उत्पादन फलन

 उत्पादन फलन, आगतों (इनपुट)और निर्गतों(आउटपुट) में एक गणितीय फलनात्मक/ तकनीकी / यांत्रिक संबंध है,
वस्तु का उत्पादन उत्पति के विभिन्न साधनों के परस्पर संयोग से होता है। जो वस्तु उत्पादित होती है, उसे उत्पाद (ouput) एवं साधनों द्वारा उत्पादन किया जाता है, उसे आगत (input) कहते है। किसी फर्म के उत्पादों एवं आगतों के मध्य के सम्बन्धों को उत्पादन फलन कहते है

अन्य शब्दों में वस्तु का उत्पादन उत्पति के विभिन्न साधनों के परस्पर संयोग से होता है। जो वस्तु उत्पादित होती है, उसे उत्पाद (ouput) एवं साधनों द्वारा उत्पादन किया जाता है, उसे आगत (input) कहते है। किसी फर्म के उत्पादों एवं आगतों के मध्य के सम्बन्धों को उत्पादन फलन कहते है। 

उपादान उत्पादन के विभिन्न कारक हैं जैसे भूमि, श्रम, पूँजी वहीँ उत्पादन सामान एवं सेवाएं हैं। इसे हम गणितीय फलन के रूप में इस प्रकार दर्शाते हैं :

Q = f(L,K)

ऊपर Q का मतलब उत्पादन है, L का मतलब श्रम है एवं K का मतलब मशीन से है। अतः यह फलन श्रम एवं मचिनों जैसे संसाधनों एवं कुल उत्पादन के बीच सम्बन्ध बताता है।


 यह एक दी गई समय अवधि में दिए गए साधनों के संयोग से जैसे - भूमि, श्रम, पूंजी तथा उद्यमी तथा प्रौद्योगिकी से अधिकतम संभव उत्पादन किया जा सके। Q = f (L, K) जहां Q वस्तु x की उत्पादन मात्रा है

प्रो. लेफ्टविच के अनुसार," उत्पादन फलन शब्द उस भौतिक संबंध के लिए प्रयुक्त किया जाता है जो एक फर्म के साधनों के आगत इकाइयों और निर्गत (उत्पादों) के मध्य पाया जाता है।" 

प्रो. साइटवस्की के अनुसार, " किसी भी फर्म का उत्पादन, उत्पत्ति के साधनों का फलन है।" 

उत्पादन फलन की मान्यताएं (utpadan falan ki manyataye)

उत्पादन फलन की मान्यताएं इस प्रकार से है--

उत्पादन फलन निम्न मान्यताओं पर आधारित होता है-

(1) किसी दिए हुए समय में तकनीकी ज्ञान का स्तर यथास्थिर रहता है अर्थात दिए हुए समय में उसमें कोई परिवर्तन नहीं होता।
(2) फर्म समय विशेष में उत्पादन की कुशलता तकनीकी का प्रयोग करेगी, जबकि फर्म के लिए लागत व्यय दिया हुआ हो।
(3) उत्पादन के विभिन्न साधनों को छोटी-छोटी इकाइयों में विभाजित किया जा सकता है।
(4) उत्पादन फलन की एक मान्यता यह है कि उत्पादन इकाई के लिए लागत व्यय दिया हुआ होता है। अर्थात उत्पादन के साधनों की क़ीमतें स्थिर हैं।
(5) एक उत्पादन फलन केवल एक दिए हुए समय के लिए ही सत्य होता है।

उत्पादन फलन की विशेषताएं

उत्पादन फलन की विशेषताएं है- 
  1. एक उत्पादन फलन, एक दी हुई प्रौद्योगिकों के लिए परिभाषित किया जाता है। यह तकनीक है जो निर्गत के अधिकतम स्तरों को निर्धारित करता है जिसका उत्पादन आगतों के विभिन्न संयोगों को उपयोग में लाकर किया जाता है,
  2. यदि प्रौद्योगिकी /तकनीक में सुधार होता है, तो विभिन्न आगत संयोगों में वृद्धि से प्राप्त होने वाले आउटपुट के अधिकतम स्तरों को प्राप्त की जा सकती है। तब हमें एक नवीन उत्पादन फलन प्राप्त होता है;
  3. अल्पकालीन उत्पादन फलन में फर्म सभी आगतों में परिवर्तन नहीं कर सकता है। निर्गत स्तर में परिवर्तन लाने के लिए फर्म केवल परिवर्ती(परिवर्तन शील साधन) आगत में परिवर्तन करता है जबकि स्थिर आगत स्थिर रहती है;
  4. दीर्घकालीन उत्पादन फलन में फर्म उत्पादन के सभी साधनों (कारकों) में परिवर्तन ला सकता है; एक फर्म निर्गत के विभिन्न स्तरों का उत्पादन करने के लिए, दीर्घकाल में दोनों कारकों ‘स्थिर एवं परिवर्ती’ में साथ-साथ परिवर्तन ला सकती है। अतः दीर्घकाल में कोई भी स्थिर आगत नहीं होती है;
  5. उत्पादन फलन का कार्य उत्पादन की भौतिक मात्रा तथा साधनों की भौतिक मात्रा के मध्य सम्बन्ध की व्याख्या करना है; 
  6. उत्पादन का सिद्धान्त उत्पादन के नियम की चर्चा करता है। कुशलतम तकनीक में से किसी एक विशेष तकनीक का चुनाव, कीमत पर निर्भर करता है न कि तकनीक पर। उत्पादन फलन की व्याख्या  (Production function उपर्युक्त सभी मान्यताओं के आधार पर फर्म के काल्पनिक उत्पादन फलन को निम्न तालिका की सहायता से समझ सकते हैं-
इस तालिका में OX-अक्ष पर श्रम की इकाइयाँ तथा OY-अक्ष पर पूँजी की इकाइयाँ दी गयी हैं। हम तालिका में दी गयी श्रम और पूँजी की विभिन्न इकाइयों को मिलाकर प्राप्त उत्पादन की मात्राओं का अध्ययन करेंगे। 
यदि श्रम की 3 इकाइयों और पूँजी की 5 इकाइयों के प्रयोग से उत्पादन किया जाए तो उत्पाद (output) की मात्रा 390 प्राप्त होती है। इसी तरह यदि श्रम की 5 इकाइयों और पूँजी की 2 इकाइयों के प्रयोग से उत्पादन किया जाय तो उत्पादन की मात्रा 320 प्राप्त होती है।

 फलन के प्रकार

उत्पादन फलन, उत्पाद की मात्रा तथा साधन की मात्रा के बीच एक विशेष सम्बन्ध को प्रदर्शित करता है। साधरणतया, उत्पादन फलन दो प्रकार के होते हैं-

अवधि के आधार पर उत्पादन फलन के प्रकार (types of production function in hindi)

  1. अल्पकाल उत्पादन फलन
  2. दीर्घकाल उत्पादन फलन

1. अल्पकाल उत्पादन फलन (short run production function in hindi)

i) अल्पकालीन उत्पादन फलन–अल्पकालीन अवधि से आशय उस अवधि से लगाया जाता है जिसमें उत्पत्ति के सभी साधनों को बदलना सम्भव नहीं होता है। अल्पकाल में उत्पादन का समय कम होने के कारण केवल कुछ साधनों को ही परिवर्तित किया जा सकता है। जिन साधनों को परिवर्तित नहीं किया जा सकता है उन्हें स्थिर साधन कहते हैं। जिन साधनों को परिवर्तित किया जा सकता है उन्हें परिवर्तनशील साधन कहते हैं।

इसके अंतर्गत उत्पादन के दो तरह के कारक होते हैं :

  1. स्थिर कारक (साधन)
  2. परिवर्ती कारक (साधन)

स्थिर कारक  (fixed factors in hindi)

स्थिर कारक ऐसे कारक होते हैं जिन्हें उत्पादन के साथ परिवर्तित नहीं किया जाता है। मशीन, भूमि एवं बिल्डिंग ऐसे ही उत्पादन के साधन होते हैं।

परिवर्ती कारक (variable factors in hindi)

परिवर्ती कारक ऐसे कारक होते हैं जिन्हें उत्पादन के साथ परिवर्तित किया जाता है। जैसे श्रम, कच्चा माल आदि।

ii) दीर्घकालीन उत्पादन फलन – दीर्घकाल वह अवधि होती है जिसमें उत्पत्ति के सभी साधनों को परिवर्तित किया जा सकता है। इस कारण इस अवधि में कोई साधन स्थिर नहीं रहता है। इस अवस्था में फर्म या उत्पादक उत्पत्ति के साधनों में आवश्यकतानुसार परिवर्तन कर सकता है लेकिन इसमें तकनीक में सुधार के परिवर्तनों को शामिल नहीं किया जाता है। 

इस प्रकार अल्पकालीन तथा दीर्घकालीन उत्पादन फलन में दो प्रमुख अन्तर हैं – 

(a) अल्पकाल में स्थिर तथा परिवर्तनशील साधनों के अनुपात उत्पादन में परिवर्तन के साथ बदलते रहते हैं जबकि दीर्घकाल में सभी साधनों के अनुपात पूर्व की भाँति अपरिवर्तित रहते हैं। 

(b) अल्पकालीन उत्पादन फलन में तकनीक की दशा अपरिवर्तित रहती है जबकि दीर्घकाल में तकनीकी परिवर्तन की स्थिति लचीली होती है।

कुल उत्पादन(TP) :

परिवर्ती साधन की सभी इकाइयों का प्रयोग करके जितना उत्पादन होता है उस उत्पादन को कुल उत्पादन(TP) कहा जाता है।

TP = AP * Q

सीमान्त उत्पादन(MP) :

परिवर्ती साधन की एक और इकाई के प्रयोग करके उत्पादन होने के बाद कुल उत्पादन में जो बदलाव अत है उस उत्पादन को सीमान्त उत्पादन(MP) कहते हैं।

MP = TPn – TPn-1

औसत उत्पादन(AP):

परिवर्ती साधन की प्रति इकाई से जितना उत्पादन होता है उसे औसत उत्पादन(AP) कहते हैं।

AP = TP/Q


कुल उत्पादन(TP) एवं सीमान्त उत्पादन(MP) में सम्बन्ध :
  • जब सीमान्त उत्पादन बढ़ता है तो कुल उत्पादन तेजी से बढ़ता है।
  • जब सीमान्त घटता है तो कुल उत्पादन घटती दर से बढ़ता है।
  • जब सीमान्त शून्य स्तर पर होता है तो कुल उत्पादन अपने अधिकतम स्तर पर होता है।
  • सीमान्त उत्पादन के ऋणात्मक होने के बाद कुल उत्पादन घटने लगता है।
सीमांत उत्पादन(MP) एवं औसत उत्पादन(AP) में संबंध :
  • जब सीमान्त उत्पादन औसत उत्पादन से अधिक होता है तो औसत उत्पादन बढ़ता है।
  • जब सीमान्त उत्पादन औसत उत्पादन से अधिक होता है तो औसत उत्पादन घटता है।
  • जब सीमान्त उत्पादन एवं औसत उत्पादन बराबर होते हैं तो तब औसत उत्पादन अपने अधिकतम स्तर पर होता है।
  • सीमान्त उत्पादन आगे जाकर रिनात्मक हो जाता है लेकिन औसत उत्पादन हमेशा धनात्मक रहता है।




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