बेरोजगारी
जब हम बेरोजगार शब्द का प्रयोग करते हैं तो हम उन व्यक्तियों की ओर संकेत करते हैं जो 15 से 64 वर्ष की आयु के समूह में होते हैं। इस आयु समूह में आने वाले जो कार्य करने की इच्छा व योग्यता रखते हो, श्रम बल कहलाते हैं। इसी आयु समूह के लोग जो रोजगार में लगे होते हैं अर्थात रोजगार में लगे हुए श्रम बलों को कार्य बल कहते हैं। दूसरे शब्दों में श्रमबल के अंतर्गत आने वाला कोई व्यक्ति बेरोजगार तब माना जाता है, जब वह प्रचलित मजदूरी पर काम करने की इच्छा एवं योग्यता रखता हो, किंतु उसे काम नहीं मिलता, वह बेरोजगार कहलाता है और यह स्थिति बेरोजगारी कहलाती है।
मगर कुछ लोग स्वेच्छा से बेरोजगार होते हैं। वह भिक्षा मांग कर अपना जीवन निर्वाह करते हैं या वे परजीवी जीवन को प्राथमिकता देते हैं। ऐसे लोगों को बेरोजगारों में शामिल नहीं किया जाता। उन्हें भी बेरोजगारों में शामिल नहीं किया जाता, जो केवल काम की इच्छा रखते हैं, पर उनमें योग्यता का अभाव होता है।
बेरोजगारी का स्वरूप : भारत एक विकासशील किंतु अल्पविकसित देश है। इस कारण यहां बेरोजगारी का स्वरूप औद्योगिक दृष्टि से उन्नत देशों से भिन्न है। भारत में बेरोजगारी का स्वरूप संरचनात्मक किस्म का है।
बेरोज़गारी:
किसी व्यक्ति द्वारा सक्रियता से रोज़गार की तलाश किये जाने के बावजूद जब उसे काम नहीं मिल पाता तो यह अवस्था बेरोज़गारी कहलाती है।
बेरोज़गारी का प्रयोग प्रायः अर्थव्यवस्था के स्वास्थ्य के मापक के रूप में किया जाता है।
बेरोज़गारी को सामान्यत: बेरोज़गारी दर के रूप में मापा जाता है, जिसे श्रमबल में शामिल व्यक्तियों की संख्या में से बेरोज़गार व्यक्तियों की संख्या को भाग देकर प्राप्त किया जाता है।
राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (NSO) किसी व्यक्ति की निम्नलिखित स्थितियों पर रोज़गार और बेरोज़गारी को परिभाषित करता है:
1,कार्यरत (आर्थिक गतिविधि में संलग्न) यानी 'रोज़गार'।
2, काम की तलाश में या काम के लिये उपलब्ध यानी 'बेरोज़गार'।
3, न तो काम की तलाश में है और न ही उपलब्ध।
पहले दो श्रम बल का गठन करते हैं और बेरोज़गारी दर उस श्रम बल का प्रतिशत है जो बिना काम के है।
बेरोज़गारी दर = (बेरोज़गार श्रमिक/कुल श्रम शक्ति) × 100
बेरोज़गारी के प्रकार:
प्रच्छन्न बेरोज़गारी:
यह एक ऐसी स्थिति है जिसमें वास्तव में आवश्यकता से अधिक लोगों को रोज़गार दिया जाता है।इस प्रकार की बेरोजगारी अधिकतर ग्रामीण क्षेत्रों में देखने को मिलती है। यहां सभी लोग ऊपरी तौर पर कृषि कार्य में लगे दिखाई देते हैं, लेकिन वास्तव में सब लोगों के लिए पर्याप्त मात्रा में कृषि क्षेत्र में कार्य नहीं जुट पाता। क्योंकि इस प्रकार के लोगों की खेती में उपस्थिति अथवा अनुपस्थिति का उत्पादन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता।यही फालतू या अनावश्यक श्रम जिसकी कृषि क्षेत्र में सीमांत उत्पादकता शून्य होती है, प्रच्छन्न बेरोजगारी कहलाती है।
अल्प रोजगार : इसके अंतर्गत ऐसे श्रमिक आते हैं जिनको थोड़ा बहुत काम मिलता है और जिनके द्वारा वह थोड़ा बहुत उत्पादन में योगदान तो करते हैं। लेकिन इनको अपनी क्षमता अनुसार काम नहीं मिलता, या पूरा काम नहीं मिलता। उदाहरण स्वरुप एक इंजीनियर द्वारा दफ्तर के साधारण क्लर्क का कार्य किया जाना। ऐसे श्रमिक उत्पादन में योगदान तो करते हैं लेकिन उतना नहीं जितना कि वे कर सकते हैं। इसमें कृषि में लगे श्रमिक भी आते हैं। जिन्हें करने के लिए कम काम मिलता है। शहरों में भी ऐसे लोग होते हैं जो कुछ न कुछ काम करते हैं और उत्पादन कार्य में हाथ बढ़ाते हैं। लेकिन काम कम करने के कारण पूरी तरह रोजगार में लगे नहीं समझे जा सकते। इस प्रकार की स्थिति अल्प रोजगार स्थिति कहलाती है।
खुली बेरोजगारी : खुली बेरोजगारी वह स्थिति है जिसमें श्रमिक काम करने के लिए तैयार होता है तथा उसमें काम करने की योग्यता भी होती है, परंतु उसे काम नहीं मिलता। इस प्रकार की बेरोजगारी खेतिहर मजदूरों में, शिक्षित व्यक्तियों में तथा उन लोगों में पाई जाती है जो गांव से शहरों में काम करने के लिए आते हैं, परंतु काम नहीं मिल पाने के कारण बेरोजगार पड़े रहते हैं।
मौसमी बेरोज़गारी:
यह एक प्रकार की बेरोज़गारी है, जो वर्ष के कुछ निश्चित मौसमों के दौरान देखी जाती है।कृषि कार्य में लगे बहुत से श्रमिक ऐसे होते हैं, जिन्हें पूरे वर्ष काम नहीं मिलता। इसका कारण यह है कि कृषि एक मौसमी व्यवसाय है। अर्थात कृषि में मौसम के अनुसार फसलें बोई और काटी जाती हैं। खाली मौसम में अक्सर कृषि में काम करने वाले कृषक और श्रमिक बेकार बैठे रहते हैं। जैसे फसल की कटाई के बाद और बुवाई से पहले। दूसरे शब्दों में भारत में बहुत कृषकों को वर्ष में कुछ समय ही काम मिल पाता है और शेष समय में वे बिल्कुल बेकार हो जाते हैं। इस प्रकार की बेरोजगारी को मौसमी बेरोजगारी कहा जाता है।
भारत में खेतिहर मज़दूरों के पास वर्ष भर काफी कम काम होता है।
संरचनात्मक बेरोज़गारी:
यह बाज़ार में उपलब्ध नौकरियों और श्रमिकों के कौशल के बीच असंतुलन होने से उत्पन्न बेरोज़गारी की एक श्रेणी है।संरचनात्मक बेरोजगारी वह स्थिति है जो देश की आर्थिक संरचना में परिवर्तन होने के कारण उत्पन्न होती है। विशेषकर (1) प्रौद्योगिकी में परिवर्तन (2) मांग के प्रतिमान में परिवर्तन से संबंधित।
भारत में बहुत से लोगों को आवश्यक कौशल की कमी के कारण नौकरी नहीं मिलती है और शिक्षा के खराब स्तर के कारण उन्हें प्रशिक्षित करना मुश्किल हो जाता है।
चक्रीय बेरोज़गारी:
यह व्यापार चक्र का परिणाम है, जहाँ मंदी के दौरान बेरोज़गारी बढ़ती है और आर्थिक विकास के साथ घटती है।इसका संबंध आर्थिक गतिविधियों में चक्रिय परिवर्तनों से है। मंदी की चक्रीय अवस्था के दौरान बेरोजगारी की अधिक मात्रा हो सकती है। यह बेरोजगारी व्यापार चक्र के उस चरण से उत्पन्न होती है, जब व्यापार क्षेत्र में मंदी की स्थिति होती है। मांग में कमी इसका मुख्य कारण है।
भारत में चक्रीय बेरोज़गारी के आँकड़े नगण्य हैं। यह एक ऐसी स्थिति है जो अधिकतर पूंजीवादी अर्थव्यवस्थाओं में पाई जाती है।
तकनीकी बेरोज़गारी:
यह प्रौद्योगिकी में बदलाव के कारण नौकरियों का नुकसान है।
वर्ष 2016 में विश्व बैंक के आँकड़ों ने भविष्यवाणी की थी कि भारत में ऑटोमेशन से खतरे में पड़ी नौकरियों का अनुपात साल-दर-साल 69% है। क्योकि नवीन प्रौद्योगिकी विकास के कारण परम्परा गत नोकरिया समाप्त हो जाएगी
घर्षण बेरोज़गारी:
घर्षण बेरोज़गारी का आशय ऐसी स्थिति से है, जब कोई व्यक्ति नई नौकरी की तलाश कर रहा होता है या नौकरियों के बीच स्विच कर रहा होता है, तो यह नौकरियों के बीच समय अंतराल को संदर्भित करती है।
दूसरे शब्दों में, एक कर्मचारी को एक नई नौकरी खोजने या एक नई नौकरी में स्थानांतरित करने के लिये समय की आवश्यकता होती है, यह अपरिहार्य समय की देरी घर्षण बेरोज़गारी का कारण बनती है।
इसे अक्सर स्वैच्छिक बेरोज़गारी के रूप में माना जाता है क्योंकि यह नौकरी की कमी के कारण नहीं होता है, बल्कि वास्तव में बेहतर अवसरों की तलाश में श्रमिक स्वयं अपनी नौकरी छोड़ देते हैं।
सुभेद्य रोज़गार:
इसका मतलब है कि लोग बिना उचित नौकरी अनुबंध के अनौपचारिक रूप से काम कर रहे हैं और इस प्रकार इनके लिये कोई कानूनी सुरक्षा नहीं है।
इन व्यक्तियों को 'बेरोज़गार' माना जाता है क्योंकि उनके कार्य का रिकॉर्ड कभी भी बनाया नहीं जाता हैं।
यह भारत में बेरोज़गारी के मुख्य प्रकारों में से एक है।
भारत में बेरोज़गारी का कारण:
सामाजिक कारक:
भारत में जाति व्यवस्था प्रचलित है कुछ क्षेत्रों में विशिष्ट जातियों के लिये कार्य निषिद्ध है।
बड़े व्यवसाय वाले बड़े संयुक्त परिवारों में बहुत से ऐसे व्यक्ति होंगे जो कोई काम नहीं करते हैं तथा परिवार की संयुक्त आय पर निर्भर रहते हैं।
जनसंख्या का तीव्र विकास:
भारत में जनसंख्या में निरंतर वृद्धि एक बड़ी समस्या बन गई है।भारत में जनसंख्या विधि की दर 2.1 प्रतिशत प्रतिवर्ष है। तीव्रगति से बढ़ती हुई जनसंख्या बेरोजगारी का सबसे बड़ा कारण है, उस अनुपात में रोजगार के अवसरों में वृद्धि नहीं होती है, अतः दिनों दिन बेरोजगारी एक विकराल रुप धारण करती जा रही है।
यह बेरोज़गारी के प्रमुख कारणों में से एक है।
कृषि का प्रभुत्व:
भारत में अभी भी लगभग आधा कार्यबल कृषि पर निर्भर है।
हालाँकि भारत में कृषि अविकसित है।
साथ ही यह मौसमी रोज़गार भी प्रदान करती है।
कुटीर और लघु उद्योगों का पतन:
औद्योगिक विकास का कुटीर और लघु उद्योगों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है।योजनाबद्ध आर्थिक विकास तथा बड़े-बड़े उद्योग की स्थापना से स्वचालित यांत्रिककृत मशीनों को बढ़ावा मिला है। इन उद्योगों मे श्रम गहन तकनीक का कम प्रयोग किया जाता है, तथा इन उद्योगों द्वारा अच्छी किस्म की वस्तुएं कम लागत पर उत्पन्न किया जाता है जिससे लघु एवं कुटीर उद्योग का लगातार कमी हो रहा है।
कुटीर उद्योगों का उत्पादन गिरने से कई कारीगर बेरोज़गार हो गए।
श्रम की गतिहीनता:
भारत में श्रम की गतिशीलता कम है। परिवार से लगाव के कारण लोग नौकरी के लिये दूर-दराज़ के इलाकों में नहीं जाते हैं।रूढ़िवादिता तथा पारिवारिक मोह के कारण भारतीय श्रमिकों में गतिशीलता का अभाव पाया जाता है, अगतिशीलता का दूसरा पहलू यह है कि श्रमिक भाषा, रीति रिवाज और संस्कृति में भिन्नता, घर से दूरी की बाधा के कारण अन्य जगहों पर कार्य करने के इच्छुक नहीं होते हैं, अतः पूर्ण रोजगार प्राप्त करने में यह भी एक बाधा है।
कम गतिशीलता के लिये भाषा, धर्म और जलवायु जैसे कारक भी ज़िम्मेदार हैं।
शिक्षा प्रणाली में दोष:
पूंजीवादी दुनिया में नौकरियाँ अत्यधिक विशिष्ट हो गई हैं लेकिन भारत की शिक्षा प्रणाली इन नौकरियों के लिये आवश्यक सही प्रशिक्षण और विशेषज्ञता प्रदान नहीं करती है।
इस प्रकार बहुत से लोग जो कार्य करने के इच्छुक हैं, वे कौशल की कमी के कारण बेरोज़गार हो जाते हैं।
सरकार द्वारा हल की पहल:
आजीविका और उद्यम हेतु सीमांत व्यक्तियों के लिये समर्थन (SMILE)
पीएम-दक्ष (प्रधानमंत्री दक्ष और कुशल संपूर्ण हितग्राही)
महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी अधिनियम (मनरेगा)
प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना (पीएमकेवीवाई)
स्टार्टअप इंडिया योजना.
UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्षों के प्रश्न
प्रश्न: प्रच्छन्न बेरोज़गारी का आमतौर पर अर्थ होता है-
(a) बड़ी संख्या में लोग बेरोज़गार रहते हैं
(b) वैकल्पिक रोज़गार उपलब्ध नहीं है
(c) श्रम की सीमांत उत्पादकता शून्य है
(d) श्रमिकों की उत्पादकता कम है
उत्तर:(d)
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