सिंचाई

सिंचाई
Irrigation: सिंचाई प्रणाली के प्रकार और महत्व, 
खेती (Agriculture) में बेहतर फसल के लिए अच्छी सिंचाई (Irrigation) ज़रूरी है। इसी तकनीक से पानी का किफायती इस्तेमाल हो सकता है। 
जिस प्रकार से हमारे जीवन के लिए जल का अत्यंत महत्व है। जल के बिना जीवन असंभव है, उसी प्रकार से फसलों के लिए भी पानी की आवश्यकता होती है। सिंचाई (Irrigation) एक ऐसी तकनीक है जो बारिश न होने पर की जाती है, अर्थात सिंचाई का उपयोग सूखी जमीन में भूजल के इज़ाफ़े के रूप में किया जाता है।

सिंचाई (Irrigation) एक ऐसी तकनीक है जो बारिश न होने पर कुएं, नहरें, नदियाँ, बाँध आदि के माध्यम से की जाती है। फसल की वृद्धि के लिए सिंचाई आवश्यक है।

 

जैसा कि हम पिछले ब्लॉग में भी जिक्र कर चुके हैं कि हमारे देश की आधे से ज्यादा आबादी कृषि पर निर्भर है। भारत के हर राज्य एवं क्षेत्रों में खेती (Agriculture) के लिए विभिन्न प्रकार की सिंचाई प्रणाली का उपयोग (Irrigation system in India) किया जाता है।

 

हमारे देश में सिंचाई के लिए अलग-अलग माध्यमों का उपयोग किया जाता है, जैसे- कुएँ, जलाशय, नहरें, नदियां, बाँध, झील इत्यादि।

 

सिंचाई की परिभाषा

सिंचाई (Irrigation) से तात्पर्य कृत्रिम साधनों से फसलों को पानी देने से है। जिससे फसलों को आवश्यकता अनुसार पानी मिल सके। 

दूसरे शब्दों में कहें तो सिंचाई के जरिए निश्चित अंतराल में पौधों को पानी दिया जाता है। जिससे फसलों को पर्याप्त मात्रा में पानी उपलब्ध हो सकें। 

 

जैसा की हम सभी जानते हैं, कृषि उत्पादन काफी हद तक पानी की उपलब्धता पर निर्भर करती है। सिंचाई प्रणाली (Irrigation system) किसानों की वर्षा जल पर निर्भरता कम करने में मदद करती है। यह फसलों की आवश्यकता के अनुसार पानी की आपूर्ति के साथ बेहतर फसलों की खेती करने में मदद करती है। जो अंतत: आर्थिक विकास में मदद करता है।

 

भारत में सिंचाई के साधन

भारत में सिंचाई के 3 मुख्य स्रोत कुआँ, नहरें और तालाब हैं। जिनका प्रतिशत योगदान इस प्रकार है-

नहर - 40.0 प्रतिशत

कुंए - 37.8  प्रतिशत

तालाब - 14.5 प्रतिशत

अन्य - 7.7 प्रतिशत

नहरें (Canals)

भारत में सिंचाई का मुख्य साधन नहरें हैं। 40 प्रतिशत से अधिक कृषि भूमि की सिंचाई नहरों द्वारा ही की जाती है। हमारे देश की नहरों का सर्वाधिक विकास उत्तर के विशाल मैदानी भागों तथा तटवर्ती डेल्टा के क्षेत्रों में किया गया है, क्योंकि इनका निर्माण समतल भूमि एवं जल की निरन्तर आपूर्ति पर निर्भर करता है।

 

नहरों को मुख्यतः दो प्रकारों में रखा जाता है। 

 

नित्यवाही नहरें

ये नहरें वर्ष भर प्रवाहित होने वाली नदियों से निकाली जाती हैं एवं सदैव जल से भरी रहती हैं। उल्लेखनीय है कि नदी के जल को पहले बाँध बनाकर रोक लिया जाता है और उनसे नहरों में जल की आपूर्ति की जाती है। जैसे- रामगंगा नहर, शारदा नहर इत्यादि।

 

अनित्यवाही (बाढ़ की नहरें)

इनमें वर्ष भर लगातार जल की आपूर्ति सम्भव नहीं हो पाती और वे मात्र नदियों में आने वाली बाढ़ों के समय ही सिंचाई के काम आती हैं। ऐसी नहरों के द्वारा वर्ष में मात्र एक फसल की ही सिंचाई की जा सकती है। इस प्रकार की नहरें प्रायः दक्षिण भारत में पाई जाती हैं, जहाँ इन नहरों में पूरे वर्षभर प्रवाह के लिए पानी नहीं मिल पाता है। 

 

कुआँ

सिंचाई का स्रोत (2001 के अनुसार) कुआँ नहर के बाद दूसरे स्थान पर है। जो कि प्राचीन काल में पहले स्थान पर था। कुओं से भूमिगत जल को पशु शक्ति, रहटों, विद्युत पम्पों के द्वारा ऊपर खींचा जाता है। 

 कुओं द्वारा सिंचाई के लिए ऐसे क्षेत्र उपयुक्त माने जाते हैं, जहां पारगम्य शैल संरचना पाई जाती है। जलोढ़ मिट्टी वाली समान्तर स्थलाकृति कुआं खोदने के लिए उपयुक्त होती है तथा ऐसी भूमि की उत्पादकता भी अधिक होती है। 

 

पंजाब, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, महाराष्ट्र व गुजरात राज्यों के कुल सिंचित क्षेत्र का 50% या उससे भी अधिक प्रतिशत भाग कुओं द्वारा सिंचित होता है। मध्य प्रदेश एवं तमिलनाडु के भी एक बड़े भू-भाग में कुओं द्वारा सिंचाई की जाती है।

 

तालाब

भारत के प्रायद्वीपीय पठार वाले भाग में सिंचाई का सबसे महत्वपूर्ण साधन तालाब ही है। जैसे- तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, केरल तथा मध्य प्रदेश, ओडिशा व पश्चिम बंगाल के कुछ भागों में वर्षा जल को प्राकृतिक गतों या खुदे हुए तालाबों में बंधों द्वारा एकत्रित कर लिया जाता है। इस भंडारित जल को नालियों के माध्यम से खेतों तक पहुंचाया जाता है।

 

सिंचाई का महत्व

भारत जैसे देश में वर्षा का असमान वितरण और बारिश की अनिश्चित होने से प्रायः अकाल और सूखे की स्थिति होती है। जिसके कारण कृत्रिम सिंचाई का महत्व बढ़ जाता है। 

 

  • सिंचाई से मिट्टी में नमी बनी रहती है। बीज के अंकुरण के लिए नमी आवश्यक है। सूखी मिट्टी में बीज नहीं उगते, इसीलिए जुताई से पहले सिंचाई की जाती है।
  • फसल पौधों की जड़ों की वृद्धि के लिए सिंचाई आवश्यक है। पौधे की जड़ें सूखी मिट्टी में अच्छी तरह से विकसित नहीं होती है।
    • मिट्टी से पौधों द्वारा खनिज पोषक तत्वों के अवशोषण के लिए सिंचाई आवश्यक है। इस प्रकार, पौधों की सामान्य वृद्धि के लिए सिंचाई आवश्यक है।
    • पानी फसल को दो आवश्यक तत्व हाइड्रोजन और ऑक्सीजन की आपूर्ति करता है।

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