ग्रामीण विकास

ग्रामीण विकास

ग्रामीण विकास का अर्थ लोगों का आर्थिक सुधार और बड़ा समाजिक बदलाव दोनों ही है। ग्रामीण विकास कार्यक्रमों में लोगों का बढ़ी हुई भागीदारी, योजनाओं का विकेन्द्रीकरण, भूमि सुधारों को बेहतर तरीके से लागू करना और ऋण की आसान उपलब्धि करवाकर लोगों के जीवन को बेहतर बनाने का लक्ष्य होता है।

अन्य शब्दो मे ग्रामीण विकास का अर्थ ‘ग्रामवासियों की आर्थिक और सामाजिक बदलाव’ है। जिससे ग्रामवासियों को उन सभी मूलभूत आवश्यकतों की पूर्ति हो जिसका उन्हें बेहद जरूरी है।  दूसरे शब्दों में कहें तो ग्रामीण विकास (rural development) एक प्रक्रिया है जिसका उद्देश्य गाँव में रहने वाले ग्रामवासियों का जीवन स्तर को सुधारना और उन्हें आत्मनिर्भर बनाना है। 
ग्रामीण विकास एवं बहुआयामी अवधारणा है जिसका विश्लेशण दो दृष्टिकोणोंके आधार पर किया गया है: संकुचित एवं व्यापक दृष्टिकोण। संकुचित दृष्टि सेग्रामीण विकास का अभिप्राय है विविध कार्यक्रमेां, जैसे- कृषि, पशुपालन, ग्रामीणहस्तकला एवं उद्योग, ग्रामीण मूल संरचना में बदलाव, आदि के द्वारा ग्रामीण क्षेत्रोंका विकास करना।

वृहद दृष्टि से ग्रामीण विकास का अर्थ है ग्रामीण जनों के जीवन में गुणात्मकउन्नति हेतु सामाजिक, राजनितिक, सांस्कृतिक, प्रोद्योगिक एवं संरचनात्मक परिवर्तन करना।
विश्व बैंक (1975) के अनुसार ‘‘ग्रामीण विकास एक विशिष्ट समूह- ग्रामीण निर्धनोंके आर्थिक एवं सामाजिक जीवन को उन्नत करने की एक रणनीति है।’’ बसन्तदेसाई (1988) ने भी इसी रुप में ग्रामीण विकास को परिभाशित करते हुए कहा कि,‘‘ग्रामीण विकास एक अभिगम है जिसके द्वारा ग्रामीण जनसंख्या के जीवन कीगुणवत्ता में उन्नयन हेतु क्षेत्रीय स्त्रोतों के बेहतर उपयोग एवं संरचनात्मक सुविधाओंके निर्माण के आधार पर उनका सामाजिक आर्थिक विकास किया जाता है एवंउनके नियोजन एवं आय के अवसरों को बढ़ाने के प्रयास किये जाते हैं।‘‘

क्रॅाप (1992) ने ग्रामीण विकास को एक प्रक्रिया बताया जिसका उद्देष्य सामूहिकप्रयासों के माध्यम से नगरीय क्षेत्र के बाहर रहने वाले व्यक्तियों के जनजीवन कोसुधारना एवं स्वावलम्बी बनाना है।
 जान हैरिस (1986) ने यह बताया कि ग्रामीणविकास एक नीति एवं प्रक्रिया है जिसका आविर्भाव विष्वबैंक एवं संयुक्त राश्ट्रसंस्थाओं की नियोजित विकास की नयी रणनीति के विशेष परिप्रेक्ष्य में हुआ है।ग्रामीण विकास की उपरोक्त परिभाशाओं के विष्लेशण में यह तथ्य उल्लेखनीय है किग्रामीण विकास की रणनीति में राज्य की भूमिका को महत्वपूर्ण माना गया है। राज्यके हस्तक्षेप के वगैर ग्रामवासियों के निजी अथवा सामूहिक प्रयासों, स्वयंसेवीसंगठनों के प्रयासों के आधार पर भी ग्रामीण जनजीवन को उन्नत करने के प्रयासहोते रहे हैं, इन प्रयासों को ग्रामीण विकास की परिधि में शामिल किया जा सकताहै। किन्तु नियोजित ग्रामीण विकास प्रारुप में राज्य की भूमिका महत्वपूर्ण मानी गयीहै। इन परिभाशाओं के विष्लेशण से दूसरा महत्वपूर्ण तथ्य यह भी उभरता है कि ग्रामीण विकास सिर्फ कृषि व्यस्था एवं कृषि उत्पादन के साधन एवं सम्बन्धों मेंपरिवर्तन तक ही सीमित नहीं है बल्कि ग्रामीण परिप्रक्ष्य में सामाजिक, आर्थिक,सांस्कृतिक, प्रौद्योगिक, संरचनात्मक सभी पहलुओं में विकास की प्रक्रियायें ग्रामीणविकास की परिधि में शामिल हैं।
ग्रामीण विकास का महत्व (Importance of rural development) 
भारत में ग्रामीण विकास हेतु निर्धनता, बेरोज़गारी, असमानता एवं पिछड़ेपन की समस्याओं   के निराकरण करने में ग्रामीण विकास का महत्वपूर्ण योगदान है।  यहाँ यह जिक्र करना आवश्यक है कि ग्रामीण विकास कार्यक्रमों में लोगों का बढ़ी हुई भागीदारी, सत्ता का विकेन्द्रीकरण, भूमि सुधारों को बेहतर तरीके से लागू कराने में भी ग्रामीण विकास की महत्वपूर्ण भूमिका है। जिसके बिना हमारा गाँव अधूरा और पिछड़ा रहा जाता है। 
  ग्रामीण विकास का उद्देश्य (Rural development objective) 
ग्रामीण विकास के उद्देश्यों को देखा जाए तो उन्हें निम्नलिखित बिंदुओं से रेखांकित किया जा सकता है।  ग्रामीणों की मज़दूरी में सुधार करना। ग्रामीण क्षेत्र में व्याप्त ग़रीबी को कम करना और रोज़गार के नए अवसर उत्पन्न करना।सुदूर ग्रामीण क्षेत्रों में तक वर्तमान शिक्षा पद्धति को पहुँचाना। कुटीर उद्योगों, ग्रामीण उद्यमों का समुचित विकास करना।ग्रामीण लोगों को ग्रामीण विकास कार्यक्रमों और उनके अधिकारों के प्रति जागरूक करना।ग्रामीण क्षेत्रों को संचार क्रांति और मीडिया से जोड़ना, जिससे से ग्रामवासी भी संपूर्ण विश्व से जुड़ सकें। ग्रामीण आवासहीनों को आवास और शोषितों को संबल देना इत्यादि।  
ग्रामीण विकास क्यों जरूरी है (Why rural development is important) ग्रामीण क्षेत्रों का पिछड़ापन जैसे- ग़रीबी, जातिवाद, सामाजिक कुरीतियों को ख़त्म करने के लिए ग्रामीण क्षेत्रों (Rural Areas) का विकास अति आवश्यक है।  आज भी ग्रामवासियों को रोज़गार, शिक्षा, चिकित्सा और दूसरी सुविधाओं के लिए शहर पर निर्भर रहना पड़ता है।      

ग्रामीण विकास कार्य

प्रारंभ में, विकास के लिए मुख्य जोर कृषि, उद्योग, संचार, शिक्षा, स्वास्थ्य और संबंधित क्षेत्रों पर दिया गया था। बाद में यह समझने पर कि त्वरित विकास केवल तभी संभव है जब सरकारी प्रयासों के साथ साथ पर्याप्त रूप से जमीनी स्तर पर लोगों की प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष भागीदारी हो, सोच बदल गई।

ग्रामीण विकास विभाग द्वारा ग्रामीण क्षेत्रों में निम्नलिखित बड़े कार्यक्रम चलाये जा रहे हैं:

(i) रोज़गार देने के लिए महात्मा गाँधी नेशनल रूरल एम्प्लॉयमेंट गारंटी एक्ट (मनरेगा)

(ii) स्व रोज़गार और कौशल विकास के लिए नेशनल रूरल लाइवलीहूडस मिशन (एनआरएलएम)

(iii) गरीबी रेखा से नीचे वाले परिवारों को आवास देने के लिए इंदिरा आवास योजना (आईएवाई)

(iv) अच्छी सड़कें बनाने के लिए प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना (पीएमजीएसवाई)

(v) सामाजिक पेंशन के लिए नेशनल सोशल असिस्टेंस प्रोग्राम (एनएसएपी)

(vi) आदर्श ग्रामों के लिए सांसद आदर्श ग्राम योजना (एसएजीवाई)

(vii) गामीण विकास केंद्रों के लिए श्यामा प्रसाद मुख़र्जी रूर्बन मिशन

इसके आलावा मंत्रालय के पास ग्रामीण पदाधिकारियों की क्षमता के विकास; सूचना, शिक्षा और संचार; और निगरानी व मूल्यांकन के लिए भी योजनायें हैं।

ग्रामीण केंद्रित विकास के मानक

  • सड़कों का बुनियादी ढाँचा: सड़क प्रणाली देश की अर्थव्यवस्था की धुरी है और विकास के केंद्र के   रूप में कार्य करती है। इसके जरिए माल और कृषि पदार्थों का ढुलाई, पर्यटन और संपर्क जैसे कई महत्त्वपूर्ण कार्य संपन्न होते हैं। देश में सभी मौसमों में चालू रहने वाले मज़बूत सड़क नेटवर्क को बढ़ावा देने से तीव्र सामाजिक-आर्थिक विकास के साथ-साथ, व्यापार के सुचारू रूप से संचालन तथा देश भर के बाजारों के समन्वयन में मदद मिलती है। प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना (Prime Minister Gram Sadak Yojana) का मूल उद्देश्य देश के ऐसे गाँवों को सड़क संपर्क से जोड़ना है जो अब तक अलग-थलग पड़े हुए थे। रिपोर्ट के अनुसार, PMGSY ने अपना 85 प्रतिशत लक्ष्य प्राप्त कर लिया है। अब तक, 668,455 किमी. सड़क की लंबाई स्वीकृत की गई है, जिसमें से 581,417 किमी. पूरी हो चुकी थी।
  • संचार अवसंरचना: ई-गवर्नेस, बैंकों, वित्तीय सेवाओं, व्यापार, शिक्षा स्वास्थ्य, कृषि, पर्यटन, लॉजिस्टिक्स, परिवहन और नागरिक सेवाओं के क्षेत्र में नकदी विहीन लेन-देन में विकास से दूरसंचार क्षेत्र में जबर्दस्त तेजी आई है। दूरसंचार क्षेत्र में प्रगति से स्टार्टअप इंडिया, स्टैण्डअप इंडिया जैसी पहल के जरिए नव सृजन और उद्यमिता को बढ़ावा मिला है। आज करीब 1.5 लाख ग्राम पंचायतें इंटरनेट और वाई-फाई हॉटस्पॉट तथा कम लागत पर डिजिटल सेवाओं तक पहुँच बनाने के लिये डिजिटल इंडिया और भारत नेट परियोजनाओं के तहत ऑप्टिकल फाइबर से जोड़ी जा रही हैं। इसके अलावा वित्तीय सेवाओं, टेली-मेडिसिन, शिक्षा, ई-गवर्नेंस, ई-मार्केटिंग और कौशल विकास को मंच प्रदान करने के लिये डिजी-गाँव की योजना बनाई गई है।
  • रोज़गार प्रबंधन: दीन दयाल उपाध्याय ग्रामीण कौशल्य योजना (DDU-GKY) गरीब ग्रामीण युवाओं को नौकरियों में नियमित रूप से न्यूनतम मज़दूरी के बराबर या उससे अधिक मासिक मज़दूरी प्रदान करने का लक्ष्य रखता है। 
    • महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी अधिनियम अर्थात् मनरेगा को भारत सरकार द्वारा वर्ष 2005 में राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी अधिनियम, 2005 को नरेगा के रूप में प्रस्तुत किया गया था। वर्ष 2010 में नरेगा (NREGA) का नाम बदलकर मनरेगा (MGNREGA) कर दिया गया। रिपोर्ट के मुताबिक सरकार के प्रयासों के कारण ही मनरेगा के तहत वर्ष 2018-19 में 69,809 करोड़ रुपए का रिकॉर्ड खर्च किया गया, जो कि इस कार्यक्रम के शुरू होने के बाद सबसे अधिक है।
  • आवास अवसंरचना: प्रधानमंत्री आवास योजना-ग्रामीण (Prime Minister Avas Yojana-Grameen) को केंद्र सरकार द्वारा वर्ष 2015 में लॉन्च किया गया था। इस योजना का उद्देश्य पूर्ण अनुदान के रूप में सहायता प्रदान करके आवास इकाइयों के निर्माण और मौजूदा गैर-लाभकारी कच्चे घरों के उन्नयन में गरीबी रेखा (BPL) से नीचे के ग्रामीण लोगों की मदद करना है। रिपोर्ट के अनुसार, PMAY-G के तहत लक्षित एक करोड़ घरों में से करीब 7.47 लाख घरों का निर्माण पूरा होना अभी शेष है। इसमें से अधिकतर घर बिहार (26 प्रतिशत), ओडिशा (15.2 प्रतिशत), तमिलनाडु (8.7 प्रतिशत) और मध्य प्रदेश (आठ प्रतिशत) में हैं। 
  • स्वच्छ भारत अभियान: वर्ष 2014 में प्रारंभ किया गया स्वच्छ भारत अभियान
  • लोगों में स्वच्छता, आरोग्य और स्वास्थ्य के बारे में जागरुकता पैदा करने के लिये एक क्रांतिकारी पहल है। इसमें शानदार प्रगति हुई है।  वर्ष 2018-19 तक देश भर के 85 प्रतिशत इलाके को इसके दायरे में लिया जा चुका था और 391 जिलों के 3.8 लाख गाँवों को खुले में शौच की बुराई से छुटकारा दिलाया जा चुका था। स्वच्छ भारत ग्रामीण अभियान के तहत 2018 तक 7.4 करोड़ अधिक निज़ी घरेलू शौचालय बनाए जा चुके थे। इस कार्यक्रम के अंतर्गत दिसंबर 2018 तक शौचालयों के निर्माण का शत-प्रतिशत लक्ष्य प्राप्त किया गया है। लोग इस कार्यक्रम में बढ़-चढ़कर हिस्सा ले रहे हैं और अपने घर में निजी शौचालयों का निर्माण कर रहे हैं। लोगों की मानसिकता में बदलाव आने और शौचालयों की सामाजिक स्वीकार्यता बढ़ने से लोग कूड़े-कचरे के निपटान के कार्यक्रमों में भी हिस्सा लेने लगे हैं।
  • ग्रामीण विकास में ‘पुरा’ की अवधारणा

    • गाँवों के विकास के लिये पूर्व राष्ट्रपति स्व. डॉ.अब्दुल कलाम ने ‘पुरा’(providing urban amenities of rural areas) का विचार प्रस्तुत किया जिसके तहत 4 प्रकार की ग्रामीण-शहरी कनेक्टिविटी की बात की गई थी- फिजिकल, इलेक्ट्रॉनिक, नॉलेज तथा इकोनॉमिक कनेक्टिविटी।
    • पुरा का लक्ष्य सभी को आय और आजीविका के अवसरों की गुणवत्ता प्रदान करना था। 
    • इसके द्वारा सार्वजनिक-निजी भागीदारी के माध्यम से प्रति यूनिट 130 करोड़ रुपये की लागत से 7,000 PURA परिसरों की कल्पना की गई थी।

    श्यामा प्रसाद मुखर्जी रूर्बन मिशन

    • ‘पुरा’ के अंतर्गत विनिर्धारित सफलता न प्राप्त कर पाने और गाँव-शहर के बीच अंतर पाटने की आवश्यकता के मद्देनजर केंद्र सरकार द्वारा बजट 2014-2015 में
    • श्यामा प्रसाद मुखर्जी रूर्बन मिशन का प्रस्ताव रखा गया। सितंबर 2015 को ग्रामीण क्षेत्रों में सामाजिक, आर्थिक और बुनियादी ढाँचे के विकास को प्राथमिकता प्रदान करते हुए केंद्रीय मंत्रिमंडल ने इस मिशन को मंजूरी प्रदान की।
    • इसके तहत, अगले तीन वर्षों में 300 क्लस्टर्स विकसित करने का लक्ष्य रखा गया है। ये क्लस्टर्स भौगोलिक रूप से नजदीक कई ग्राम पंचायतों को मिलाकर बनाए जाएंगे।
    • इन क्लस्टर्स के चयन के लिये ग्रामीण विकास मंत्रालय एक वैज्ञानिक प्रक्रिया तैयार करेगा, जिसके तहत जिला, उप-जिला एवं गाँव के स्तर तक विभिन्न पहलुओं, जैसे- जनसंख्या, आर्थिक संभावनाओं, क्षमताओं, पर्यटन इत्यादि का विश्लेषण किया जाएगा।

      निष्कर्ष

      भारतीय अर्थव्यवस्था की मौजूदा स्थिति काफी चिंताजनक है। ऐसे में सरकार द्वारा चलाए जा रहे विभिन्न ग्रामीण विकास कार्यक्रमों का महत्त्व काफी बढ़ जाता है। अभी भी स्वच्छ प्रकृति, सामाजिक सदभाव, कम व्यय क्षमता के कारण गाँवों की प्रासंगिकता बरकरार है। यदि सरकार द्वारा मूलभूत सुविधाओं की पूर्ति की जाए तो ग्रामसभाएँ आज शहरों की अपेक्षा अधिक प्रासंगिक होंगी।

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