लैंगिक बजट

लैंगिक बजट
लैंगिक बजटीकरण क्या है?
लैंगिक बजटीकरण का सम्बन्ध लिंग-संवेदी विधि निर्माण, योजनाओं और कार्यक्रमों, संसाधनों के आवंटन, कार्यान्वयन और निष्पादन, योजनाओं और कार्यक्रमों के लेखा परीक्षण और प्रभाव मूल्यांकन तथा लैंगिक असमानताओं को कम करने के लिये आगे की सुधारात्मक कार्यवाही से है।
लैंगिक समानता को मुख्यधारा में लाने के लिये एक शक्तिशाली साधन है ताकि विकास के लाभ को महिलाओं तक भी उतने अनुपात में पहुँचाया जाना सुनिश्चित किया जा सके जितना पुरुषों के लिये पहुँचता है।
इसके लिये अलग से बजट बनाने की आवश्यकता नहीं है बल्कि महिलाओं की विशेष जरूरतों का ध्यान रखते हुए सकारात्मक कार्यवाही की अपेक्षा करता है, व्यय और सामुदायिक सेवाओं को लैंगिक दृष्टिकोण से निरीक्षित करता है।
सरकारी बजट के विच्छेदन को आवश्यक बनाकर उसके लिंग विशेषक प्रभावों को स्थापित करना और यह सुनिश्चित करना कि लैंगिक स्वीकार्यताओं को बजट स्वीकार्यताओं में तब्दील किया जा सके।
जेण्डर बजटिंग व समानता के लिए प्रयास:

विश्वस्तर पर महिलाओं की स्थिति सुधारने और जेण्डर समानता को सुनिश्चित करने के लिए अनेक पहल किये गये। महिलाओं के प्रति विभेदों को समाप्त करने के लिए 18 दिसम्बर 1979 को संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा अपनाया गया। संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा 1946 में गठित महिलाओं की स्थिति पर आयोग के तीस वर्ष से अधिक अवधि के अथक प्रयासों का प्रतिफल है। इस आयोग का उद्देश्य यह था कि विश्व की आधी आबादी, यानी महिलाओं को, उनके बुनियादी मानवाधिकार, गरिमा एवं मान, पुरूषों के समान ही बराबरी से दिलाया जा सके। प्रयोगिकतौर पर सर्वप्रथम इसकी शुरूआत अस्ट्रेलिया में मानी जाती है, जहां पर 1980 के दशक में पहली बार इसका प्रयोग किया गया। ब्रिटेन में 1989 में महिलाओं के हित में बजट को लेकर एक स्वतंत्र समूह का गठन किया गया जिसमें मजदूर संगठनों व नगर समाज के प्रतिनिधि एवं बौद्धिक वर्ग के सदस्य होते थे और उसका ब्रिटिश सरकार के साथ 1997 में बनी लेबर दल ने सरकार के साथ निरन्तर संपर्क रहता था। वर्तमान में दुनिया में
करीब 70 देश ऐसे है जहां पर जेण्डर बजट के प्रयोग हो रहे है। भारत में पहले वंचित वर्गों की तरह महिलाओं के कल्याण की दृष्टि से ही बजट का प्राव्धान होते थे। 1990 में नई आर्थिक नीति की पृष्ठभूमि और भारतीय समाज के विभिन्न वर्गों में अपने हितों के अनुकूल बजट देखने की दृष्टि लगभग एक साथ विकसित हुई और कल्याण का स्थान सशक्तिकरण ने ले लिया। 7वीं पंचवार्षिक योजना में केवल एक विभाग महिला व बाल विकास विभाग के तहत इसको लेकर प्रयास शुरू हुए।1990 में संसद के द्वारा पारित एक कानून के माध्यम से राष्ट्रीय महिला आयोग का गठन किया गया है। 9वीं पंचवार्षिाक योजना में इस पर विशेष जोर देते हुए 30 प्रतिषत राशि या बजट के लाभ को महिलाओं को देने की योजना पर काम किया गया। 10 वीं योजना में बजट दस्तावेजों में महिलाओं के विकास के लिए वित्तीय प्रावधान करके जेण्डर बजट को बढ़ावा दिया गया है। इस तरह भारत औपचारिक तौर पर 1997-98 के बजट में इसको प्रस्तुत किया गया। 2001 में महिला सशक्तिकरण वर्ष की घोषणा की गई।

लैंगिक बजट के लिये पाँच-चरणीय फ्रेमवर्क
चरण 1: किसी क्षेत्र विशेष में महिलाओं और पुरुषों तथा लड़कियों और लड़कों (और विभिन्न उपवर्गों) के लिये स्थिति का आकलन।
चरण 2: क्षेत्र विशेष की नीतियाँ लैंगिक मुद्दों और पहले चरण में उल्लिखित भेदभाव को किस हद तक संबोधित करती हैं।
चरण 3: चरण 2 में पहचानी गईं लिंग-संवेदी नीतियों और कार्यक्रमों के क्रियान्वयन के लिये बजट आवंटनों की पर्याप्तता का आकलन।
चरण 4: इसका निरीक्षण कि धन नियोजित तरीके से ही व्यय हुआ या नहीं, और कौन-से लाभ किस तक पहुँचे।
चरण 5: नीति/कार्यक्रम/योजना के प्रभाव का आकलन और इसकी विवेचना कि चरण 1 में विवरित की गई स्थिति में किस हद तक बदलाव हुआ।
भारत में लैंगिक बजटीकरण
लैंगिक बजट अभिव्यक्ति (GBS) को पहली बार 2005-06 के भारतीय बजट में प्रस्तावित किया गया था। इस लैंगिक बजट अभिव्यक्ति के दो हिस्से हैं-
भाग ‘अ’ में नारी-विशेष योजनाएँ हैं, अर्थात् वे योजनाएँ जिनमें महिलाओं के लिये 100 प्रतिशत राशि आवंटित की गई हो,
भाग ‘ब’ में महिलाओं के लाभ की योजनाएँ हैं, अर्थात् वे योजनाएँ जिनमें कम-से-कम 30 प्रतिशत आवंटन महिलाओं के लिये हो।
भारत के लैंगिक बजट लैंगिक बजट के प्रयास विश्व स्तर पर अलग हटकर दिखते हैं क्योंकि उन्होंने न सिर्फ व्यय को बल्कि राजस्व नीतियों को भी प्रभावित किया है
जैसे पुरुषों और महिलाओं के लिये संपत्ति कर की अलग-अलग दरें और आयकर संरचना पर पुनर्विचार) और लैंगिक बजट राज्य सरकारों के स्तर तक पहुँच गए हैं।
भारत में लैंगिक बजट के प्रयास चार आनुक्रमिक प्रावस्थाओं से मिलकर बने हैं: (A) ज्ञानार्जन और नेटवर्क निर्माण, (B) प्रक्रिया को संस्थागत बनाना, (C) क्षमता-सर्जन और (D) जवाबदेही को बढ़ाना।
भारत में लैंगिक बजट महज लेखा-जोखा क्रियाकलाप तक सीमित नहीं है। लैंगिक बजटीकरण फ्रेमवर्क ने लिंग-निरपेक्ष मंत्रालयों को महिलाओं के लिये नए कार्यक्रम चलाने में मदद की है।
सभी मंत्रालयों में एक संस्थागत क्रियाविधि के रूप में लैंगिक बजटीकरण प्रकोष्ठ की अवस्थापना अनिवार्य कर दी गई है।
लैंगिक बजटीकरण प्रकोष्ठ के कार्यों में लिंग आधारित प्रभाव आकलन, लाभार्थी की आवश्यकताओं का आकलन और लाभार्थी व्यापकता आकलन हैं जिनका उद्देश्य सरकारी व्यय को पुनः प्राथमिकता देने के अवसर की पहचान करना और क्रियान्वयन में सुधार करना है।
कमियाँ
न सिर्फ केंद्रीय बजट के कुल व्यय में लैंगिक बजट का आनुपातिक हिस्सा कम हुआ है, बल्कि लैंगिक समानता और महिला सशक्तीकरण को प्रोत्साहित करने वाली योजनाओं के लिये बजटीय आवंटन में भी गिरावट आई है। ‘बड़े बजट’ की बहुत कम ऐसी योजनाएँ हैं जो महिला एवं बाल विकास मंत्रालय (MWCD) द्वारा विशेष तौर पर महिलाओं के लिये चलाई जा रही हों, जैसे ‘निर्भया कोष’ और ‘बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ’ अभियान।
लैंगिक बजटीकरण प्रकोष्ठों द्वारा चिह्नित किये गए हस्तक्षेपों को लागू करने के लिये जरूरी समर्पित मानव संसाधनों की कमी।
लैंगिक उत्तरदायी बजटीकरण (GRB) कार्य में निरीक्षण सबसे कमजोर कड़ी के रूप में अब भी बरकरार है क्योंकि राष्ट्रीय स्तर पर निरीक्षण करने के लिये कोई निर्दिष्ट क्रियाविधि मौजूद नहीं है।

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