भारत मे स्वास्थ्य संबंधी समस्या
भारत के स्वास्थ्य सेवा क्षेत्र से संबद्ध प्रमुख समस्याएँ
अपर्याप्त चिकित्सा अवसंरचना: भारत में अस्पतालों की कमी है (विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्रों में) और कई मौजूदा स्वास्थ्य सुविधाओं में बुनियादी उपकरणों एवं संसाधनों की कमी है।
‘नेशनल हेल्थ प्रोफाइल’ के अनुसार, भारत में प्रति 1000 जनसंख्या पर केवल 0.9 बेड उपलब्ध हैं और इनमें से केवल 30% ही ग्रामीण क्षेत्रों में उपलब्ध हैं।
गुणवत्तापूर्ण देखभाल के मानकीकरण का अभाव: भारत में प्रदान की जाने वाली स्वास्थ्य देखभाल की गुणवत्ता में व्याप्त भिन्नता भी है (ग्रामीण क्षेत्रों में अपर्याप्त सुविधाएँ एवं संसाधन) और कमज़ोर विनियमन के कारण कुछ निजी स्वास्थ्य सुविधाओं में खराब देखभाल सेवा प्रदान की जाती है।
गैर-संचारी रोग: मधुमेह, कैंसर और हृदय रोग जैसी गंभीर बीमारियों की उच्च दर के साथ भारत में सभी मौतों में से 60% से अधिक के लिये गैर-संचारी रोग (Non-communicable diseases- NCDs) ज़िम्मेदार हैं।
इसके परिणामस्वरूप वहनीयता संबंधी चिंताएँ भी उत्पन्न होती हैं और गरीब लोग अधिक असुरक्षित होते हैं।
पर्याप्त मानसिक स्वास्थ्य देखभाल का अभाव: भारत में प्रति व्यक्ति मानसिक स्वास्थ्य देखभाल पेशेवरों की संख्या सबसे कम है।
मानसिक स्वास्थ्य पर सरकार का व्यय भी अत्यंत कम है। इसके परिणामस्वरूप खराब मानसिक स्वास्थ्य परिणाम और मानसिक बीमारी से पीड़ित लोगों की अपर्याप्त देखभाल की स्थिति बनी है।
चिकित्सक-रोगी अनुपात में अंतराल: सबसे गंभीर चिंताओं में से एक है चिकित्सक-रोगी अनुपात में अंतराल। ‘इंडियन जर्नल ऑफ पब्लिक हेल्थ’ के अनुसार भारत को वर्ष 2030 तक 20 लाख चिकित्सकों की आवश्यकता होगी।वर्तमान में सरकारी अस्पतालों में 11000 से अधिक रोगियों पर एक चिकित्सक की सेवा उपलब्ध है जो 1:1000 की WHO की अनुशंसा से पर्याप्त कम है।
ग्रामीण जनसंख्या की उपेक्षा: भारत की स्वास्थ्य सेवा की एक गंभीर कमी ग्रामीण जनता की उपेक्षा है। यह काफी हद तक शहरी अस्पतालों पर आधारित एक सेवा है। हालांकि, बड़ी संख्या में हैं। पीएचसी और ग्रामीण अस्पतालों की संख्या अभी भी कमी दिखाई दे रही है। स्वास्थ्य सूचना के अनुसार 31.5% अस्पताल और 16% अस्पताल बिस्तर ग्रामीण क्षेत्रों में स्थित हैं जहाँ कुल आबादी का 75% निवास करता है। इसके अलावा डॉक्टर ग्रामीण क्षेत्रों में सेवा देने को तैयार नहीं हैं।
स्वास्थ्य के लिए अपर्याप्त व्यय: राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति 2002 के अनुसार, सरकार का स्वास्थ्य क्षेत्र में योगदान सकल घरेलू उत्पाद का केवल 0.9 प्रतिशत है। यह काफी नाकाफी है। भारत में, स्वास्थ्य पर सार्वजनिक व्यय कुल स्वास्थ्य व्यय का 17.3% है जबकि चीन में यह 24.9% है और श्रीलंका और संयुक्त राज्य अमेरिका में यह क्रमशः 45.4 और 44.1 है।
समस्याओं को दूर करने के उपाय
वर्तमान में सरकारी अस्पतालों में 11000 से अधिक रोगियों पर एक चिकित्सक की सेवा उपलब्ध है जो 1:1000 की WHO की अनुशंसा से पर्याप्त कम है।
आधारभूत संरचना और मानव संसाधन में सुधार लाना: नई स्वास्थ्य सुविधाओं के निर्माण और मौजूदा सुविधाओं के उन्नयन के साथ-साथ चिकित्सा अनुसंधान एवं स्वास्थ्य सेवाओं के लिये वित्तपोषण (जो वर्तमान में सकल घरेलू उत्पाद का 2.1% है) में वृद्धि की आवश्यकता है।
इसके साथ ही स्वास्थ्यकर्मियों की संख्या बढ़ाने की आवश्यकता है। इसके अंतर्गत मेडिकल स्कूलों और प्रशिक्षण कार्यक्रमों की संख्या में वृद्धि करना शामिल है, साथ ही स्वास्थ्य पेशेवरों को सेवा की कमी वाले क्षेत्रों में कार्य करने हेतु प्रोत्साहित करने के लिये वित्तीय प्रोत्साहन की पेशकश करना भी शामिल है।
गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवा तक पहुँच: निर्धनों, अनुसूचित जाति के सदस्यों और विशेष रूप से महिलाओं के लिये स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुँच बढ़ाने के साथ-साथ इन समुदायों को स्वास्थ्य सेवा के बारे में शिक्षा एवं जानकारी प्रदान करने के लिये लक्षित कार्यक्रमों को समयबद्ध रूप से लागू करने की आवश्यकता है।
इसके साथ ही, विनियमनों को प्रवर्तित करने, गुणवत्ता नियंत्रण उपायों को लागू करने, पारदर्शिता बढ़ाने और स्वास्थ्य देखभाल कार्यक्रमों की लेखापरीक्षा करने की भी आवश्यकता है।
मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार: इसमें मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं के लिये वित्तपोषण में वृद्धि, मानसिक स्वास्थ्य के मुद्दों को बेहतर ढंग से संबोधित करने के लिये स्वास्थ्य कर्मियों को प्रशिक्षित करना और मानसिक रोगों से जुड़े सामाजिक कलंक को समाप्त करना शामिल है।
स्वास्थ्य असमानताओं के मूल कारणों को संबोधित करना: स्वास्थ्य देखभाल प्रणाली को स्वास्थ्य के सामाजिक निर्धारकों को संबोधित करने और समग्र स्वास्थ्य असमानताओं को कम करने के लिये शिक्षा, आवास एवं स्वच्छता जैसे अन्य क्षेत्रों के साथ समन्वय में काम करना चाहिये।
सतत् स्वास्थ्य प्रशासन: इसमें बेहतर प्रबंधन प्रणाली को लागू करना, स्वास्थ्य देखभाल नियामक निकायों को सुदृढ़ करना और अधिक प्रभावी एवं कुशल स्वास्थ्य सेवा सुनिश्चित करने के लिये स्वतंत्र निरीक्षण तंत्र स्थापित करना शामिल हो सकता है।
हाल ही में AIIMS दिल्ली पर हुए रैंसमवेयर हमले जैसे साइबर हमले से महत्त्वपूर्ण चिकित्सा अवसंरचना एवं डेटा की सुरक्षा के लिये उपयुक्त साइबर सुरक्षा उपाय भी किये जाने चाहिये।
कर कटौती: अतिरिक्त कर कटौती के साथ अनुसंधान एवं विकास को प्रोत्साहित करना आवश्यक है ताकि नई दवा के विकास में अधिक निवेश का समर्थन किया जा सके; साथ ही, जीवन रक्षक एवं आवश्यक दवाओं पर वस्तु एवं सेवा कर (GST) को कम किया जाना चाहिये।
‘वन हेल्थ’ दृष्टिकोण की ओर आगे बढ़ना: इस बात को चिह्नित किये जाने की आवश्यकता है कि मानव स्वास्थ्य पशु स्वास्थ्य और हमारे साझा पर्यावरण से निकटता से संबद्ध है और इसलिये समय की आवश्यकता है कि स्वस्थ वातावरण, स्वस्थ पशु और स्वस्थ मानव—सबको दायरे में लेती सामूहिक स्वास्थ्य पहलों की ओर आगे बढ़ा जाए।
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