संपोषित विकास

सम्पोषित विकास
क्या है संपोषित विकास?
आधुनिक विकास गतिविधियों ने संसाधनों के साथ-साथ पर्यावरण को भी बुरी तरह से प्रभावित किया है। घटते प्राकृतिक संसाधन एवं बढ़ते पर्यावरण प्रदूषण के कारण संपोषित विकास (Sustainable development) की धारणा का जन्म हुआ है। संपोषित विकास को निर्वहनीय विकास, सतत विकास एवं धारणीय विकास के नामों से भी जाना जाता है। विकास की इस नई धारणा का उद्भव वर्ष 1992 में ब्राजील की राजधानी रियो-डी-जेनेरियों में आयोजित पृथ्वी सम्मेलन में हुआ। इस सम्मेलन मे संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण एवं विकास सम्मेलन के लिए अनेक दस्तावेज तैयार किए गये, जिन्होंने स्पष्ट किया कि पर्यावरण एवं विकास के बीच गहरा सम्बन्ध है।

आधुनिक मनुष्य के लालची स्वभाव के चलते प्राकृतिक संसाधनों जैसे, जल, खनिज पदार्थ, जीवाश्म ईंधन, वन, मृदा आदि का अत्यन्त ही शोषण हुआ है परिणामस्वरूप आज जल की समस्या, जीवाश्म ईधनों के घटते भण्डार, मृदा की उपजाऊ क्षमता का ह्रास, वैश्विक तपन, जैव-विविधता का क्षरण आदि ने वैश्विक स्तर पर विकराल समस्या का रूप धारण कर लिया है, जिससे निजात पाना समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है और यह संपोषित विकास के द्वारा ही संभव है।

संपोषित विकास वह विकास है जो वर्तमान पीढ़ी की आवश्यकताओं की पूर्ति के साथ भावी पीढ़ी की आवश्यकताओं की पूर्ति भी सुनिश्चित करता है। संपोषित विकास के अन्तर्गत संसाधनों।इसके अतिरिक्त विकास की प्रक्रिया इस प्रकार की होती है, जिससे पर्यावरण अव्यवस्थित न हो और उसके संरक्षण को बढ़ावा मिले।

कैसे हो संपोषित विकास के लक्ष्य की प्राप्ति?
विश्वभर में विभिन्न क्षेत्रों में विकास हो रहा है। फलस्वरूप लोगों का जीवन स्तर सुधर रहा है। मगर विकास की इस अंधी दौड़ के कारण पर्यावरण एवं प्राकृतिक संसाधन प्रभावित हो रहे हैं। अतः आज ऐसे विकास की आवश्यकता है जो पर्यावरण हितैषी होने के साथ-साथ प्राकृतिक संसाधनों को संरक्षण में मददगार साबित हो सके। संपोषित विकास के लक्ष्य प्राप्ति हेतु निम्नलिखित कदमों को अपनाये जाने की नितांत आवश्यकता है।
वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों का उपयोग: संपोषित विकास की धारणा के तहत वैकल्पिक ऊर्जा स्रोत अथवा गैर पारम्परिक ऊर्जा स्रोत जैसे सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा, ज्वारीय ऊर्जा, भूतापीय ऊर्जा आदि के इस्तेमाल पर जोर दिये जाने की आवश्यकता है ताकि हम कोयला एवं तेल जैसे जीवाश्म ईधनों की बचत कर सकें। जैसा कि हम जानते हैं कि जीवाश्म ईधनों के सीमित भण्डार हैं और इनके अत्यधिक उपयोग के कारण पर्यावरण प्रदूषण का भी खतरा दिनोंदिन बढ़ता जा रहा है। ‘‘वैश्विक तपन’’ एवं ‘‘अम्ल वर्षा’’ जीवाश्म ईधनों के अत्यधिक उपयोग के ही परिणाम हैं। आज दुनिया के ज्यादातर विकसित औद्योगिक राष्ट्र, ‘अम्ल वर्षा’ की चपेट में हैं। नार्वे, स्वीडेन, ब्रिटेन, जापान, कनाडा, चेकोस्लोवाकिया आदि देश इसके प्रमुख उदाहरण हैं।
जीवांश कृषि को बढ़ावा: रासायनिक उर्वरकों एवं कीटनाशकों पर आधारित आधुनिक कृषि प्रणाली ने मृदा जैसे प्राकृतिक संसाधन को सबसे ज्यादा प्रभावित किया है। रासायनिक उर्वरकों के अधिक उपयोग से मृदा संरचना नष्ट हो जाती है, जबकि कीटनाशक मृदा की उर्वरा शक्ति बढ़ाने वाले सूक्ष्मजीवों की गतिविधियों को प्रभावित करते हैं जिससे मृदा की उपजाऊ क्षमता पर विपरीत प्रभाव पड़ता है। संपोषित विकास के अन्तर्गत मृदा संरक्षण के लिए आज जीवांश कृषि (Organic agriculture) पर विशेष जोर दिये जाने की नितान्त आवश्यकता है जिसमें रासायनिक खादों एवं कीटनाशकों का प्रयोग पूर्णतः वर्जित होता है। इस प्रकार की कृषि से मृदा संरक्षण को बढ़ावा मिलता है साथ ही उसकी उर्वरा शक्ति भी बनी रहती है। इसके अतिरिक्त, पर्यावरण के स्वास्थ्य पर भी कोई विपरीत प्रभाव नहीं पड़ता है।

जल संरक्षण: भूमिगत जल के अन्धाधुन्ध दोहन के फलस्वरूप वैश्विक स्तर पर जल की समस्या ने विकराल रूप धारण कर लिया है। अगर वर्तमान स्थिति बरकरार रही तो अगला विश्वयुद्ध जल के लिए ही होगा। जल की बढ़ती समस्या से निपटने के लिए वर्षा जल संचय के साथ-साथ जल के संरक्षण तथा सीमित उपयोग पर विशेष जोर दिये जाने की आवश्यकता है। इसके अतिरिक्त खाली भूमि को वनस्पतियों से आच्छादित करने की भी आवश्यकता है क्योंकि वनस्पतियां वर्षा जल के बहाव को रोककर भूमिगत रिसाव को बढ़ावा देती हैं परिणामस्वरूप भूमिगत जल स्तर बना रहता है। इसके अतिरिक्त भूमिगत जलस्तर के स्थायित्व के लिए नमभूमियों (Wetlands) का पुनरुत्थान एवं संरक्षण आज समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है। शुष्क एवं अर्द्ध-शुष्क क्षेत्रों में टपक सिंचाई विधि को अपनाकर जल का संरक्षण किया जा सकता है।

वन संरक्षण एवं वनरोपण: वन अत्यन्त ही महत्वपूर्ण संसाधन हैं। वनों की अंधाधुन्ध कटाई के कारण न सिर्फ जैव-विविधता का क्षय होता है अपितु मृदा अपरदन Soil Erosion, बाढ़ Flood, सूखा, भूमिगत जल स्तर में गिरावट आदि जैसी तमाम समस्याओं को भी बढ़ावा मिलता है। वन कार्बन डाईआक्साइड के मुख्य शोषक और जीवनदायिनी गैस आक्सीजन के प्रमुख स्रोत होते हैं। अतः वन पर्यावरण संरक्षण में सहायक होते हैं। वन विनाश के कारण आज पृथ्वी का तापमान बढ़ रहा है जिससे वैश्विक जलवायु परिवर्तन का खतरा भी बढ़ रहा है।

संपोषित विकास की धारणा के तहत वन संसाधन के सीमित उपयोग के साथ-साथ वनरोपण पर जोर दिये जाने की आवश्यकता है ताकि वन आवरण में वृद्धि हो सके और जलवायु परिवर्तन के खतरे से बचा जा सके।
वन्य जीव संरक्षण: आधुनिक विकास गतिविधियों जैसे-बांधों, खदानों, सड़कों, उद्योगों और पर्यटन विकास के कारण बहुत से जीवों के प्राकृतिक आवास नष्ट हो गये हैं जिसके कारण वनस्पतियों एवं जन्तुओं की बहुत सी प्रजातियां आज विलुप्ति के कगार पर पहुंच गयी हैं। इसके अतिरिक्त कुछ वनस्पतियों एवं जन्तुओं की प्रजातियों के अत्यधिक दोहन ने भी उन्हें संकटग्रस्त श्रेणी में पहुँचा दिया है। संपोषित विकास की धारणा के तहत आज इन प्रजातियों के संरक्षण एवं विस्तार को बढ़ावा दिये जाने की आवश्यकता है ताकि पारिस्थितिक संतुलन बना रहे और भावी पीढ़ियां वनस्पतियों एवं जन्तुओं की विभिन्नप्रजातियों से लाभान्वित हो सकें।

निष्कर्ष:
बढ़ता पर्यावरण प्रदूषण एवं घटते संसाधन आज वैश्विक स्तर पर गम्भीर चिन्ता का विषय है। अतः इन समस्याओं से निजात के लिए संपोषित विकास को अपनाना आज समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है ताकि हम आने वाली पीढ़ियों के लिए संसाधनों के साथ-साथ स्वस्थ एवं प्रदूषण रहित पर्यावरण भी प्रदान कर सकें।

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