आय मे योगदान 1950-51 में 16.6 प्रतिशत से बढ़कर 2013-14 में 26.2 हो गया। इसका कारण यह है कि भारत में विनिर्माण और निर्माण के क्षेत्र में तीव्र गति से वृध्दि हुई है। परंतु अब भी अन्य विकासशील राष्ट्रो की तुलना में इसका हिस्सा कम है।
सेवा क्षेत्र या तृतिय क्षेत्र का भारत में तीव्र गति से विकास हुआ है। 1950-51 में इसका
राष्ट्रीय आय में योगदान 30.3 प्रतिशत से बढ़कर 2013-14 में 59.9 हो गया। इसका कारण यह है
कि देश में बैंक, बीमा और अन्य व्यवसायिक सेवा जैसे सूचना प्रद्योगिकी का तेजी से विकास हुआ। जिसके परिणाम स्वरूप सेवा क्षेत्र का योगदान लगातर बढ़ा।
राष्ट्रीय आय या घरेलू उत्पाद की प्रवृत्तिया या विशेषताएँ (Charecteristics of National
Income)
भारत की राष्ट्रीय आय या घरेलू उत्पाद मे निम्न विशेषताएँ पायी जाती है। इन्ही विशेषताओं को राष्ट्रीय आय या घरेलू उत्पाद मे होने वाले परिवर्तन या प्रवृत्तिया भी कहते है
1) सकल राष्ट्रीय उत्पादन में वृध्दि 1950-51 और 2015-16 के बीच शुध्द राष्ट्रीय आय में लगातार वृद्धि हुई है। चालू मूल्यों के आधार पर सकल राष्ट्रीय आय 1950-51 में 10360 करोड रूपये थी जो 2015-16 में बढ़कर 13409892 करोड़ रूपये हो गयी अर्थात् 1200 गुना से अधिक वृध्दि हुई है। इसी समय में चालू मूल्यों के आधार पर निवल राष्ट्रीय आय 1950-51 में 9829 करोड रूपये थी जो 2015-16 में बढ़कर 11961524 करोड रूपये हो गयी अर्थात् 1200 गुना वृध्दि हुई है।
2) प्रति व्यक्ति आय में वृध्दि - भारत मे प्रति व्यक्ति आय में भी लगातार वृध्दि हो रही है। चालू मूल्यों के आधार पर 1950-51 में प्रति व्यक्ति आय 274 रूपये थी जो 2015-16 में बढ़कर 93231 रूपये हो गयी है, अर्थात् इसमें 340 गुना वृध्दि हो गयी है परंतु अब भी विश्व के अन्य विकासशील देशो की तुलना यह असंतोष जनक है।
3) राष्ट्रीय आय तथा प्रति व्यक्ति आय की वृध्दि दरों मे अन्तर राष्ट्रीय आय में 1950-51 से 2015-16 तक 1200 गुना से अधिक वृध्दि हुई जबकि प्रतिव्यक्ति आय इस समय में केवल 340 गुना बढ़ी जो इस बात को स्पष्ट करता है कि देश में आर्थिक असमानता में तेजी से वृध्दि हुई है। अमीर और गरीब लोगो के मध्य आर्थिक असमानता बढ़ी है और समायोजित विकास के लिए यह स्थिति अनुकूल नहीं है। राष्ट्रीय आय बढ़ने पर भी प्रति व्यक्ति आय में उतनी वृध्दि नही हुई है। इसका एक महत्वपूर्ण कारण बढ़ती हुई जनसंख्या भी हो सकता है।
4) राष्ट्रीय आय का असमान वितरण - हाल में एक अनुमान के अनुसार राष्ट्रीय आय का लगभग 33 प्रतिशत भाग उच्च वर्ग के परिवारों को प्राप्त होता है, जबकि 66 प्रतिशत परिवारो को केवल 33 प्रतिशत ही भाग प्राप्त होता है। इस प्रकार राष्ट्रीय आय का वितरण बहुत ही असमान है। (National poverty headcount ratio is the percentage of the population living below the national poverty lines, National estimates are based on population-weighted subgroup
· estimates from household surveys.) विश्व बैंक 2016 की रिपोर्ट के अनुसार 1993 में भारत में गरीबी का अनुपात 45.3 प्रतिशत था जो 2004 में घटकर 37.2 और 2011 में 21.9 प्रतिशत हो गया अर्थात राष्ट्रीय आय बढ़ने से प्रतिव्यक्ति आय ना बढ़े तो यह स्पष्ट है कि देश में आर्थिक असमानता और गरीबी बढ़ रही है।
5) विभिन्न क्षेत्रो के योगदान में असमानता भारत की राष्ट्रीय आय में प्राथमिक, व्दितीय और तृतिय क्षेत्रों का योगदान असमान है। विकासशील देशो में सेवा क्षेत्र का बढ़ता योगदान और कृषि • क्षेत्र का घटता योगदान अच्छा माना जाता है। परंतु भारत में समस्या यह है कि यदपि कृषि क्षेत्र का योगदान घटा है परंतु कृषि पर निर्भर जनसंख्या अब भी उतनी ही है। सेवा क्षेत्र के साथ औद्योगिक क्षेत्र का पर्याप्त विकास नही हुआ। इसमें अभी भी विकास की अनेक संभावनाएँ है।
भारत की राष्ट्रीय आय या घरेलू उत्पाद की गणना मे कठिनाईया या सीमाएँ (Problems in Measuring National Income in India)
किसी भी देश की राष्ट्रीय आय की गणना करने के लिए अनेक प्रकार की तकनीकी विस्तृत जानकारी की आवश्यकता होती है, लेकिन यह जानकारी तभी मिल सकती है जबकि इस सम्बन्ध में नियमित रूप से आँकड़े एकत्रित किये जाते है। भारत मे राष्ट्रीय आय संबंधी आँकडे न तो पर्याप्त है और न ही वैज्ञानिक। इसलिए राष्ट्रीय आय की गणना में अनेक कठिनाईयाँ है। सूचनाओ का अभाव एवं संकलन के उचित प्रणाली का उपलब्ध नही होना, इसके प्रमुख कारण है। कुछ कठिनाईयाँ अवधारणा (Structure) सम्बन्धी है, जैसे किन वस्तुओ की सेवाओं को राष्ट्रीय आय में शामिल किया जाए ? नवीन वस्तुओं का मूल्याकंन किस प्रकार किया जाए ? आदि। भारत ने राष्ट्रीय आय की गणना करने मे निम्न कठिनाईयाँ या सीमाएँ है।
1) परिपूर्ण व्याख्या का अभाव इसका अर्थ यह है कि राष्ट्रीय आय की गणना करने में - सेवाओं को शामिल किया जाए अथवा नही? यदि शामिल भी किया जाए तो किन सेवाओं को, इन सभी प्रश्नो की पूर्ण व्याख्या उपलब्ध नही है। उदाहरण के लिए, गृहिणी व्दारा घर मे सेवाएँ करना, कार के मालिक व्दारा स्वंय कार चलाना, गृहिणी व्दारा घर मे कलात्मक वस्तुओं को बनाकर अपने शयन कक्ष में लगाना आदि। भारत में यह सेवाएँ शामिल नही की जाती है। अतः राष्ट्रीय आय के अनुमान सही प्रतीत नही होते है।
2) नवीन वस्तुएँ - भारत एक तीव्र गति से बढ़ती हुई अर्थव्यवस्था है। अतः यहाँ बहुत सी नवीन वस्तुएँ नियमित उत्पादित की जाती है जिन्हें बाद में राष्ट्रीय आय में शामिल किया जाए या नही यह समस्या होती है, लेकिन जब वे वस्तुएँ आधार वर्ष में होती ही नही थी तो उनका मूल्य आधार वर्ष के मूल्य से निकालने में कठिनाईयाँ होती है।
3) अमुद्रीकत क्षेत्र की विद्यमानता एक देश की राष्ट्रीय आय का ठीक ठीक अनुमान लगाने के लिए यह आवश्यक है कि उस देश की अर्थव्यवस्था संगठित हो तथा वस्तुओं व सेवाओ का विनिमय मुद्रा में होता हो। भारत में स्थिति भिन्न है। यहा गांवो में क्रय विक्रय में मुद्रा का प्रयोग भी कम होता है। अतः यहाँ पर यह पता लगाना कठिन है कि कितने उत्पादन का इस प्रकार विनिमय हुआ। अतः भारत में राष्ट्रीय आय निकालने के लिए सम्बन्ध में कुछ अनुमान (Guess) ही लगाये जाते है, लेकिन वे सदा सही हो, ऐसा होना सम्भव नही है। वर्तमान में शासन व्दारा डिजीटल मनी ट्रांसफर के व्दारा अर्थव्यवस्था को मौद्रिक क्षेत्र में लाने का प्रयास किया जा रहा हैं।
4 व्यावसायिक श्रेणीकरण का अभाव भारत में विभिन्न व्यवसायों में लगे हुए व्यक्ति लिए कोई विशिष्ट आँकड़े उपलग नहीं है कि एक व्यक्ति एक व्यवसाय के साथ अन्य व्यवसाय करता है। इससे राष्ट्रीय आय की गणना करने में कठिनाईयाँ होती है, जैसे भारत में किसान भी करता है, कपड़े भी बुनता है, मजदूरी भी करता है, गुर्गी भी पालता है, इससे राष्ट्रीय आय की गणना करने में कठिनाईयाँ होती है।
5) जन सहयोग एवं जागरूकता का अभाव भारत में राष्ट्रीय आय की गणना करने में कठिनाईयाँ जन सहयोग की है जब कभी भी यहाँ आँकड़े एकत्रित किये जाते है तो जनता सही सूचनाएँ नही दी जाती है। कुछ व्यक्ति तो आय कर व अन्य कर न लग जायें इससे सही सू नहीं देते जबकि कुछ अशिक्षा व अपर्याप्त हिसाब किताब के कारण नही दे पाते है। इससे राष्ट्रीय आय की गणना में कठिनाईयाँ होती है तथा गणना सही प्रतीत नही होती है।
6) पर्याप्त एंव उचित सांख्यिकी का अभाव- राष्ट्रीय आय की गणना करने में अनेक प्रकार की साख्यिकी की आवश्यकता पड़ती है। जैसे उत्पादन लागत, बचत, उपभोग व्यय, कार्य जनसंख्या, मजदूरी, लाभ आदि। भारत में यह आँकड़े सरकारी कर्मचारी एकत्रित करते हैं। ग्राम क्षेत्रों में यह कार्य पटवारी या लेखपाल के व्दारा किया जाता है जो इस कार्य के लिए प्रशिक्षित नही होता है साथ ही उसका यह कार्य मुख्य भी नही होता है। इसका फल यह होता है कि दे सही और पर्याप्त नही होते है। इसलिए राष्ट्रीय आय समिति ने अपनी पहली रिपोर्ट में लिखा है कि भारत में राष्ट्रीय आय के क्षेत्र में सांख्यिकीय और विश्लेषणात्मक (Statistical and Analysical) दोनो प्रकार की सामग्रियों का अपेक्षाकृत अभाव निर्धनता के उस दुश्चक्र का अंग है जो कि अन्य विकसित अर्थव्यवस्था का लक्षण है।
7) प्रादेशिक अन्तर भारत में सभी प्रदेश जलवायू, भूमि, रहन सहन, औद्योगिक उत्पादन कृषि उत्पादन, रीति - रिवाज आदि में भिन्न है। अतः प्रत्येक प्रदेश के आँकडे अलग अलग एकत करने पड़ते है। इसमें समय, धन, सामग्री, आदि को जुटाने में कठिनाईयाँ होती है।
भारत की राष्ट्रीय आय या घरेलू उत्पादन की गणना में सुधार हेतु सुझाव (Suggestion to Measuring National Income in India)
भारत में राष्ट्रीय आय की गणना करने में कुछ कठिनाईयाँ आती है। अतः इस सम्बन्ध मे कुछ तथ्यो को ध्यान में रखकर गणना करने से एक वैज्ञानिक कार्यप्रणाली विकसित की जा सकती है जिसके माध्यम से गणना उचित और वैज्ञानिक हो सके।
1) आँकड़ों का नियमित एवं निरन्तर एकत्रीकरण आँकड़ो की आवश्यकता केवल राष्ट्रीय - आय की गणना करने के लिए नही होती, बल्कि आर्थिक विकास की स्थिति जानने के लिए भी होती है अतः सबसे प्रमुख एवं महत्वपूर्ण सुझाव यह है कि देश में केन्द्रीय संस्था होनी चाहिए जो आँकड़े को नियमित रूप से एकत्रित करती है। इससे आँकड़े नियमित रूप से मिलते रहेंगे तथा उसे एकरूपता बनी रहेगी। यह संस्था केन्द्रीय सांख्यिकीय संगठन जैसी हो सकती है या फिर इसी केन्द्रीय सांख्यिकीय संगठन को और अधिक प्रभावशाली बनाया जा सकता है। इस समय भारत में कई एजेंसीयाँ ऑकडे एकत्रित करती है उन सबको मिलाकर एक कर देना चाहिए।
2) सभी क्षेत्रो के आँकड़े एकत्रित करने की आवश्यकता राष्ट्रीय आय की गणना में सुधार - हेतु दुसरा सुझाव यह है कि जिन क्षेत्रो के सम्बन्ध मे आँकड़े उपलब्ध नहीं है तथा जिनके बारे मे केवल अनुमान ही लगाया जाता है, उन क्षेत्रों में सम्बन्धित आँकड़े एकत्रित करने की व्यवस्था की जानी चाहिए। इन क्षेत्रों मे फसले, कुटीर उद्योग, घरेलू तथा स्व रोजगार आदि आते है। भारत मे उत्पादन लागत के सम्बन्ध मे भी आवश्यक आँकड़े उपलब्ध नहीं है। अतः इस सम्बंध में भी व्यवस्था की जानी चाहिए।
3) उपभोग के आँकड़े एकत्रित करने की आवश्यकता राष्ट्रीय आय की गणना मे उपभोग सम्बन्धी आँकड़ो का होना भी आवश्यक है। जिसे कि गैर जरूरी उपभोग, माँग की लोच, भावी मॉंग, आदि का भी उचित अनुमान लगाया जा सके। इन सभी के विषय मे आवश्यक आँकड़े होने से आय के न्यायोचित वितरण के लिए नीतियाँ अपनीयी जा सकती है।
भारत में राष्ट्रीय आय की गणना करने में जो कठिनाईयाँ या कमियाँ है वे उपर्युक्त सुझावो को पूरा करने पर दूर की जा सकती है।
Comments
Post a Comment