सार्वजनिक आय के स्रोत

source of public revenue सार्वजनिक आय के स्रोत
लोक / सार्वजनिक आगम : स्त्रोत एवं वर्गीकरण
[Public Revenue : Sources and Classification)
“आय और पूँजी पर निर्धारित करों के अन्तर को प्रायः बिल्कुल अलग अन्तर के साथ उलझाया जाता है। जो कि क्रमशः आय और पूँजी में से दिए गए करों में होता है, परन्तु पूँजी पर निर्धारित कर आय में से दिया जा सकता है तथा विलोमशः भी। एक व्यक्ति जिसे मृत्यु शुल्क देना है, वह उसे आय में से दे सकता हैं। इस प्रकार व्यक्ति आय कर देने के लिए प्रतिभूतियाँ बेच सकता है अथवा बैंक से उधार लेकर कर दे सकता है।                         -डाल्टन

जिस प्रकार उत्पादन अर्थशास्त्र का महत्त्वपूर्ण भाग है उसी प्रकार सार्वजनिक आय का लोकवित्त में महत्त्वपूर्ण स्थान है। जिस प्रकार किसी भी व्यक्ति या संस्था को अपना कार्य करने के लिए धन की आवश्यकता होती है उसी प्रकार सरकार को भी अपनी आर्थिक क्रियाओं के क्रियान्वयन हेतु वित्त की आवश्यकता होती है। वर्तमान सरकार के कल्याणकारी कार्यों के लिए सरकार को अधिक धन की आवश्यकता होती है, इस कारण सार्वजनिक आय के विभिन्न नए स्रोतों की आवश्यकता को बल मिला है। वर्तमान काल में सार्वजनिक आय केवल सार्वजनिक व्ययों की पूर्तियों का साधन ही नहीं है, बल्कि अधिक जन कल्याण, आर्थिक विकास, आर्थिक स्थायित्व तथा रोजगार स्तर में वृद्धि जैसे महत्त्वपूर्ण लक्ष्यों की प्राप्ति का एक साधन भी है।

सार्वजनिक आय का महत्त्व बढ़ने का एक और महत्त्वपूर्ण कारण है। सरकार कितनी मात्रा में आय प्राप्त करती है और यह आय किस प्रकार प्राप्त की जाती है, इसका देश के उत्पादन, वितरण, आर्थिक क्रियाओं एवं रोजगार के स्तर पर महत्त्वपूर्ण प्रभाव पड़ता है।
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सार्वजनिक आय का अर्थ (Meaning of Public Revenue)-सार्वजनिक आय का प्रयोग संकुचित एवं विस्तृत दो अर्थों में किया जाता है। संकुचित अर्थ में सार्वजनिक आय के अन्तर्गत सरकार की वास्तविक आय को शामिल किया जाता है, जबकि व्यापक अर्थ में इसके अन्तर्गत सभी प्रकार की सरकारी प्राप्तियों को शामिल किया जाता है।

डॉल्टन के अनुसार, “सार्वजनिक आय को संकुचित एवं व्यापक अर्थों में प्रयुक्त किया जाता है। व्यापक अर्थ में समस्त प्रकार की आय तथा प्राप्तियों को सम्मिलित किया जाता है जिसे प्रायः आगम के नाम से जानते हैं। संकुचित अर्थ में केवल वे प्राप्तियाँ शामिल की जाती हैं जो आय के नाम से जानी जातउपर्युक्त विवेचन के आधार पर कहा जा सकता है कि सार्वजनिक आय से आशय उस आय से है। जिससे सरकार की सम्पत्ति में वृद्धि बिना दायित्व में वृद्धि किए ही हो जाती है अर्थात्जिन्हें सरकार को भविष्य में लौटाना नहीं पड़ता।

सार्वजनिक आय के स्रोत (Sources of Public Revenue)-सरकार को प्राप्त होने वाली आय को सार्वजनिक आय कहा जाता है। सार्वजनिक आय के स्रोतों को मुख्यतः दो भागों में बाँटा जा सकता है जो निम्न प्रकार हैं

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सार्वजनिक आय के स्रोत

(ब) गैर कर आय                                       (अ) कर आय

(1) वाणिज्यिक आय          (ii) प्रशासनिक              (iii) उपहार तथा अनुदान

(1) फीस या शुल्क

(II) लाइसेन्स शुल्क

(III) विशेष कर निर्धारण

(IV) जमानत या सम्पत्ति जब्त करना

(V) मृतक की सम्पत्ति पर कब्जा

(अ) कर आय (Tax Revenue)-कर राज्य की आय का मुख्य साधन है जो राज्य को अनिवार्य रूप से भुगतान किया जाता है। कर को विभिन्न अर्थशास्त्रियों ने निम्न प्रकार परिभाषित किया है :

टेलर के अनुसार, “कर सरकार को दिया गया अनिवार्य भुगतान है जो कि करदाता द्वारा बिना प्रत्यक्ष लाभ प्राप्ति की आशा के दिए जाते हैं।“

प्रो० ब्यूहलर के अनुसार, “यह एक अनिवार्य अंशदान है, यद्यपि इसे इच्छापूर्वक भी भुगतान किया जा सकता है, लेकिन यह कानूनी अपराधों का दण्डस्वरूप नहीं है।“
सेलिगमैन के अनुसार, “कर जनता द्वारा सरकार को किया गया एक अनिवार्य अंशदान है जो सामान्य जनता के हित पर व्यय करने हेतु लगाया जाता है और किसी को विशेष लाभ प्रदान नहीं किए जाते हैं।“

डाल्टन के अनुसार, “कर सार्वजनिक सत्ता द्वारा लगाया गया एक अनिवार्य अंशदान है, चाहे उसके बदले में करदाता को उतनी सेवाएँ प्रदान की जाएँ या नहीं और इसे किसी कानूनी सजा के रूप में नहीं लगाया जाता।“

उपरोक्त परिभाषाओं से स्पष्ट है कि, “कर एक ऐसा अनिवार्य भुगतान है जो जनता के हितों पर होने वाले व्यय की पूर्ति के लिए लिया जाता है और जिसके बदले करदाता को प्रत्यक्ष रूप से कोई वस्तु अथवा सेवा नहीं मिलती है।”

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कर की मुख्य विशेषताएँ (Main Characteristics of Tax)-कर की विभिन्न परिभाषाओं के आधार पर कर की मुख्य विशेषताएँ निम्न प्रकार हैं

(i) अनिवार्य अंशदान (Compulsory Contribution)-कर एक अनिवार्य भुगतान माना जाता है। कर का भुगतान न करने पर व्यक्ति को सजा दी जा सकती है भले ही किसी भी व्यक्ति को इससे प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से कोई लाभ प्राप्त हो या न हो।

(ii) करों से प्राप्त आय सबके हित में व्यय की जाती है-देश का प्रत्येक नागरिक कई प्रकार से सरकार पर निर्भर रहता है और बिना सरकार की सहायता के उसे कई प्रकार की मुश्किलों का सामना करना पड़ता है। सरकार का उद्देश्य समाज कल्याण में वृद्धि करना है। सार्वजनिक कल्याण में वृद्धि करने के उद्देश्य से सरकार धनी वर्ग से आय प्राप्त करके उसे निर्धन वर्ग पर व्यय करती है।
(iii) कर के बदले विशेष लाभ प्राप्त नहीं होता-कर का सरकारी व्यय से प्राप्त लाभ से कोई प्रत्यक्ष सम्बन्ध नहीं होता। कर देने वाला व्यक्ति सरकार से उसी अनुपात में कोई लाभ प्राप्त करने का अधिकारी नहीं है। प्रो० टॉजिंग के अनुसार, “अन्य स्रोतोंकी तुलना में कर का सार यही है कि सार्वजनिक अधिकार एवं करदाता के मध्य कोई प्रत्यक्ष जैसे को तैसा व्यवहार का अभाव पाया जाता हैं ।

(ब) गैर-कर आय स्रोत (Non-tax Revenue)-आय के ऐसे भी स्रोत हैं जो कर की श्रेणी में नहीं आते, उन्हें गैर-कर राजस्व कहते हैं। इन्हें मुख्यतः तीन भागों में रखा जा सकता है

(1) वाणिज्यिक आय (Commercial Revenue)-शान्ति, सुरक्षा एवं व्यवस्था के अतिरिक्त आजकल राज्य अनेक तरह के व्यापारिक एवं औद्योगिक कार्य भी करता है। जैसे-परिवहन, विद्युत, जल, डाक आदि जनोपयोगी सेवाएँ प्रदान करना, विभिन्न प्रकार के उद्योगों का संचालन करना और इनसे उत्पादित वस्तुओं को बेचना। इन क्रियाओं से कीमतों के रूप में सरकार को कुछ आय प्राप्त होती है। यह कीमत ही वाणिज्यिक आय कहलाती है। वर्तमान में यह आय का मुख्य स्रोत बनता जा रहा है। प्रो० टेलर के अनुसार, “वाणिज्यिक आय वे आमदनियाँ हैं जो कि सरकार को अपने द्वारा उत्पादित वस्तुओं एवं सेवाओं की कीमत के रूप में प्राप्त होती हैं।” इस प्रकार के साधनों में जैसे को तैसा (quid pro quo) का सम्बन्ध रहता है।

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वाणिज्यिक आय की दो प्रमुख विशेषताएँ हैं

(I) भुगतान की राशि और उसके बदले में प्राप्त वस्तु की लागत या लाभ के मध्य एक निश्चित सम्बन्ध होता है।

(II) कीमत का भुगतान करने वाले व्यक्ति को उस कीमत के बदले प्रत्यक्ष रूप से कोई वस्तु या सेवा प्राप्त होती है।

(ii) प्रशासनिक आय (Administrative Revenue)-सरकार के प्रशासनिक कार्यों के कारण उत्पन्न आय को प्रशासनिक आय कहा जाता है। इसके अन्तर्गत शुल्क या फीस, लाइसेन्स फीस, जुर्माने, सम्पत्ति जब्त करने और उत्तराधिकारी के अभाव में सम्पत्ति पर अधिकार करने आदि से होने वाली प्राप्तियाँ तथा विशेष कर निर्धारण आदि आते हैं। इस आय का मुख्य वर्गीकरण निम्नलिखित है

(1) फीस या शुल्क (Fees)-शुल्क या फीस एक ऐसी अदायगी है जो कि उन प्रशासनिक सेवाओं की लागत को पूरा करने के लिए सरकार को दी जाती है जो सरकार द्वारा सम्पूर्ण जनता के हितों के लिये सम्पन्न की जाती है, किन्तु जो व्यक्तियों को विशेष लाभ प्रदान करती है।

प्रो० सैलिगमैन के अनुसार, “फीस वह भुगतान है जो कि प्रारम्भिक रूप में सार्वजनिक हित में, लेकिन फीस देने वाले व्यक्ति को विशेष लाभ प्रदान करते हुए, सरकार द्वारा प्रदान की गयी बार-बार उत्पन्न होने वाली प्रत्येक सेवा की लागत को पूर्ण करने हेतु दिया जाता है।“

प्रो० मेहता व अग्रवाल के अनुसार, “शुल्क एक कर है जो कि राज्य द्वारा उत्पादित सेवाओं एवं वस्तुओं के उपभोग को नियन्त्रित एवं हतोत्साहित करने के लिए लिया जाता है।” फीस में जैसे को तैसा का सम्बन्ध होता है। यह निजी व्यक्तियों द्वारा स्वेच्छापूर्वक दी जाती है।

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फीस की विशेषताएँ-फीस की प्रमुख विशेषताएँ निम्न हैं

(i) जैसे को तैसा सम्बन्ध-शुल्क में जैसे को तैसा सम्बन्ध होता है, क्योंकि इसका भुगतान प्राप्त सेवा के बदले में किया जाता है।

(ii) प्रशासनिक नियन्त्रण-शुल्क के बदले में दी जाने वाली सेवाएँ कभी-कभी प्रशासनिक नियन्त्रण हेतु भी की जाती हैं।

(iii) विशिष्ट लाभ-शुल्क दाता को सदैव विशेष लाभ प्राप्त होता है, लेकिन साथ ही साथ सार्वजनिक लाभ के उद्देश्य की भी पूर्ति की जाती है।

कर तथा फीस की तुलना (Comparison between Tax and Fees) कर तथा शुल्क में कुछ समानताएँ तथा कुछ असमानताएँ होती हैं।

(1) समानताएँ-कर तथा शुल्क में निम्न समानताएँ होती हैं

(i) कर और शुल्क सार्वजनिक लाभ केउद्देश्य से लगाए जाते हैं।

(ii) कर तथा शुल्क दोनों ही अनिवार्य प्रकृति के हैं।

(iii) शुल्क तथा कर दोनों का प्राप्त किए जाने वाले लाभ से कोई आनुपातिक सम्बन्ध नहीं होता।

(II) असमानताएँ-कर तथा शुल्क में निम्न असमानताएँ होती हैं

(i) कर एक अनिवार्य अंशदान है, जबकि शुल्क ऐच्छिक होता है।

(ii) शुल्क का सम्बन्ध विशेष लाभ से होता है, जबकि कर का इससे कोई सम्बन्ध नहीं होता।

(iii) शुल्क की राशि लगभग उसकी सेवा लागत के बराबर होती है, जबकि कर के साथ ऐसा नहीं होता।

लाइसेन्स शुल्क (Licence Fee)-शुल्क तथा लाइसेन्स दोनों की प्रकृति लगभग समान है, तथापि कुछ लेखकों ने इनमें अन्तर किया है। इनके अनुसार लाइसेन्स शुल्क किसी सेवा के लिए तब लिया जाता है जब सरकारी कर्मचारी कोई सेवा तो प्रदान नहीं करता, अपितु किसी व्यक्ति को कोई विशेष अधिकार या अनुमति दे देता है। लुटज के अनुसार, “लाइसेन्स शुल्क उस स्थिति में अदा किया जाता है, जबकि सरकारी सत्ता से यह प्रार्थना की जाती है कि वह कोई अधिक स्पष्ट तथा निश्चित किस्म की सेवा प्रदान करने की बजाय एक अनुमति अथवा विशेषाधिकार प्रदान कर दे।” मोटर वाहनों का रजिस्ट्रेशन शुल्क, मोटरें चलाने के लिए परमिट की अदायगी और बन्दूक या रिवाल्वर रखने का लाइसेन्स शुल्क के कुछ उदाहरण हैं।

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ऐसे शुल्क का उद्देश्य कभी-कभी विभिन्न प्रकार की क्रियाओं एवं गतिविधियों का नियमन एवं नियन्त्रण करना भी होता है। उदाहरण के लिए, शराब बेचने का लाइसेन्स देकर सरकार शराब की बिक्री का नियमन करती है। यदि कोई व्यक्ति लाइसेन्स शुल्क का भुगतान न करे तो वह उन क्रियाओं को नहीं कर सकता जिनको करने का उसे पहले अधिकार प्राप्त था।

III. विशेष कर निर्धारण (Special Assessment)-यदि सार्वजनिक कार्यों से किसी व्यक्ति की सम्पत्ति का मूल्य बढ़ जाए तो ऐसी मूल्य-वृद्धि दर को अनुपार्जित वृद्धि कहेंगे। यदि सरकार इस वृद्धि पर कर लगा दे तो उसे विशेष कर निर्धारिण कहेंगे।

प्रो० सैलिगमैन के अनुसार, “विशेष कर एक अनिवार्य अंशदान है जो प्राप्त हुए विशेष लाभों के अनपात में लगाया जाता है, ताकि जनहित में सम्पत्ति पर विशेष सुधार करने की लागतें पूर्ण हो जाएँ।“2 ऐसा विशेष कर-निर्धारण सामान्यतः सम्पत्ति के मूल्य में होने वाली वृद्धि के अनुपात में ही किया जाता है। इस सम्बन्ध में टेलर के अनुसार “विशेष निर्धारण ऐसे सुधार से लाभान्वित सम्पत्ति पर ही लगाए जाते हैं जो कर-निर्धारण की मात्रा या लागत के अनुपात में निर्धारित की जाती हैं।” प्रो० सेलिगमैन के अनुसार विशेष कर निर्धारण में निम्नलिखित विशेषताएँ पाई जाती हैं

(i) यह विशेष उद्देश्य के लिए लगाया जाता है।

(ii) इसमें सरकारी सेवा से मिलने वाले विशिष्ट लाभ को मापा जा सकता है।

(iii) विशेष कर निर्धारण लाभ के अनुपात में होते हैं।

(iv) ये विशिष्ट स्थानीय सुधारों के लिए लगाए जाते हैं।

IV.जमानत या सम्पत्ति आदि जब्त करना-जमानत या सम्पत्ति को जब्त करने से आशय उन जर्मानों से होता है, जो देश के नागरिकों द्वारा सरकार द्वारा बनाए गए नियमों को तोड़ने पर लगाए जाते । है। इसको लगाने का उद्देश्य नागरिकों को कानून तोड़ने से रोकना है। यह राजकीय आय का कोई महत्वपूर्ण स्रोत नहीं है। डॉ० डाल्टन के अनुसार, “करों की तुलना में जुर्माने का उद्देश्य आय प्राप्त करना नहीं होता, बल्कि अपराधियों को दण्ड देकर समाज में होने वाली बुराइयों को दूर करना या रोकना होता है।”

(V) मृतक की सम्पत्ति पर कब्जा-किसी ऐसे व्यक्ति की मृत्यु पर जो कानूनी उत्तराधिकारी नियुक्त किए बिना अथवा वसीयत लिखे बिना ही मर गया हो, उसकी बैंक में जमा धनाराशियाँ तथा अन्य सम्पत्तियाँ सरकार के अधिकार में चली जाती हैं। यह भी सरकारी आय का कोई महत्त्वपूर्ण स्रोत नहीं है।

(VI) उपहार तथा अनुदान (Gifts and Grants)-उपहार वे ऐच्छिक अंशदान हैं, जो निजी व्यक्तियों अथवा गैर सरकारी दाताओं द्वारा विशिष्ट कार्यों के लिए सरकार को दिए जाते हैं। जैसे-युद्ध या किसी अन्य संकट काल में सहायता कोष अथवा प्रतिरक्षा कोष। अनुदानों की स्थिति में दाता सरकार अन्य किसी स्तर पर सरकारी कार्यों को सम्पन्न करने के लिए वित्तीय सहायता देती है। अनुदान का उद्देश्य वित्तीय अभाव को पूरा करने के साथ-साथ राज्य के विभिन्न अंगों में सामंजस्य स्थापित करना तथा उनका उचित नियमन तथा निर्देशन करना भी होता है। ये अनुदान शर्तरहित भी हो सकते हैं अथवा केवल कुछ विशिष्ट कार्यों को सम्पन्न करने के लिए भी दिए जा सकते हैं। अल्पविकसित देशों के विकास के लिए ऐसे अनुदान बड़े सहायक सिद्ध होते हैं। किन्तु विदेशी अनुदान सदा अनिश्चित होते हैं और अधिकांशतया सशर्त होते हैं। इससे प्रायः अन्तर्राष्ट्रीय कठिनाईयाँ व उलझनें पैदा हो जाती हैं।

शिराज का मत है कि “सरकार को प्राप्त होने वाले उपहार दुर्भाग्य से कम व कभी-कभी ही प्राप्त होते हैं।“2 उपहार तथा अनुदान पूर्णतया ऐच्छिक प्रकृति के होते हैं और इनको देने वाला व्यक्ति बदले में किसी भी प्रत्यक्ष लाभ की आशा नहीं करता।

संक्षेप में सार्वजनिक आय के विभिन्न स्रोतों में सबसे अधिक महत्त्व कर का है, किन्तु आजकल व्यावसायिक व प्रशासनिक आयों में भी वृद्धि होती जा रही है।

सार्वजनिक आय का वर्गीकरण (Classification of Public Revenue) _विभिन्न अर्थशास्त्रियों ने सार्वजनिक आय का वर्गीकरण विभिन्न आधारों पर किया है। इन विभिन्न आधारों के कारण आय के वर्गीकरण में बहुत-सी कठिनाइयाँ उपस्थित हो गयीं। इसी समस्या के सन्दर्भ में प्रो० सेलिगमैन का कथन है कि, “राजस्व में जिन प्रश्नों को हल नहीं किया जा सका है उनमें से कार प्रश्न ही ऐसे होंगे जो सार्वजनिक आय का विभिन्न प्रकारों में वर्गीकरण के प्रश्नों से कठिन बाल्टन के अनुसार, “सार्वजनिक आय के स्रोतों का वास्तव में वर्गीकरण किया जा सकता है. अनेक भेद पूर्णतया स्पष्ट नहीं हैं और अन्य स्थानों की वर्गीकरण की खोज को स्वयं परन्तु उसके वर्गीकरण की प्राप्ति से अधिक महत्त्वपूर्ण माना जाता है।” सार्वजनिक आय के प्रमुख वर्गीकरण निम्न प्रकार हैं ।

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1 एडम सस्मिथ का वर्गीकरण (Adam Smith’s Classification)-एडम स्मिथ ने सार्वजनिक आय को दो भागों में विभाजित किया है

(i)  नागरिकों से प्राप्त आय (Revenue from Public Assets)-इस वर्ग में जनता से प्राप्त कर फीस तथा जुर्माना आदि को सम्मिलित किया जाता है।

(ii)  राजकीय सम्पत्ति से प्राप्त आय (Revenue from State Assets)-इस वर्ग में सरका उद्योगों, बागानों, खानों, भूमि तथा सरकारी सम्पत्ति से प्राप्त होने वाली आय को सम्मिलित किया 

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